भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

(46) अगस्त्य-संहिता ————————————————————————————————————————— रामाय नम इत्येव मन्त्रः पञ्चाक्षरो मनुः। रामित्येकाक्षरो मन्त्रो राम इत्यपरो मनुः ।।३०।। 'रामाय नमः' यह एक मन्त्र पाँच अक्षरों का है, 'रां' यह एकाक्षर मन्त्र है तथा 'राम' यह एक अन्य मन्त्र है। चन्द्रान्तश्चैव भद्रान्तः पुनर्द्वेधा विभज्यते। स्वकामशक्तिवाग्लक्ष्मीताराद्यः पञ्चवर्णकः ।।३१।। षडक्षरः षड्विधः स्याच्चतुर्वर्गफलप्रदः। पंचाशन्मातृकामन्त्रवर्णप्रत्येकपूर्वकः ।।३२।। 'रामचन्द्राय नमः' और 'रामभद्राय नमः' इस प्रकार दो मन्त्र हो जाते हैं। स्वबीज (रां), कामबीज(क्लीं), शक्ति(ह्रीं), वाक्(ऐं), लक्ष्मी(श्रीं) तथा तार (ॐ) इन छह बीजों का आदि में प्रयोग करने से पंचाक्षर मन्त्र छह प्रकार के षडक्षर मन्त्र हो जाते हैं। जिनमें पचास मातृकावर्णों के बीजरूप प्रत्येक के आदि में जोड़कर जप किया जाता है। लक्ष्मीवाङ्न्मथादिश्च सर्वत्र प्रणवादिकः। रामश्च चन्द्रभद्रान्तश्चतुर्थ्यन्तो हृदा ^1 सह ।।३३।। बहुधा विद्यते तारसहितोऽयं षडक्षरः। लक्ष्मीबीज, वाक्बीज, कामबीज प्रारम्भ में लगाकर तथा प्रत्येक मन्त्र में तार जोड़कर 'राम' शब्द 'चन्द्र' और 'भद्र' जोड़कर चतुर्थी विभक्ति में 'नमः' के साथ तथा तारक बीज ॐकार के साथ अनेक प्रकार के यह षडक्षर मन्त्र होते हैं। एकधा च द्विधा त्रेधा चतुर्धा पंचधा तथा ।।३४।। षट्सप्ताष्टधा चैव बहुधायं व्यवस्थितः। एकाक्षर, द्वयक्षर, त्र्यक्षर, चतुरक्षर, पंचाक्षर, षडक्षर, सप्ताक्षर, अष्टाक्षर एवं अनेकाक्षर, इन अनेक प्रकार के मन्त्रों का निरूपण किया गया है। मन्त्रोऽयमुपदेष्टव्यो ब्राह्मणाद्यनुरूपतः ।।३५।। संपूज्य विधिवत् तत्र संस्थाप्य कलशं नवम्। तत्सामर्थ्यानुरूपेण मृत्सुवर्णमयं तथा। दात्रा प्रदीयते यद्वन्मन्त्रो देयस्तथा मुने ।।३६।।


  1. क. नमः।