अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 110, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः (49) तब बीज मन्त्र के दोनों ओर कामबीज (क्लीं) लिखें। इसके बाद पाँचो बीजाक्षर फिर दोहराएँ। पुनः दशाक्षर मन्त्र से वेष्टित करें। षडङ्गान्यग्निकोणादि कोणेष्ववक्रमाल्लिखेत् ।। 11 ।। तथा कोणकपोलेषु ह्रीं श्रीं च विलिखेन्मुने। हुं बीजं प्रतिकोणाग्रं केसराग्रेषु च स्वरान् ।। 12 ।। फिर अग्निकोण से प्रारम्भ कर कोणों में विपरीत क्रम से षडङ्गों को लिखें और कोणों के दोनों ओर 'ह्रीं' और 'श्रीं' लिखें। प्रत्येक कोण के अग्रभाग में 'हुं' बीज लिखें और केसर के अग्रभागों में स्वरों को लिखें। मालामन्त्रस्य वर्णाः स्युः चत्वारिंशच्च पञ्च च। वर्णाः सप्तदलेष्वेव षट् षट् पश्चाष्टमेदले ।। 13 ।। पूर्वतो वेष्टयेत् काद्यैः तत्सर्वं च तपोधन। बीजद्वयं च विलिखेत् नरसिंहवराहयोः ।। 14 ।। दिग्विद्दिक्ष्वपि पूर्वस्मात् ¹ भूगृहे चतुरस्रके। यन्त्रेस्मिन् सम्यगाराध्य भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ।। 15 ।। मालामन्त्र में पैंतालीस वर्ण होते हैं, जिनमें सात दलों में छः छः वर्ण लिखें और आठवें में पाँच वर्ण लिखें। पूर्व से 'क' आदि से सबको वेष्टित करें और वराह एवं नरसिंह के बीज (क्रौं) चारो दिशाओं एवं चारो कोणों में वर्गाकर भूपुर पर लिखें। इस यन्त्र पर आराधना कर भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। यद्वा मध्ये लिखेत्तारं षट्सु कोणेष्वपि क्रमात्। मूलमन्त्राक्षराण्येव सन्धिष्वग्रं च मान्मथम् ।। 16 ।। मायां गण्डेषु किंजल्के स्वराणां लेखने मतम्। मन्त्रेषु पूर्ववन्मालामन्त्रो लेख्यः क्रमेण हि ।। 17 ।। दशाक्षरेण संवेष्ट्य कादीनि व्यञ्जनानि च। दिग्विंदिक्षु लिखेद् बीजे नारसिंहवराहयोः ।। 18 ।। अथवा मध्य में तथा छः कोणों में क्रम से तार (ॐ कार) लिखें। इसके बाद मूल मन्त्र के अक्षर कोण की सन्धियों पर लिखकर उसके आगे कामबीज (क्लीं) लिखें। कोणों के दोनों बगल में तिरछी रेखा पर माया बीज (ह्रीं) तथा केसर पर
- क. सर्वासु।