अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 19, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना (17) शेषं वक्तव्यमार्गेण विदध्यादविरोधिनाम्। अगस्त्यसंहितायान्तु प्रोक्तमावरणार्चनम्।।29।। (3) 24वें प्रकरण में होम-विधान में देवनाथ ठक्कुर का मत है कि नैमित्तिक कर्म में ही होम करना चाहिए, नित्यकर्म में नहीं। यह मिथिला की परम्परा है, अतः वहाँ पूजन आदि कर्म में हवन नहीं किया जाता है। किन्तु उन्होंने 'अगस्त्य-संहिता' के उस मत का भी उल्लेख किया है, जिसमें नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य तीनों कर्मों में होम का विधान किया गया है- संहितायामगस्त्यस्य समस्तविधिशेषतः। नित्ये नैमित्तिके काम्येऽप्येतदग्निमुखं मतम्।।175।। वर्तमान अगस्त्य-संहिता के चतुर्दश अध्याय में 66वें श्लोक में उपर्युक्त श्लोक का उत्तरार्द्ध इसी रूप में उपलब्ध है। (4) इसी प्रकार सानत्कुमारीय होमविधि का विवेचन करते हुए 24वें प्रकरण में प्रतिदिन जप की संख्या का निर्धारण करते हुए अगस्त्य-संहिता के मत का उल्लेख किया गया है, जिसके अनुसार छह हजार, एक हजार अथवा एक सौ आठ बार जप प्रतिदिन करना चाहिए- षट्सहस्रं सहस्रं वा शतमष्टोत्तरं जपेत्। अगस्त्य-संहितायामप्येष शेषिको विधिः।।44।। वर्तमान अगस्त्य-संहिता के षोडश अध्याय के तीसरे श्लोक में पुरश्चरण- विधान के क्रम में भी यहीं बात कही गयी है- षट्सहस्रं सहस्रं वा शतं वाष्टोत्तरं शुचिः।।3। (5) 'मन्त्रकौमुदी' के अन्तिम प्रकरण में म.म. देवनाथ ठाकुर ने उन प्राचीन ग्रन्थों का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन करके वे प्रस्तुत ग्रन्थ को लिखने में प्रवृत्त हुए। इनमें 'प्रपञ्चसार', 'शारदा-तिलक', 'सारसमुच्चय', 'दीपिका', 'पूजाप्रदीप', 'श्रीरामार्चनचन्द्रिका', 'तन्त्रमुक्तावली', 'सनत्कुमार-तन्त्र', 'नारदीय- तन्त्र' आदि के साथ 'अगस्त्य-संहिता' का भी उल्लेख किया है- तूर्णायागं सोमशम्भुमतं चागस्त्यसंहिताम्। संहितां वैष्णवीं तद्वत् तत्त्वसागरसंहिताम्।।5।। इस प्रकार म.म. देवनाथ ठाकुर ने 'अगस्त्य-संहिता' का उल्लेख जिन विषयों के सन्दर्भ में किया है वे इस संहिता में उपलब्ध हैं।