अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअगस्त्य-संहिता रामचरणजी द्वारा विरचित ग्रन्थों के नाम 'सीताराम-नवरत्न-संग्रह', 'अष्ट-भाग', 'रस-मालिका' आदि हैं। ये रसिक सम्प्रदाय के महात्मा थे और अयोध्या में रामभक्ति में शृंगार का प्रचार करनेवाले प्रथम सन्त थे। अतः यह प्रश्न उठता है कि क्या रसिक सम्प्रदाय के महात्मा 'श्रीरामानन्द-जन्मोत्सव-कथा' और 'श्रीरामानन्दभवोत्साहाष्टकम्' जैसे ग्रन्थों का रचनाकार हो सकते हैं? क्या महन्त रामचरण दास 1880 ई. तक जीवित थे? इन प्रश्नों के उत्तर तथा अन्य किसी पण्डित श्रीरामचरण की पहचान पर इसका उत्तर निर्भर करता है। उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह स्पष्ट है कि 'अगस्त्य-संहिता' रामोपासना का प्राचीन ग्रन्थ है; जबकि 'अगस्त्य-संहिता' के तथाकथित भविष्य-खण्ड के अध्याय 131-35 में वर्णित रामानन्द जन्मोत्सव-कथा एक प्रक्षिप्त अंश है, जिसमें रामानन्दाचार्य, सन्त कबीर एवं सन्त रैदास की जन्मतिथियाँ गलत रूप से प्रस्तुत हैं। मूल 'अगस्त्य-संहिता' रामोपासना का ऐसा प्रामाणिक धर्मग्रन्थ है, जिसको 12वीं सदी से लगातार इस देश के धर्मशास्त्रियों ने रामार्चना, विशेषकर रामनवमी के सन्दर्भ में उद्धृत किया है। प्राचीन काल में 'रामतापनीयोपनिषद्', बुधकौशिक-विरचित 'रामरक्षास्तोत्र' एवं 'अगस्त्य-संहिता' की गणना रामोपासना के प्रमुख ग्रन्थों में की जाती है। इस महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ 'अगस्त्य-संहिता' का सम्पादन एवं हिन्दी-अनुवाद महावीर मन्दिर के मूर्द्धन्य विद्वान् पं. भवनाथ झा ने किया है। संस्कृत भाषा, साहित्य, व्याकरण एवं अन्य शास्त्रों पर भवनाथजी की जो पकड़ है, वह प्रशंसनीय है। पूरे देश में इनकी टक्कर के विद्वान् बहुत कम मिलेंगे। अतः सम्पादन एवं अनुवाद की प्रामाणिकता में कोई संशय नहीं रह जाता। महावीर मन्दिर प्रकाशन महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों का प्रकाशन बहुत कम मूल्य पर करता रहा है, उसी कड़ी में 'अगस्त्य-संहिता' का यह प्रकाशन आपके समक्ष प्रस्तुत है। आशा है कि इसको पढ़ने के बाद पाठक अब इस भ्रान्ति में नहीं पड़ेंगे कि रामानन्दाचार्य का जन्म 1299 ई. में हुआ था। मैंने 'दलित-देवो भव' में संक्षेप में और शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक 'युग प्रवर्तक रामानन्द' में यह सिद्ध किया है कि रामानन्दाचार्य 1470 ई. तक अवश्य जीवित थे; अतः यदि उनका जन्म वर्ष 1356 वि.सं. नहीं मानकर 1356 ई. मान लिया जाये, तो उनका काल 1356 से 1470 ई. होगा और तब कबीर एवं रैदास को उनके शिष्य मानने की जो सर्वसम्मत मध्यकालीन परम्परा रही है, उसमें उत्पन्न आशंकाओं का निराकरण हो जायेगा। पटना श्रीकृष्णजन्माष्टमी, 2066 वि. किशोर कुणाल