भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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नहीं है। 1903 ई. में जब अयोध्या के ही दूसरे प्रसिद्ध सन्त रूपकलाजी ने नाभादास के 'भक्तमाल' का सम्पादन कर उसपर तिलक टीका लिखी, जब उन्होंने इस तथ्य का उल्लेख किया कि रामानन्दाचार्य की जीवनी 'अगस्त्य-संहिता' के भविष्योत्तर खण्ड में मिलती है और यह वृत्तान्त उन्होंने काशी की कुंजगली में हजारीलाल गणेश प्रसाद के घर में पढ़ा था और यह पोथी 1878 ई. में सूर्यप्रभाकर छापाखाने में छपी थी। रूपकलाजी ने रामानन्दाचार्य की जीवनी में जो श्लोक उद्धृत किये गये हैं, वे 'अगस्त्य-संहिता' के प्रक्षिप्त अंश के ही हैं और उसका हिन्दी अनुवाद भी श्री सीताराम महाराज ने रामरसरंगमणिजी द्वारा कराकर 'श्रीरामानन्द-यशावली' के नाम से छपवाया था। अतः 'अगस्त्य-संहिता' में यह प्रक्षेप 1876 ई. में जुड़ चुका था। अतः इसके प्रक्षेपक रामनारायण दास नहीं हो सकते। सूक्ष्म दृष्टि से अवलोकन करने पर पता चलता है कि 'रामानन्दजन्मोत्सव कथा' (अगस्त्य-संहिता के प्रक्षिप्त अंश), 'वैश्वानर संहिता' और 'श्रीरामानन्दभवोत्साष्टकम्' के लेखक एक ही विद्वान् प्रतीत होते हैं; क्योंकि तीनों की भाषा एवं भाव में साम्य है। तीनों रचनाओं में रामानन्दाचार्य के प्रति असीम श्रद्धा का भाव है और तीनों रचनाएँ एक ही पुस्तक में छपी हैं। पहली रचना यानी 'अगस्त्य-संहिता' का तथाकथित भविष्य खण्ड 1878 ई. में छप चुका था और 'रामानन्दजन्मोत्साहाष्टकम्' की रचना 1880 ई. (1937 वि) में हुई थी, यह इस अष्टक के 10वें श्लोक में उल्लिखित है। इस श्लोक में रचयिता का नाम भी पण्डित श्रीरामचरण दिया हुआ है। इसमें भी रामानन्दाचार्य के जन्म की वही तिथि दी हुई है; बल्कि इसमें संवत् 1356 वि. मास माघ, पक्ष कृष्ण, तिथि सप्तमी के अलावे भावोत्साह में दिन भी गुरुवार दिया गया है, 'अगस्त्य-संहिता' के प्रक्षिप्त अंश में वर्ष, मास, पक्ष और तिथि का उल्लेख किया गया है; किन्तु दिवस का उल्लेख नहीं है। अष्टक में दिवस भी है और इसकी गणना करने से आचार्य की जन्म-तिथि गलत निकलती है। किन्तु उपर्युक्त सभी तथ्यों के आलोक में यह प्रबल समानता है कि 1880 ई. 'श्रीरामानन्द-भवोत्साहाष्टकम्' के रचनाकार पण्डित श्री रामचरण ने ही अगस्त्य-संहिता में भविष्य-खण्ड के नाम पर पाँच अध्याय 1878 ई. में या इसके पूर्व जोड़े? अब पण्डित श्रीरामचरण कौन हैं? पण्डित श्रीरामचरण नामक कोई विद्वान् अभी ज्ञात नहीं हुआ हैं, किन्तु अयोध्या में जानकीघाट की गुरु-परम्परा में रामचरण दास नामक एक सन्त मिलते हैं। इनके गुरु का नाम रघुनाथ प्रसाद था, जो जानकीघाट के महन्त थे। सं. 1888 वि. (1531 ई.) में माघ शुक्ल नवमी को ये रैवासे से अपने गुरु के पास अयोध्या आये थे।