भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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प्रस्तावना भारतीय परम्परा में वैदिक पद्धति यज्ञ प्रधान है, जिसमें देवताओं के निमित्त अग्नि में आहुति देकर उन देवों की उपासना होती है। इन यज्ञों का विवरण हमें ब्राह्मण-ग्रन्थों एवं श्रौत-सूत्रों में मिलता है। परवर्ती काल में पूजन की एक दूसरी परम्परा आरम्भ हुई, जिसमें देवताओं की पूजा अतिथि-पूजा की शैली में होने लगी। यह उपासना की आगम-पद्धति कहलायी। 'बौधायन- गृह्यसूत्र' में दुर्गापूजन, नवग्रहपूजन आदि की जो पद्धति है, वह आगम की पद्धति है, जिसमें आवाहन, पाद्य, अर्घ्य, पुष्पाञ्जलि आदि विधियाँ हैं। 'महाभारत' में भी इस पद्धति का उल्लेख उपलब्ध होता है, अतः इस आगम पद्धति कौ कम से कम ईशा पूर्व द्वितीय शताब्दी तक प्राचीन माना जा सकता है। प्राचीन काल में इस आगम-पद्धति की पाँच शाखाओं का उल्लेख विभिन्न ग्रन्थों में मिलता है। ये शाखायें थीं- सौर, गाणपत्य, शैव, शाक्त एवं पाञ्चरात्र। इनमें पाञ्चरात्र पद्धति वैष्णव उपासना पद्धति है, जिसके विकास में दक्षिण के आलवार वैष्णव सन्तों का पर्याप्त योगदान रहा है। सभी आगमों की परम्परा की एक मुख्य विशेषता रही है कि इसमें सामाजिक समानता का पर्याप्त पोषण हुआ है। वैदिक उपासना पद्धति में आयी जटिलता एवं कट्टरता के विरुद्ध आगम की परम्परा सामाजिक समरसता, लौकिकता एवं सरलता के कारण समाज में व्यापक प्रसिद्धि पा सकी। अतिथि-पूजन की विधि किसी भी भारतीय के लिए प्रायः न तो जटिल प्रक्रिया थी और न ही अबोधगम्य थी। आगम पद्धति इस सरलता का पोषक रही और जन साधारण ने अतिथि की तरह देवपूजन कर देवता को अधिक सन्निकट पाया। वैदिक ऋचाओं की तरह इसके मन्त्रों के उच्चारण में पाण्डित्य और संस्कृत व्याकरण के ज्ञान की अपेक्षा थी, न ही मध्यकाल में भी कोई जातीय प्रतिबन्ध था।