भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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प्रस्तावना (13) जयन्तभट्ट (नवम शती उत्तरार्द्ध) ने 'आगम-डम्बर' प्रहसन में पाञ्चरात्र के सम्बन्ध में जो लिखा है, उससे यह अर्थ निकलता है कि इस परम्परा के उपासक ब्राह्मणेतर थे और उन्हें समाज में ब्राह्मण के समान सम्मान प्राप्त था। वे पाञ्चरात्र आगम के ग्रन्थों का पारायण करते थे और उनके प्रति वैदिक संहिताओं के समान आदर की भावना रखते थे। जिस प्रकार वैदिक संहिताओं में एक भी शब्द का हेरफेर या आगे-पीछे करना अक्षम्य माना गया है, उसी प्रकार पाञ्चरात्र के ग्रन्थों के लिए भी वे ध्यान रखते थे। जयन्त भट्ट की इस रचना में आगम के विभिन्न सम्प्रदायों तथा वैदिक सम्प्रदाय की विशेषताओं का हास्यपरक वर्णन किया गया है। सभी सम्प्रदाय के अनुयायी आपस में लड़ते हैं, नोंकझोंक करते हैं, अपने वर्चस्व के लिए दूसरे सम्प्रदाय पर छींटाकशी करते हैं, किन्तु अन्त में जयन्त भट्ट ने अपने न्यायशास्त्र के पाण्डित्य का उपयोग करते हुए सबके बीच समन्वय करने का प्रयास किया है। इसी क्रम में आगम-डम्बर का प्रसिद्ध श्लोक है- एकः शिवः पशुपतिः कपिलोऽथ विष्णुः संकर्षणो जिनमुनिः सुगतो मनुर्वा। संज्ञाः परं पृथगिमास्तनवोऽपि काम- मव्याकृते तु परमात्मनि नास्ति कोऽपि भेदः।। 4।57 इस 'आगम-डम्बर' के चतुर्थ अंक में वैदिक ऋत्विक् बेचैन होकर कहते हैं कि कानों में बर्छी की तरह मुझे यह बात लग रही है। ऋत्विक्- किं क्रियते? किन्चिदमधिकं मे कर्णशल्यम्। उपाध्यायः- किमिव? ऋत्विक्- यदमी पाञ्चरात्रिकाः भागवताः ब्राह्मणवद् व्यवहरन्ति। ब्राह्मणसमाजमनुप्रविश्य निर्विशङ्कमभिवादय इति जल्यन्ते। विशिष्टस्वरवर्णानुपूर्वीकृतया वेदपाठमनुसरन्त इव पञ्चरात्रग्रन्थमधीयते। ब्राह्मणाः स्म इत्यात्मानं व्यपदिशन्ति व्यपदेशयन्ति च। शैवादयस्तु न चातुर्वर्ण्यमध्यपतिताः, श्रुतिस्मृतिविहितमाश्रममवजहतः शासनान्तरपरिग्रहेणान्यथा वर्तन्ते। एते पुनराजन्मन आसन्ततेः ब्राह्मणा एव वयमिति ब्रुवाणास्तथैव चातुराश्रम्यमनुकुर्वन्तीति महत् दुःखम्। अर्थात् ये पांचरात्रवाले वैष्णव ब्राह्मण के समान व्यवहार करते हैं। ब्राह्मणों के समाज के बीच जाकर कहते हैं कि 'मुझे विना किसी भय के अभिवादन करो। विशेष प्रकार से स्वरों के साथ वर्गों को यथास्थान रखते हुए पाञ्चरात्र के ग्रन्थों का