भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 337 में से

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(44) अगस्त्य-संहिता

अन्त में इस षडक्षर में ॐ, श्रीं, ऐं, क्लीं आदि अन्य बीज लगाकर विभिन्न प्रकार के सकाम प्रयोगों का विवेचन किया गया है। मन्त्र के प्रकार तथा कलशस्थापन-पूर्वक दीक्षा की विधि का संक्षिप्त संकेत है। नवम अध्याय इस अध्याय में श्रीराम के यन्त्र का विस्तृत विवेचन है तथा मालामन्त्रोद्धार वर्णित है। यहाँ मालामन्त्र इस प्रकार है- ह्रीं श्रीं क्लीं नमो भगवते रघुनन्दनाय रक्षोघ्नविशदाय मधुरप्रसन्नवदनाय अमिततेजसे बलाय रामाय विष्णवे नमः। इसे चिन्तामणि-मंत्र भी कहा गया है। इस मालामन्त्र तथा 'श्रीं सीतायै नमः' इस सीता मन्त्र से विलसित यन्त्र पर श्रीराम की पूजा कर के उसे धारण करने से दारिद्र्य-दुःखनाश, सन्तान-प्राप्ति, ऐश्वर्य, विद्या, रोगशान्ति आदि अनेक सांसारिक उद्देश्यों की प्राप्ति कही गयी है। दूसरे द्वारा किए गये अभिचार को रोकने में इसे 'वज्रपञ्जर' की संज्ञा दी गयी है। दशम अध्याय इस अध्याय में श्रीराम की सांगोपांग-अर्चना की विधि का वर्णन है। इसके अनुसार श्रीराम के द्वार, पीठ पर स्थित अंग तथा परिवार देवताओं में गणेश, सूर्य, शिव, क्षेत्रपाल, धात्री, ब्रह्मा, गंगा, यमुना, कुलदेवता, शंख, पद्म, निधि, वास्तोष्पति, लक्ष्मी, गुरु सरस्वती, आधारशक्ति, कूर्म, नागाधिपति, पृथ्वी, क्षीरसागर, धर्म, ज्ञान, वैराग्य, विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, ईशाना, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, हनुमान्, सुग्रीव, भरत विभीषण, लक्ष्मण, अंगद, शत्रुघ्न, जाम्बवान्, धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल, सुमन्त, वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, गोतम, भरद्वाज, कौशिक, वाल्मीकि, नारद, नल, नील, गवय गवाक्ष, गन्धमादन, सुरभि आदि देवों की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि इनके प्रसन्न होने पर ही श्रीराम और श्रीसीता का प्रसाद प्राप्त हो सकेगा। इस अध्याय में एक नारदीय स्तोत्र है, जिसमें इन सभी देवों के प्रति नमस्कार अर्पित किया गया है। इस स्तोत्र को प्रातःकाल पाठ करने से भोग और मोक्ष दोनों की सिद्धि बतलायी गयी है। यहाँ इन देवों की पूजा पंचोपचार, एकादशोपचार या षोडशोपचार से करने का संकेत किया गया है।