भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 51

(48) अगस्त्य-संहिता इसी अध्याय में रामगायत्री का मन्त्रोद्धार तथा पुरश्चरण-विधि वर्णित है। इस रामगायत्री के आदि में अनेक बीज मन्त्र लगाकर काम्य प्रयोगों का भी उल्लेख यहाँ किया गया है तथा तर्पण-विधि की वर्णित है। अष्टादशाध्याय अध्याय के आरम्भ में श्रीराम की पूजा-सामग्रियों का लक्षण बतलाया गया है। जो पुष्प दूसरे देवता को नहीं चढ़ाया गया हो, पवित्र, सुगन्धित, श्वेत अथवा पीत वर्ण का हो, कीड़े आदि न लगे हों वे पुष्प श्रीराम की पूजा में विहित है। सदावर्त नामक, शंख, जिसकी पीठ तथा मध्य भाग में कमल-नाल का चिह्न हो, शुभ्र जल से पूर्ण हो, पूजन में प्रशस्त है। पाद्य, अर्घ्य आदि के पात्र ताम्बा अथवा सुवर्ण का बना होना चाहिए। ये पूजा-साधन तीन प्रकार के होते हैं- उत्तम मध्यम एवं अधम। पूजा कर्म के वैशिष्ट्य से देश एवं काल के अनुसार शक्ति तथा औचित्य के अनुसार ऐसे साधनों का व्यवहार करें, जिन्हें लोक में निन्दित नही माना जाता हो। आगे पूजन विधि के क्रम में विभिन्न मुद्राओं-आवाहनी, स्थापनी, सन्निधीकरणी आदि का वर्णन है। दोनों हाथों के अंगूठे को ऊपर की ओर खड़ा कर मुट्ठी बाँध लेने से संनिधीकरणी मुद्रा बनतीं है। इसी मुद्रा में यदि दोनों अंगूठे अन्दर दबे हों तो संनिरोधनी मुद्रा कहलाती है। इसी प्रकार शंख, चक्र, गदा, पद्म, धेनु, कौस्तुभ, श्रीवत्स, वनमाला, योनि आदि दश मुद्राओं के लक्षण दिये गये हैं, जो देवार्चन में प्रशस्त हैं। आगे यजमान के बैठने के भी आसनों का वर्णन किया गया है- स्वस्तिक, वज्र, वीर, पद्म, योग, गोमुख आदि। इन आसनों के लक्षण यहाँ वर्णित हैं। अध्याय के अन्त में निर्देश है कि जो विष्णुभक्त न हों, उन्हें ये सब रहस्य कहना नहीं चाहिए। एकोनविंशाध्यायः इस अध्याय के आरम्भ में श्रीराम के षडक्षर मन्त्र का माहात्म्य बतलाया गया है। हे सुतीक्ष्ण! गाणपत्य, शैव, सौर, शाक्त एवं वैष्णव मन्त्रों में श्रीराम का मन्त्र श्रेष्ठ है। श्रीराम के भी अन्य मन्त्रों की अपेक्षा यह षडक्षर मन्त्र अनायास फल देनेवाला है, अतः इसे मन्त्रराज कहा गया है। इसके जप और पुरश्चरण से ब्रह्म-हत्यादि पाप नष्ट हो जाते हैं, भूत प्रेत, पिशाच, ग्रह और राक्षस सब भाग