अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 107, कुल 878 में से
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मुक्त हो जाता है। प्रतिदिन यज्ञोंद्वारा भगवान्की आराधना करनेवालेको जो महान् फल मिलता है, उसी फलको, जो विष्णुका मन्दिर बनवाता है, वह भी प्राप्त करता है। जो भगवान् अच्युतका मन्दिर बनवाता है, वह अपनी बीती हुई सौ पीढ़ीके पितरोंको तथा होनेवाले सौ पीढ़ीके वंशजोंको भगवान् विष्णुके लोकको पहुँचा देता है। भगवान् विष्णु ससलोकमय हैं। उनका मन्दिर जो बनवाता है, वह अपने कुलको तारता है, उन्हें अक्षय लोकोंकी प्राप्ति कराता है और स्वयं भी अक्षय लोकोंको प्राप्त होता है। मन्दिरमें ईंटके समूहका जोड़ जितने वर्षोंतक रहता है, उतने ही हजार वर्षोंतक उस मन्दिरके बनवानेवालेकी स्वर्गलोकमें स्थिति होती है। भगवान्की प्रतिमा बनानेवाला विष्णुलोकको प्राप्त होता है, उसकी स्थापना करनेवाला भगवान्में लीन हो जाता है और देवालय बनवाकर उसमें प्रतिमाकी स्थापना करनेवाला सदा भगवान्के लोकमें निवास पाता है* ॥ ४२—५० ॥
अग्निदेव बोले—यमराजके इस प्रकार आज्ञा देनेपर यमके दूत भगवान् विष्णुकी स्थापना आदि करनेवालोंको यमलोकमें नहीं ले जाते। देवताओंकी प्रतिष्ठा आदिकी विधिका भगवान् हयग्रीवने ब्रह्माजीसे वर्णन किया था ॥ ५१ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'देवालय-निर्माण माहात्म्यादिका वर्णन' नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥
उन्तालीसवाँ अध्याय
विष्णु आदि देवताओंकी स्थापनाके लिये भूपरिग्रहका विधान
भगवान् हयग्रीव कहते हैं—ब्रह्मन् ! अब मैं विष्णु आदि देवताओंकी प्रतिष्ठाके विषयमें कहूँगा, ध्यान देकर सुनिये। इस विषयमें मेरे द्वारा वर्णित पञ्चरात्रों एवं सप्तरात्रोंका ऋषियोंने मानवलोकमें प्रचार किया है। वे संख्यामें पच्चीस हैं। (उनके नाम इस प्रकार हैं—) आदिहयशीर्षतन्त्र, त्रैलोक्यमोहनतन्त्र, वैभवतन्त्र, पुष्करतन्त्र, प्रह्लादतन्त्र, गार्ग्यतन्त्र, गालवतन्त्र, नारदीयतन्त्र, श्रीप्रश्वतन्त्र, शाण्डिल्यतन्त्र, ईश्वरतन्त्र, सत्यतन्त्र, शौनकत्तन्त्र, वसिष्ठोक्त ज्ञानसागरतन्त्र, स्वायम्भुवतन्त्र, कापिलतन्त्र, तार्क्ष्य (गारुड)-तन्त्र, नारायणीयतन्त्र, आत्रेयतन्त्र, नारसिंहतन्त्र, आनन्दतन्त्र, आरुणतन्त्र, बौधायनतन्त्र, अष्टाङ्गतन्त्र और विश्वतन्त्र ॥ १—५ ॥
इन तन्त्रोंके अनुसार मध्यदेश आदिमें उत्पन्न द्विज देवविग्रहोंकी प्रतिष्ठा करे। कच्छदेश, कावेरीतटवर्ती देश, कोंकण, कामरूप, कलिङ्ग, काञ्ची तथा काश्मीर देशमें उत्पन्न ब्राह्मण देवप्रतिष्ठा आदि न करे। आकाश, वायु, तेज, जल एवं पृथ्वी—
* ये पुष्पधूपवासोभिर्भूषणैश्चातिवल्लभैः । अर्चयन्ति न ते ग्राह्या नराः कृष्णालये गताः ॥
उपलेपनकर्तारः सम्मार्जनपराश्च ये । कृष्णालये परित्याज्यास्तेषां पुत्रास्तथा कुलम् ॥
येन चायतनं विष्णोः कारितं तत्कुलोद्भवम् । पुंसां शतं नावलोक्यं भवद्भिर्दुष्टचेतसा ॥
यस्तु देवालयं विष्णोर्दारुशैलमयं तथा । कारयेन्मृन्मयं वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
अह्न्यहनि यज्ञेन यजतो यन्महाफलम् । प्राप्नोति तत्फलं विष्णोर्यः कारयति केतनम् ॥
कुलानां शतमागामि समतीतं तथा शतम् । कारयन् भगवद्धाम नयत्यच्युतलोकताम् ॥
ससलोकमयो विष्णुस्तस्य यः कुरुते गृहम् । तारयत्यक्षयाँल्लोकानक्षयान् प्रतिपद्यते ॥
इष्टकाचयविन्यासो यावन्त्यब्दानि तिष्ठति । तावद्वर्षसहस्राणि तत्कर्तुर्दिवि संस्थितिः ॥
प्रतिमाकृद् विष्णुलोकं स्थापको लीयते हरौ । देवसद्यप्रतिकृतिप्रतिष्ठाकृत्तु गोचरे ॥
(अग्निपु० ३८ । ४२—५०)