अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 108, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ४० * ८९
ये पञ्चमहाभूत पञ्चरात्र हैं। जो चेनाशून्य एवं अज्ञानान्धकारसे आच्छन्न हैं, वे पञ्चरात्रसे रहित हैं। जो मनुष्य यह धारणा करता है कि 'मैं पापमुक्त परब्रह्म विष्णु हूँ'—वह देशिक होता है। वह समस्त बाह्य लक्षणों (वेष आदि)-से हीन होनेपर भी तन्त्रवेत्ता आचार्य माना गया है॥६-८$\frac{\text{१}}{\text{२}}$॥
देवताओंकी नगराभिमुख स्थापना करनी चाहिये। नगरकी ओर उनका पृष्ठभाग नहीं होना चाहिये। कुरुक्षेत्र, गया आदि तीर्थस्थानोंमें अथवा नदीके समीप देवालयका निर्माण कराना चाहिये। ब्रह्माका मन्दिर नगरके मध्यमें तथा इन्द्रका पूर्व दिशामें उत्तम माना गया है। अग्निदेव तथा मातृकाओंका आग्नेयकोणमें, भूतगण और यमराजका दक्षिणमें, चण्डिका, पितृगण एवं दैत्यादिका मन्दिर नैर्ऋत्य-कोणमें बनवाना चाहिये। वरुणका पश्चिममें, वायुदेव और नागका वायव्यकोणमें, यक्ष या कुबेरका उत्तर दिशामें, चण्डीश-महेशका ईशानकोणमें और विष्णुका मन्दिर सभी ओर बनवाना श्रेष्ठ है। ज्ञानवान् मनुष्यको पूर्ववर्ती देव-मन्दिरको संकुचित करके अल्प, समान या विशाल मन्दिर नहीं बनवाना चाहिये॥९-१३$\frac{\text{१}}{\text{२}}$॥
(किसी देव-मन्दिरके समीप मन्दिर बनवानेपर) दोनों मन्दिरोंकी ऊँचाईके बराबर दुगुनी सीमा छोड़कर नवीन देव-प्रासादका निर्माण करावे। विद्वान् व्यक्ति दोनों मन्दिरोंको पीडित न करे। भूमिको शोधन करनेके बाद भूमि-परिग्रह करे। तदनन्तर प्राकारकी सीमातक माष, हरिद्राचूर्ण, खील, दधि और सक्तुसे भूतबलि प्रदान करे। फिर अष्टाक्षरमन्त्र पढ़कर आठों दिशाओंमें सक्तु बिखेरते हुए कहे—'इस भूमिखण्डपर जो राक्षस एवं पिशाच आदि निवास करते हों, वे सब यहाँसे चले जायँ। मैं यहाँपर श्रीहरिके लिये मन्दिरका निर्माण करूँगा$^{१}$।' फिर भूमिको हलसे जुतवाकर गोचारण करावे। आठ परमाणुका 'रथरेणु' माना गया है। आठ रथरेणुका 'त्रसरेणु' माना जाता है। आठ त्रसरेणुका 'बालाग्र' तथा आठ बालाग्रकी 'लिक्षा' कही जाती है। आठ लिक्षाकी 'यूका,' आठ यूकाका 'यवमध्यम', आठ यवका 'अङ्गुल,' चौबीस अङ्गुलका 'कर' और अट्ठाईस अङ्गुलका 'पद्महस्त' होता है$^{२}$॥१४-२१॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें विष्णु आदि देवताओंकी स्थापनाके लिये 'भूपरिग्रहका वर्णन' नामक उन्तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥३९॥
चालीसवाँ अध्याय वास्तुमण्डलवर्ती देवताओंके स्थापन, पूजन, अर्घ्यदान तथा बलिदान आदिकी विधि
**भगवान् हयग्रीव कहते हैं—**ब्रह्मन्! पूर्वकालमें सम्पूर्ण भूत-प्राणियोंके लिये भयंकर एक महाभूत था। देवताओंने उसे भूमिमें निहित कर दिया। उसीको 'वास्तुपुरुष' माना गया है। चतुःषष्टि पदोंसे युक्त क्षेत्रमें अर्धकोणमें स्थित ईश (या शिखी)-को घृत एवं अक्षतोंसे तृप्त करे। फिर एक पदमें स्थित पर्जन्यको कमल तथा जलसे, दो पदोंमें स्थित जयन्तको पताकासे, दो कोष्ठोंमें
१. राक्षसाश्च पिशाचाश्च येऽस्मिंस्तिष्ठन्ति भूतले। सर्वे ते व्यपगच्छन्तु स्थानं कुर्यामहं हरेः॥ २. श्रीविद्यार्णवतन्त्रमें यह मान इस प्रकार दिया गया है— वातायनपथं प्राप्य ये भान्ति रविरश्मयः। तेषु सूक्ष्मा विसर्पन्ते रेणवस्त्रसरेणवः॥ परमाणोरष्टगुणस्त्रसरेणुरुदाहृतः । तेऽष्टौ केशाग्रयास्तेऽष्टौ लिक्षा यूकास्तदष्टकम्॥ तदष्टकं यवस्तेऽष्टावङ्गुलिः समुदाहृता। सा तूत्तमाङ्गुलिः सप्तयवा सैव तु मध्यमा॥ षड्यवा साधमा प्रोक्ता मानाङ्गुलमितीरितम्॥ (१२।१-४)