अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 135, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें१०८ * अग्निपुराण *
बनता है। प्रासादकी ऊँचाईके मानको सोलह अंशोंमें विभक्त करके उसमेंसे चार, छः और आठ अंशोंद्वारा क्रमशः हीन, मध्यम और ज्येष्ठ द्वार निर्मित होता है। द्वारकी ऊँचाईमेंसे एक चौथाई कम कर दिया जाय तो वह लिङ्गकी ऊँचाईका मान है। लिङ्गशिलाके गर्भके आधे भागतककी ऊँचाईका शिवलिङ्ग 'अधम' (कनिष्ठ) होता है और तीन भूतांश ($३\times ५=$) पंद्रह अंशोंके बराबरकी ऊँचाईका शिवलिङ्ग 'ज्येष्ठ' कहा गया है। इन दोनोंके बीचमें बराबरकी ऊँचाईपर सात जगह सूत्रपात (सूतद्वारा रेखा) करे। इस तरह नौ सूत (सूत्रनिर्मित रेखाचिह्न) होंगे। इन नौ सूतोंमेंसे पाँच सूतोंकी ऊँचाईके मापका शिवलिङ्ग 'मध्यम' होगा। लिङ्गोंकी लंबाई (या ऊँचाई) उत्तरोत्तर दो-दो अंशके अन्तरसे होगी। इस तरह लिङ्गोंकी दीर्घता बढ़ती जायगी और नौ लिङ्ग निर्मित होंगे$^१$ ॥ १४-१८॥
यदि हाथके मापसे नौ लिङ्ग बनाये जायँ तो पहला लिङ्ग एक हाथका होगा, फिर दूसरेके मापमें पहलेसे एक हाथ बढ़ जायगा; इस प्रकार जबतक नौ हाथकी लंबाई पूरी न हो जाय तबतक शिला या काष्ठकी मापमें एक-एक हाथ बढ़ाते रहेंगे। ऊपर जो हीन, मध्यम और उत्तम-तीन प्रकारके लिङ्ग बताये गये हैं, उनमेंसे प्रत्येकके तीन-तीन भेद हैं। बुद्धिमान् पुरुष एक-एक लिङ्गमें विभागपूर्वक तीन-तीन लिङ्गका निर्माण करावें। छः अङ्गुल और नौ अङ्गुलके शिवलिङ्गोंमें भी तीन-तीन लिङ्ग-निर्माण करावे। स्थिर लिङ्ग द्वारमान, गर्भमान तथा हस्तमान-इन तीन दीर्घ प्रमाणों (मापों)-के अनुसार बनाना चाहिये। उक्त तीन मापोंके अनुसार ही उसकी तीन संज्ञाएँ हैं-भोगेश, जलेश तथा देवेश। विष्कम्भ (विस्तार)-के अनुसार लिङ्गके चार रूप लक्षित करे। दीर्घप्रमाणके अनुसार सम्पादित होनेवाले तीन रूपोंमें निर्दिष्ट लिङ्गको शुभ आय आदिसे युक्त करके निर्मित करावे। उन त्रिविध लिङ्गोंकी लंबाई चार या आठ-आठ हाथकी हो-यह अभीष्ट है। वे क्रमशः त्रितत्त्वरूप अथवा त्रिगुणरूप हैं। जो लिङ्ग जितने हाथका हो, उसका अङ्गुल बनाकर आय-संख्या (८), स्वर-संख्या (७), भूत-संख्या (५) तथा अग्नि-संख्या (३)-से पृथक्-पृथक् भाग दे। जो शेष बचे उसके अनुसार शुभाशुभ फलको जाने ॥ १९-२४ ॥
ध्वजादि आयोंमेंसे ध्वज, सिंह, हस्ती और वृषभ-ये श्रेष्ठ हैं$^२$। अन्य चार आय अशुभ हैं। (सात संख्यासे भाग देनेपर जो शेष बचे, उसके अनुसार स्वरका निश्चय करे।) स्वरोंमें षड्ज, गान्धार तथा पञ्चम शुभदायक हैं। [पाँचसे भाग देनेपर जो शेष बचे, उसके अनुसार पृथ्वी आदि भूतोंका निश्चय करे।] भूतोंमें पृथ्वी ही शुभ है। [तीनसे भाग देनेपर जो शेष रहे, तदनुसार अग्नि जाने।] अग्नियोंमें आहवनीय अग्नि ही शुभ है।
१. 'समराङ्गणसूत्रधार' में कहा है कि दो-दो अंशकी वृद्धि करते हुए तीन हाथकी लंबाई-तक पहुँचते-पहुँचते नौ लिङ्ग निर्मित हो सकते हैं-'द्व्यंशवृद्ध्या नवैवं स्युराहस्तत्रितयावधेः।'
२. 'अपराजितपृच्छा' के 'आयाधिकार' नामक चौंसठवें सूत्रमें आयोंके नाम इस प्रकार दिये गये हैं-ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वान, वृष, गर्दभ, गज और ध्वांक्ष (काक)। इनकी स्थिति पूर्वादि दिशाओंमें प्रदक्षिण-क्रमसे है। देवालयके लिये ध्वज, सिंह, वृष और गज-ये आय श्रेष्ठ कहे गये हैं। अधमोंके लिये शेष आय सुखावह हैं। सत्ययुगमें ध्वज, त्रेतामें सिंह, द्वापरमें वृषभ और कलियुगमें गजी नामक आयका प्राधान्य है। सिंह नामक आय मुख्यतः राजाओंके लिये कल्याणकारक है; ब्राह्मणके लिये ध्वज प्रशस्त है तथा वैश्यके लिये वृष। ध्वज आयमें अर्थलाभ होता है और धूम्रमें संताप। सिंह आयमें विपुल भोग उपस्थित होते हैं। श्वान नामक आयमें कलह होता है। वृषभमें धन-धान्यकी वृद्धि होती है। गर्दभमें स्त्रियोंका चरित्र दूषित होता है। हाथी नामक आयमें सब लोग शुभ देखते हैं और काक नामक आय होनेपर निश्चय ही मृत्यु होती है। (श्लोक ९-१६)