भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 878 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 136
  • अध्याय ५४ * १०९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

उक्त लिङ्गकी लंबाईको आधा करके उसमें आठसे भाग देनेपर यदि शेष सातसे अधिक हो तो वह लिङ्ग ‘आढ्य’ कहा जाता है। यदि पाँचसे अधिक शेष रहे तो वह ‘अनाढ्य’ है। यदि छः अंशसे अधिक शेष हो तो वह लिङ्ग ‘देवेज्य’ है और यदि तीन अंशसे अधिक शेष हो तो उस लिङ्गको ‘अर्कतुल्य’ माना जाता है। ये चारों ही प्रकारके लिङ्ग चतुष्कोण होते हैं। पाँचवाँ ‘वर्धमान’ संज्ञक लिङ्ग है, उसमें व्याससे नाह बढ़ा हुआ होता है। व्यासके समान नाह एवं व्याससे बढ़ा हुआ नाह—इस प्रकार इन लिङ्गोंके दो भेद हो जाते हैं। विश्वकर्म-शास्त्रके अनुसार इन सबके बहुत-से भेद बताये जायँगे। आढ्य आदि लिङ्गोंकी स्थूलता आदिके कारण तीन भेद और होते हैं। उनमें एक-एक यवकी वृद्धि करनेसे वे सब आठ प्रकारके लिङ्ग होते हैं। फिर हस्तमानसे ‘जिन’ संज्ञक लिङ्गके भी तीन भेद होंगे। उसको सर्वसम लिङ्गमें जोड़ लिया जायगा॥ २५—२९॥

अनाढ्य, देवार्चित तथा अर्कतुल्यमें भी पाँच-पाँच भेद होनेसे ये पच्चीस होंगे। ये सब एक, जिन और भक्त—भेदोंसे पचहत्तर हो जायँगे। सबका आकलन करनेसे पंद्रह हजार चार सौ शिवलिङ्ग हो सकते हैं।* इसी तरह आठ अङ्गुलके विस्तारवाला लिङ्ग भी एकाङ्गुल मान, हस्तमान एवं गर्भमानके अनुसार नौ भेदोंसे युक्त है। इन सबके कोण तथा अर्द्धकोणस्थ सूत्रोंद्वारा कोणोंका छेदन (विभाजन) करे। लिङ्गके मध्यभागके


* अग्निपुराण अध्याय ५४ के २८वें श्लोकमें विश्वकर्माके कथनानुसार लिङ्ग-भेदोंकी परिगणना की गयी है और सब मिलाकर चौदह हजार चौदह सौ भेद कहे गये हैं। इस प्रकरणका मूल पाठ अपने शुद्धरूपमें उपलब्ध नहीं हो रहा है; अतएव यहाँ दी हुई गणना बैठ नहीं रही है। परंतु विश्वकर्माके शास्त्र ‘अपराजितपृच्छा’ के अवलोकनसे इन भेदोंपर विशेष प्रकाश पड़ता है। उसके अनुसार समस्त लिङ्ग-भेद १४४२० होते हैं। किस प्रकार, सो बताया जाता है—प्रस्तरमय लिङ्ग कम-से-कम एक हाथका होता है, उससे कम नहीं। उसका अन्तिम आयाम नौ हाथका बताया गया है। इस प्रकार एक हाथसे लेकर नौ हाथतकके लिङ्ग बनाये जायँ तो उनकी संख्या नौ होती है। इनका प्रस्तार यों समझना चाहिये।

एक हाथसे तीन हाथतकके शिवलिङ्ग ‘कनिष्ठ’ कहे गये हैं। चारसे छः हाथतकके ‘मध्यम’ माने गये हैं और सातसे नौतकके ‘उत्तम’ या ‘ज्येष्ठ’ कहे गये हैं। इन तीनोंके प्रमाणमें पादवृद्धि करनेसे कुल ३३ शिवलिङ्ग होते हैं। यथा—

एक हाथ¹, सवा हाथ², डेढ़ हाथ³, पौने दो हाथ⁴, दो हाथ⁵, सवा दो हाथ⁶, ढाई हाथ⁷, पौने तीन हाथ⁸, तीन हाथ⁹, सवा तीन हाथ¹⁰, साढ़े तीन हाथ¹¹, पौने चार हाथ¹², चार हाथ¹³, सवा चार हाथ¹⁴, साढ़े चार हाथ¹⁵, पौने पाँच हाथ¹⁶, पाँच हाथ¹⁷, सवा पाँच हाथ¹⁸, साढ़े पाँच हाथ¹⁹, पौने छः हाथ²⁰, छः हाथ²¹, सवा छः हाथ²², साढ़े छः हाथ²³, पौने सात हाथ²⁴, सात हाथ²⁵, सवा सात हाथ²⁶, साढ़े सात हाथ²⁷, पौने आठ हाथ²⁸, आठ हाथ²⁹, सवा आठ हाथ³⁰, साढ़े आठ हाथ³¹, पौने नौ हाथ³², नौ हाथ³³।

इन तैंतीसोंके नाम विश्वकर्माने क्रमशः इस प्रकार बताये हैं—१. भव, २. भवोद्भव, ३. भाव, ४. संसारभयनाशन, ५. पाशयुक्त, ६. महातेज, ७. महादेव, ८. परात्पर, ९. ईश्वर, १०. शेखर, ११. शिव, १२. शान्त, १३. मनोल्हादक, १४. रुद्रतेज, १५. सदात्मक (सद्योजात), १६. वामदेव, १७. अघोर, १८. तत्पुरुष, १९. ईशान, २०. मृत्युंजय, २१. विजय, २२. किरणाक्ष, २३. अघोरास्त्र, २४. श्रीकण्ठ, २५. पुण्यवर्धन, २६. पुण्डरीक, २७. सुवक्त्र, २८. उमातेजः, २९. विश्वेश्वर, ३०. त्रिनेत्र, ३१. त्र्यम्बक, ३२. घोर, ३३. महाकाल।

पूर्वोक्तक्रमसेपादार्धवृद्धि करनेपर६५तकसंख्यापहुँचेगी।
दो अङ्गुल वृद्धि करनेपर९७तक
एक अङ्गुल वृद्धि करनेपर१९३तक
अर्द्धाङ्गुल वृद्धि करनेपर३८५तक
अङ्गुलका चतुर्थांश बढ़ानेपर७६९तक
एक-एक मूूँगके मानकी वृद्धि करनेपर१४४२तक
मुद्ग-प्रमाण लिङ्गोंमें प्रत्येकके दस भेद करनेपर१४४२०तक