अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 138, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ५५ * १११
अङ्गोंका निर्माण होना चाहिये। एकमुखलिङ्गको बाहुरहित बनाना चाहिये। एकमुखलिङ्गमें विस्तारके छठे अंशसे मुखका निर्गमन हितकर कहा गया है। मुखयुक्त जितने भी लिङ्ग हैं, उन सबका शिरोभाग त्रपुषाकार या कुक्कुटाण्डके समान गोलाकार होना चाहिये ॥ ४५–४८ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'लिङ्गमान एवं व्यक्ताव्यक्त लक्षण आदिका वर्णन' नामक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥
पचपनवाँ अध्याय
पिण्डिकाका लक्षण
श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं—ब्रह्मन्! अब मैं प्रतिमाओंकी पिण्डिकाका लक्षण बता रहा हूँ। पिण्डिका लंबाईमें तो प्रतिमाके बराबर होनी चाहिये और चौड़ाईमें उससे आधी। उसकी ऊँचाई भी प्रतिमाकी लंबाईसे आधी हो और उस अर्द्धभागके बराबर ही वह सुविस्तृत हो। अथवा उसका विस्तार लंबाईके तृतीयांशके तुल्य हो। उसके एक तिहाई भागको लेकर मेखला बनावे। पानी बहनेके लिये जो खात या गर्त हो, उसका माप भी मेखलाके ही तुल्य रहे। वह खात उत्तर दिशाकी ओर कुछ नीचा होना चाहिये। पिण्डिकाके विस्तारके एक चौथाई भागसे जलके निकलनेका मार्ग (प्रणाल) बनाना चाहिये। मूल भागमें उसका विस्तार मूलके ही बराबर हो, परंतु आगे जाकर वह आधा हो जाय। पिण्डिकाके विस्तारके एक तिहाई भागके अथवा पिण्डिकाके आधे भागके बराबर वह जलमार्ग हो। उसकी लंबाई प्रतिमाकी लंबाईके तुल्य ही बतायी गयी है। अथवा प्रतिमा ही उसकी लंबाईके तुल्य हो। इस बातको अच्छी तरह समझकर उसका सूत्रपात करे ॥ १–५ ॥
प्रतिमाकी ऊँचाई पूर्ववत् सोलह भागकी संख्याके अनुसार करे। छः और दो अर्थात् आठ भागोंको नीचेके आधे अङ्गमें गतार्थ करे। इससे ऊपरके तीन भागको लेकर कण्ठका निर्माण करे। शेष भागोंको एक-एक करके प्रतिष्ठा, निर्गम तथा पट्टिका आदिमें विभाजित करे। यह सामान्य प्रतिमाओंमें पिण्डिकाका लक्षण बताया गया है। प्रासादके द्वारके दैर्घ्य-विस्तारके अनुसार प्रतिमा-गृहका भी द्वार कहा गया है। प्रतिमाओंमें हाथी और व्याल (सर्प या व्याघ्र आदि)-की मूर्तियोंसे युक्त तत्तत्-देवताविषयक शोभाकी रचना करे ॥ ६–८ ॥
श्रीहरिकी पिण्डिका भी सदा यथोचित शोभासे सम्पन्न बनायी जानी चाहिये। सभी देवताओंकी प्रतिमाओंके लिये वही मान बताया जाता है, जो विष्णु-प्रतिमाके लिये कहा गया है तथा सम्पूर्ण देवियोंके लिये भी वही मान बताया जाता है, जो लक्ष्मीजीकी प्रतिमाके लिये कहा गया है ॥ ९-१० ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पिण्डिकाके लक्षणका वर्णन' नामक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥