अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 139, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें११२ * अग्निपुराण *
छप्पनवाँ अध्याय
प्रतिष्ठाके अङ्गभूत मण्डपनिर्माण, तोरण-स्तम्भ, कलश एवं ध्वजके स्थापन तथा दस दिक्पाल-यागका वर्णन
श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं—ब्रह्मन्! मैं प्रतिष्ठाके पाँच अङ्गोंका वर्णन करूँगा। प्रतिमा पुरुषका प्रतीक है तो पिण्डिका प्रकृतिका, अथवा प्रतिमा नारायणका स्वरूप है तो पिण्डिका लक्ष्मीका। उन दोनोंके योगको 'प्रतिष्ठा' कहते हैं। इसलिये इच्छानुरूप फल चाहनेवाले मनुष्योंद्वारा इष्टदेवताकी प्रतिष्ठा (स्थापना)-की जाती है। आचार्यको चाहिये कि वह मन्दिरके सामने गर्भसूत्रको निकालकर आठ, सोलह अथवा बीस हाथका मण्डप तैयार करे। इनमें आठ हाथका मण्डप 'निम्न', सोलह हाथका 'मध्यम' और बीस हाथका 'उत्तम' माना गया है। मण्डपमें देवताके स्नानके लिये, कलश-स्थापनके लिये तथा याग-सम्बन्धी द्रव्योंको रखनेके लिये आधा स्थान सुरक्षित कर ले। फिर मण्डपके आधे या तिहाई भागमें सुन्दर वेदी बनावे। उसे बड़े-बड़े कलशों, छोटे-छोटे घड़ों और चँदोवे आदिसे विभूषित करे। पञ्चगव्यसे मण्डपके भीतरके स्थानोंका प्रोक्षण करके वहाँ सब सामग्री रखे। तत्पश्चात् गुरु वस्त्र एवं माला आदिसे अलंकृत हो, भगवान् विष्णुका ध्यान करके उनका पूजन करे॥ १-५॥
अँगूठी आदि भूषणों तथा प्रार्थना आदिसे मूर्तिपालक विद्वानोंका सत्कार करके कुण्ड-कुण्डपर उन्हें बिठावे। वे वेदोंके पारंगत हों। चौकोर, अर्धचन्द्र, गोलाकार अथवा कमल-सदृश आकारवाले कुण्डोंपर उन विद्वानोंको विराजमान करना चाहिये। पूर्व आदि दिशाओंमें तोरण (द्वार)-के लिये पीपल, गूलर, वट और प्लक्षके वृक्षके काष्ठका उपयोग करना चाहिये। पूर्व दिशाका द्वार 'सुशोभन' नामसे प्रसिद्ध है। दक्षिण दिशाका द्वार 'सुभद्र' कहा गया है, पश्चिमका द्वार 'सुकर्मा' और उत्तरका 'सुहोत्र' नामसे प्रसिद्ध है। ये सभी तोरण-स्तम्भ पाँच हाथ ऊँचे होने चाहिये। इनकी स्थापना करके 'स्योना* पृथिवि नो—' (शु० यजु० ३६। १३) इस मन्त्रसे पूजन करे। तोरण-स्तम्भके मूलभागमें मङ्गल अङ्कुर (आम्र-पल्लव, यवाङ्कुर आदि)-से युक्त कलश स्थापित करे॥ ६-९॥
तोरणस्तम्भके ऊपरी भागमें सुदर्शनचक्रकी स्थापना करे। इसके अतिरिक्त विद्वान् पुरुषोंको वहाँ पाँच हाथका ध्वज स्थापित करना चाहिये। उस ध्वजकी चौड़ाई सोलह अङ्गुलकी हो। सुरश्रेष्ठ! उस ध्वजका दण्ड सात हाथ ऊँचा होना चाहिये। अरुणवर्ण, अग्निवर्ण (धूम्रवर्ण), कृष्ण, शुक्ल, पीत, रक्त तथा श्वेत—ये वर्ण क्रमशः पूर्वादि दिशाओंमें ध्वजमें होने चाहिये। कुमुद, कुमुदाक्ष, पुण्डरीक, वामन, शङ्कुकर्ण, सर्पनेत्र, सुमुख और सुप्रतिष्ठित—ये क्रमशः पूर्व आदि ध्वजोंके पूजनीय देवता हैं। इनमें करोड़ों दिव्य गुण विद्यमान हैं। कलश ऐसे पके हुए हों कि सुपक्व बिम्बफलके समान लाल दिखायी देते हों। वे एक-एक आढक जलसे पूर्णतः भरे हों। उनकी संख्या एक सौ अट्ठाईस हो। उनकी स्थापना ऐसे समय करनी चाहिये, जब कि 'कालदण्ड' नामक योग न हो। उन सभी कलशोंमें सुवर्ण डाला गया हो। उनके कण्ठभागमें वस्त्र लपेटे गये हों। वे जलपूर्ण कलश तोरणसे
* पूरा मन्त्र इस प्रकार है—ॐ स्योना पृथिवि नो भवानृक्षरा निवेशनी। यच्छा नः शर्म सप्रथाः॥ (शु० यजु० ३६। १३)