अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 140, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ५६ * ११३
बाहर स्थापित किये जायँ॥ १०—१५॥
वेदीके पूर्व आदि दिशाओं तथा कोणोंमें भी कलश स्थापित करने चाहिये। पहले पूर्वादि चारों दिशाओंमें चार कलश स्थापित करे। उस समय ‘आजिघ्र$^१$ कलशम्’ आदि मन्त्रका पाठ करना चाहिये। उन कलशोंमें पूर्वादि दिशाओंके क्रमसे इन्द्र आदि दिक्पालोंका आवाहनपूर्वक पूजन करे। इन्द्रका आवाहन करते समय इस प्रकार कहे—'ऐरावत हाथीपर बैठे और हाथमें वज्र धारण किये देवराज इन्द्र! यहाँ आइये और अन्य देवताओंके साथ मेरे पूर्व द्वारकी रक्षा कीजिये। देवताओंसहित आपको नमस्कार है।' इस तरह आवाहन करके विद्वान् पुरुष 'त्रातारमिन्द्रम्$^२$ ०'—इत्यादि मन्त्रसे उनकी अर्चना एवं आराधना करे॥ १६—१८॥
इसके बाद निम्नाङ्कितरूपसे अग्निदेवका आवाहन करे—'बकरेपर आरूढ शक्तिधारी एवं बलशाली अग्निदेव! आइये और देवताओंके साथ अग्निकोणकी रक्षा कीजिये। यह पूजा ग्रहण कीजिये। आपको नमस्कार है।' तदनन्तर ‘अग्निर्मूर्द्धा$^३$ ०’ इत्यादिसे अथवा ‘अग्नये नमः।’—इस मन्त्रसे अग्निकी पूजा करे। यमराजका आवाहन—'महिषपर आरूढ, दण्डधारी, महाबली सूर्यपुत्र यम! आप यहाँ पधारिये और दक्षिण द्वारकी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है।' इस प्रकार आवाहन करके ‘वैवस्वतं सङ्गमनम् ०’ इत्यादि मन्त्रसे यमराजकी पूजा करे। निर्ऋतिका आवाहन—'बल और वाहनसे सम्पन्न खड्गधारी निर्ऋति! आइये। आपके लिये यह अर्घ्य है, यह पाद्य है। आप नैर्ऋत्य दिशाकी रक्षा कीजिये।' इस तरह आवाहन करके ‘एष$^४$ ते निर्ऋते०’ इत्यादिसे मनुष्य अर्घ्य आदि उपचारोंद्वारा निर्ऋतिकी पूजा करे॥ १९—२२ $\frac{१}{२}$॥
वरुणका आवाहन—'मकरपर आरूढ पाशधारी महाबली वरुणदेव! आइये और पश्चिम द्वारकी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है।' इस प्रकार आवाहन करके, ‘उरुं$^५$ हि राजा वरुणः०’ इत्यादि मन्त्रोंद्वारा आचार्य वरुणदेवताका अर्घ्य आदिसे पूजन करे। वायुदेवताका आवाहन—'अपने वाहनपर आरूढ ध्वजधारी महाबली वायुदेव! आइये और देवताओं तथा मरुद्गणोंके साथ वायव्यकोणकी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है।' ‘वात$^६$ आवातु०’ इत्यादि वैदिक मन्त्रसे अथवा ‘ॐ नमो वायवे०।’ इस मन्त्रसे वायुकी पूजा करे॥ २३—२५ $\frac{१}{२}$॥
सोमका आवाहन—'बल और वाहनसे सम्पन्न गदाधारी सोम! आप यहाँ पधारिये और उत्तर द्वारकी रक्षा कीजिये। कुबेरसहित आपको नमस्कार है।' इस प्रकार आवाहन करके, ‘सोमं$^७$ राजानम्०’ इत्यादिसे अथवा ‘सोमाय नमः।’ इस मन्त्रसे सोमकी पूजा करे। ईशानका आवाहन—'वृषभपर आरूढ़ महाबलशाली शूलधारी ईशान! पधारिये और यज्ञ-मण्डपकी ईशान-दिशाका संरक्षण कीजिये। आपको नमस्कार है।' इस प्रकार आवाहन
१-आजिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः। पुनरूर्जा निवर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्माविशताद्रयिः॥ (यजु० ८।४२)
२-त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रꣳ हवे हवे सुहवꣳशूरमिन्द्रम्। हृयामि शक्रं पुरुहूतमिन्द्रꣳ स्वस्ति नो मधवा धात्विन्द्रः॥ (यजु २०।५०)
३-अग्निर्मूर्द्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्। अपाꣳ रेताꣳसि जिन्वति॥ (यजु० ३।१२)
४-एष ते निर्ऋते भागस्तं जुषस्व स्वाहा। (यजु० ९।३५)
५-उरुꣳ हि राजा वरुणश्चकार सूर्याय पन्थामन्वेतवा उ। अपदे पादा प्रतिधातवेऽकरुतापवक्ता हृदयाविधश्चित्। (ऋ० मं० १ सू०२४।८)
६-वात आवातु भेषजं शम्भुमय भु नो हृदे। प्र ण आयूंषि तारिषत्॥ (ऋ० मं० १० सू० १८६।१)
७-सोमꣳ राजानमवसेऽग्निं गीर्भिर्हवामहे। आदित्यान् विष्णुं सूर्यं ब्रह्माणं च बृहस्पतिम्। (ऋ० मं० १० सू० १४१।३ तथा यजु० ९।२६)