भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 878 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 141

११४ * अग्निपुराण *


करके ‘ईशानमस्य०’ इत्यादिसे अथवा ‘ईशानाय नमः।’ इस मन्त्रसे ईशानदेवताका पूजन करे। ब्रह्माका आवाहन—‘हाथके अग्रभागमें स्रुक् और स्रुवा लेकर हंसपर आरूढ हुए अजन्मा ब्रह्माजी! आइये और लोकसहित यज्ञमण्डपकी ऊर्ध्व-दिशाकी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है।’ इस प्रकार आवाहन करके ‘हिरण्यगर्भः०’$^१$ इत्यादिसे अथवा ‘नमस्ते ब्रह्मणे’ इस मन्त्रसे ब्रह्माजीकी पूजा करे॥ २६—३०॥

अनन्तका आवाहन—‘कच्छपकी पीठपर विराजमान, नागगणोंके अधिपति, चक्रधारी अनन्त! आइये और नीचेकी दिशाकी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। अनन्तेश्वर! आपको नमस्कार है।’ इस प्रकार आवाहन करके ‘नमोऽस्तु$^२$ सर्पेभ्यः०’ इत्यादिसे अथवा ‘अनन्ताय नमः।’ इस मन्त्रसे भगवान् अनन्तकी पूजा करे॥ ३१-३२॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘दस दिक्पालोंके पूजनका वर्णन’ नामक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५६॥


सत्तावनवाँ अध्याय

कलशाधिवासकी विधिका वर्णन

श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं—ब्रह्मन्! प्रतिष्ठाके लिये अथवा देवपूजनके लिये जिस भूमिको ग्रहण करे, वहाँ नारसिंह-मन्त्रका पाठ करते हुए राक्षसोंका अपसारण करनेवाले अक्षत और सरसों छींटे तथा पञ्चगव्यसे उस भूमिका प्रोक्षण करे। रत्नयुक्त कलशपर अङ्ग-देवताओंसहित श्रीहरिका पूजन करके, वहाँ अस्त्र-मन्त्रसे एक सौ आठ करकों (कमण्डलुओं)-का पूजन करे। अविच्छिन्न धारासे वेदीका सेचन करके वहाँ व्रीहि (धान, जौ आदि)-को संस्कारपूर्वक बिखेरे तथा कलशको प्रदक्षिणाक्रमसे घुमाकर उस बिखेरे हुए अन्नके ऊपर स्थापित करे। वस्त्रवेष्टित कलशपर पुनः भगवान् विष्णु और लक्ष्मीकी पूजा करे। तत्पश्चात् ‘योगे योगे०’$^३$ इत्यादि मन्त्रसे मण्डपमें शय्या स्थापित करे। स्नान-मण्डपमें कुशके ऊपर शय्या और शय्याके ऊपर तूलिका (रूईभरा गद्दा) बिछाकर, दिशाओं और विदिशाओंमें विद्याधिपतियों (भगवान् विष्णुके ही विभिन्न विग्रहों)-का पूजन करे। पूर्वादि दिशाओंमें क्रमशः विष्णु, मधुसूदन, त्रिविक्रम और वामनका तथा अग्नि आदि कोणोंमें क्रमशः श्रीधर, हृषीकेश, पद्मनाभ एवं दामोदरका पूजन करे। दामोदरका पूजन ईशानकोणमें होना चाहिये॥ १—६॥

इस तरह पूजन करनेके पश्चात् स्नानमण्डपके भीतर ईशानकोणमें स्थित तथा वेदीसे विभूषित चार कलशोंमें स्नानोपयोगी सब द्रव्योंको लाकर डाले। उन कलशोंको चारों दिशाओंमें विराजमान कर दे। भगवान्के अभिषेकके लिये संचित किये गये वे कलश बड़े आदरके साथ रखने योग्य हैं। पूर्व दिशाके कलशमें बड़, गूलर, पीपल, चम्पा, अशोक, श्रीद्रुम (बिल्व), पलाश, अर्जुन, पाकड़, कदम्ब, मौलसिरी और आमके पल्लवोंको लाकर डाले। दक्षिणके कलशमें कमल, रोचना, दूर्वा, कुशकी मुट्ठी, जातीपुष्प, कुन्द, श्वेतचन्दन,


$^१$ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥ (यजु ० १३।४)
$^२$ नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु। ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः॥ (यजु० १३।६)
$^३$ योगे योगे तवस्तरं बाजे बाजे हवामहे। सखाय इन्द्रमूतये॥ (यजु० ११।१४)

अग्नि पुराण · पृष्ठ 141, कुल 878 में से · BharatKosha