अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 143, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें११६ * अग्निपुराण *
इस मन्त्रका पाठ करे। उस समय आचार्यके हाथमें भी ऊनी सूत, सरसों और रेशमी वस्त्रसे कौतुक बाँध देना चाहिये। मण्डलमें सवस्त्र प्रतिमाकी स्थापना और पूजा करके उसकी स्तुति करते हुए कहे—'विश्वकर्माकी बनायी हुई देवेश्वरि प्रतिमे! तुम्हें नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्को प्रभावित करनेवाली जगदम्ब! तुम्हें मेरा बारंबार प्रणाम है। ईश्वरि! मैं तुममें निरामय नारायणदेवका पूजन करता हूँ। तुम शिल्प-सम्बन्धी दोषोंसे रहित हो; अतः मेरे लिये सदा समृद्धिशालिनी बनी रहो'॥ १-५$\frac{१}{२}$॥
इस तरह प्रार्थना करके प्रतिमाको स्नान-मण्डपमें ले जाय। शिल्पीको यथेष्ट द्रव्य देकर संतुष्ट करे। गुरुको गोदान दे। 'चित्रं देवाना०'$^१$ इत्यादि मन्त्रसे प्रतिमाका नेत्रोन्मीलन करे। 'अग्निर्य्योतिः०'$^२$ इत्यादि मन्त्रसे दृष्टिसंचार करे। फिर भद्रपीठपर प्रतिमाको स्थापित करे। तत्पश्चात् आचार्य श्वेत पुष्प, घी, सरसों, दूर्वादल तथा कुशाग्र इष्टदेवके सिरपर चढ़ावे॥ ६-८॥
इसके बाद 'मधु$^३$ वाता०' इत्यादि मन्त्रसे गुरु प्रतिमाके नेत्रोंमें अञ्जन करे। उस समय 'हिरण्यगर्भः०'$^४$ इत्यादि तथा 'इमं मे वरुण०' (यजु० २१।१) इत्यादि मन्त्रोंका कीर्तन करे। तत्पश्चात् पुनः 'घृतवती०'$^५$ ऋचाका पाठ करते हुए घृतका अभ्यङ्ग लगावे। इसके बाद मसूरके बेसनसे उबटनका काम लेकर 'अतो देवाः०'$^६$ इत्यादि मन्त्रका कीर्तन करे। फिर 'सप्त$^७$ ते अग्ने०' इत्यादि मन्त्र बोलकर गुरु गर्म जलसे प्रतिमाका प्रक्षालन करे। तदनन्तर 'द्रुपदादिव०'$^८$ इत्यादि मन्त्रसे अनुलेपन और 'आपो$^९$ हि ष्ठा०' इत्यादिसे अभिषेक करे। अभिषेकके पश्चात् नदी एवं तीर्थके जलसे स्नान कराकर 'पावमानी' ऋचा (शु० यजु० ३९-४३)-का पाठ करते हुए, रत्न-स्पर्शसे युक्त जलद्वारा स्नान करावे। 'समुद्रं$^{१०}$ गच्छ स्वाहा०' इत्यादि मन्त्र पढ़कर तीर्थकी मृत्तिका और कलशके जलसे स्नान करावे। 'शं नो$^{११}$ देवीः०' इत्यादि तथा गायत्री-मन्त्रसे गरम जलके द्वारा इष्टदेवकी प्रतिमाको नहलावे॥ ९-१३॥
१. चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः। आ प्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षꣳ सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा॥
(यजु० ७।४२ तथा १३।४६)
२. अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा। अग्निवर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा सूर्यो वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा। ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा॥
(यजु० ३।९)
३. मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥ मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवꣳरजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता॥ मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँऽअस्तु सूर्यः॥ माध्वीर्गावो भवन्तु नः॥ (यजु० १३।२७, २८, २९)
४. (यजु० १३।४) यह मन्त्र अध्याय ५६ की टिप्पणीमें दिया जा चुका है।
५. घृतवती भुवनानामभिश्रियोर्वी पृथ्वी मधुदुघे सुपेशसा। द्यावा पृथिवी वरुणस्य धर्मणा विष्कभिते अजरे भूरिरेतसा॥ (यजु० ३४।४५)
६. अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे पृथिव्याः सप्तधामभिः॥ (ऋ० म० १, सू० २२।१६)
७. सप्त ते अग्ने समिधः सप्त जिह्वाः सप्त ऋषयः सप्त धाम प्रियाणि। सप्त होत्राः सप्तधा त्वा यजन्ति सप्त योनीरापृणस्वा घृतेन स्वाहा। (यजु० १७।७९)
८. द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलादिव। पूतं पवित्रेणेवाज्यमापः शुन्धन्तु मैनसः॥ (यजु० २०।२०)
९. आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे॥ यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव मातरः॥ तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जनयथा च नः॥ (यजु० ११। ५०, ५१, ५२)
१०. समुद्रं गच्छ स्वाहान्तरिक्षं गच्छ स्वाहा देवꣳ सवितारं गच्छ स्वाहा मित्रावरुणौ गच्छ स्वाहाहोरात्रे गच्छ स्वाहा छन्दाꣳसि गच्छ स्वाहा द्यावापृथिवी गच्छ स्वाहा यज्ञं गच्छ स्वाहा सोमं गच्छ स्वाहा दिव्यं नभो गच्छ स्वाहाग्निं वैश्वानरं गच्छ स्वाहा। मनो मे हार्दि यच्छ दिवं ते धूमो गच्छतु स्वर्ज्योतिः पृथिवीं भस्मनापृण स्वाहा॥ (यजु० ६।२१)
११. शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये शं योरभि स्रवन्तु नः।
(अथर्ववेद १।६।१)