अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 147, कुल 878 में से
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शब्दतन्मात्रतत्त्वके बोधक नकार (नं)-का मस्तकमें और स्पर्शरूप धकार (धं)-का मुखप्रदेशमें न्यास करे। रूपतत्त्वके वाचक दकार (दं)-का नेत्रप्रान्तमें और रसतन्मात्राके बोधक थकार (थं)-का वस्तिदेश (मूत्राशय)-में न्यास करे। गन्धतन्मात्रस्वरूप तकार (तं)-का पिण्डलियोंमें न्यास करे। णकार (णं)-का दोनों कानोंमें न्यास करके ढकार (ढं)-का त्वचामें न्यास करे। डकार (डं)-का दोनों नेत्रोंमें, ठकार (ठं)-का रसनामें, टकार (टं)-का नासिकामें और जकार (जं)-का वागिन्द्रियमें न्यास करे। विद्वान् पुरुष पाणितत्त्वरूप झकार (झं)-का दोनों हाथोंमें न्यास करके, जकार (जं)-का दोनों पैरोंमें, 'छं' का पायुमें और 'चं' का उपस्थमें न्यास करे। ङकार (ङं) पृथ्वीतत्त्वका प्रतीक है। उसका युगल चरणोंमें न्यास करे। घकार (घं)-का वस्तिमें और तेजस्तत्त्वरूप (गं)-का हृदयमें न्यास करे। खकार (खं) वायुतत्त्वका प्रतीक है। उसका नासिकामें न्यास करे। ककार (कं) आकाशतत्त्वरूप है। विद्वान् पुरुष उसका सदा ही मस्तकमें न्यास करे॥ १९-२५॥
हृदय-कमलमें सूर्य-देवता-सम्बन्धी 'यं' बीजका न्यास करके, हृदयसे निकली हुई जो बहत्तर हजार नाड़ियाँ हैं, उनमें षोडश कलाओंसे युक्त सकार (सं)-का न्यास करे। उसके मध्यभागमें मन्त्रज्ञ पुरुष बिन्दुस्वरूप वह्निमण्डलका चिन्तन करे। सुरश्रेष्ठ! उसमें प्रणवसहित हकार (हं)-का न्यास करे। १. ॐ आं नमः परमेष्ठ्यात्मने। २.ॐ आं नमः पुरुषात्मने। ३.ॐ वां नमो नित्यात्मने। ४.ॐ नां नमो विश्वात्मने। ५. ॐ वं नमः सर्वात्मने। ये पाँच शक्तियाँ बतायी गयी हैं। 'स्नानकर्म' में प्रथमा शक्तिकी योजना करनी चाहिये। 'आसनकर्म' में द्वितीया, 'शयन' में तृतीया, 'यानकर्म' में चतुर्थी और 'अर्चनाकाल'में पञ्चमी शक्तिका प्रयोग करना चाहिये—ये पाँच उपनिषद् हैं। इनके मध्यमें मन्त्रमय श्रीहरिका ध्यान करके क्षकार (क्षं)-का न्यास करे॥ २६-३१॥
तदनन्तर जिस मूर्तिकी स्थापना की जाती है, उसके मूल-मन्त्रका न्यास करना चाहिये। (भगवान् विष्णुकी स्थापनामें) 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'—यह मूल-मन्त्र है। मस्तक, नासिका, ललाट, मुख, कण्ठ, हृदय, दो भुजा, दो पिण्डली और दो चरणोंमें क्रमशः उक्त मूल-मन्त्रके एक-एक अक्षरका न्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् केशवका मस्तकमें न्यास करे। नारायणका मुखमें, माधवका ग्रीवामें और गोविन्दका दोनों भुजाओंमें न्यास करके विष्णुका हृदयमें न्यास करे। पृष्ठभागमें मधुसूदनका, जठरमें वामनका और कटिमें त्रिविक्रमका न्यास करके जंघा (पिण्डली)-में श्रीधरका न्यास करे। दक्षिण भागमें हृषीकेशका, गुल्फमें पद्मनाभका और दोनों चरणोंमें दामोदरका न्यास करनेके पश्चात् हृदयादि षडङ्गन्यास करे॥ ३२-३६॥
सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजी! यह आदिमूर्तिके लिये न्यासका साधारण क्रम बताया गया है। अथवा जिस देवताकी स्थापनाका आरम्भ हो, उसीके मूल-मन्त्रसे मूर्तिके सजीवकरणकी क्रिया होनी चाहिये। जिस मूर्तिका जो नाम हो, उसके आदि अक्षरका बारह स्वरोंसे भेदन करके अङ्गोंकी कल्पना करनी चाहिये। देवेश्वर! हृदय आदि अङ्गोंका तथा द्वादश अक्षरवाले मूल-मन्त्रका एवं तत्त्वोंका जैसे देवताके विग्रहमें न्यास करे, वैसे ही अपने शरीरमें भी करे। तत्पश्चात् चक्राकार पद्ममण्डलमें भगवान् विष्णुका गन्ध आदिसे पूजन करे। पूर्ववत् शरीर और वस्त्राभूषणोंसहित भगवान्के आसनका ध्यान करे। ऊपरी भागमें बारह अरोंसे युक्त सुदर्शनचक्रका चिन्तन करे। वह चक्र तीन नाभि और दो