अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 146, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ५९ * । ११९
उनसठवाँ अध्याय
अधिवास-विधिका वर्णन
श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं— ब्रह्मन्! श्रीहरिका सांनिध्यकरण 'अधिवासन' कहलाता है। साधक यह चिन्तन करे कि 'मैं अथवा मेरा आत्मा सर्वज्ञ सर्वव्यापी पुरुषोत्तमरूप है।' इस प्रकार भावना करके आत्माकी 'ॐ' इस नामके द्वारा प्रतिपादित होनेवाले परमात्माके साथ एकता करे। तदनन्तर चैतन्याभिमानिनी जीव-शक्तिको पृथक् करके आत्माके साथ उसकी एकता करे। ऐसा करके स्वात्मरूप सर्वव्यापी परमेश्वरमें उसे जोड़ दे। तत्पश्चात् प्राणवायुद्वारा ('लं' बीजात्मक) पृथ्वीको अग्निबीज (रं)-के चिन्तनद्वारा प्रकट हुई अग्निमें जला दे, अर्थात् यह भावना करे कि पृथ्वीका अग्निमें लय हो गया। फिर वायुमें अग्निको विलीन करे और आकाशमें वायुका लय कर दे। अधिभूत, अधिदैव तथा अध्यात्म-वैभवके साथ समस्त भूतोंको तन्मात्राओंमें विलीन करके विद्वान् पुरुष आकाशमें उन सबका क्रमशः संहार करे। इसके बाद आकाशका मनमें, मनका अहंकारमें, अहंकारका महत्तत्त्वमें और महत्तत्त्वका अव्याकृत प्रकृतिमें लय करे॥ १—५॥
अव्याकृत प्रकृति (अथवा माया)-को ज्ञानस्वरूप परमात्मामें विलीन करे। उन्हीं परमात्माको 'वासुदेव' कहा गया है। उन शब्दस्वरूप भगवान् वासुदेवने सृष्टिकी इच्छासे उस अव्याकृत मायाका आश्रय ले स्पर्शसंज्ञक संकर्षणको प्रकट किया। संकर्षणने मायाको क्षुब्ध करके तेजोरूप प्रद्युम्नकी सृष्टि की। प्रद्युम्नने रसस्वरूप अनिरुद्धको और अनिरुद्धने गन्धस्वरूप ब्रह्माको जन्म दिया। ब्रह्माने सबसे पहले जलकी सृष्टि की। उस जलमें उन्होंने पाँच भूतोंसे युक्त हिरण्मय अण्डको उत्पन्न किया। उस अण्डमें जीव-शक्तिका संचार हुआ। यह वही जीव-शक्ति है, जिसका आत्मामें पहले उपसंहार बताया गया है। जीवके साथ प्राणका संयोग होनेपर वह 'वृत्तिमान्' कहलाता है। व्याहृतिसंज्ञक जीव प्राणोंमें स्थित होकर 'आध्यात्मिक पुरुष' कहा गया है। उससे प्राणयुक्त बुद्धि उत्पन्न हुई, जो आठ वृत्तिवाली बतायी गयी है। उस बुद्धिसे अहंकारका और अहंकारसे मनका प्रादुर्भाव हुआ। मनसे संकल्पादियुक्त पाँच विषय प्रकट हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध॥ ६—१२॥
इन सबने ज्ञानशक्तिसे सम्पन्न पाँच इन्द्रियोंको प्रकट किया, जिनके नाम हैं—त्वक्, श्रोत्र, घ्राण, नेत्र और जिह्वा। इन सबको 'ज्ञानेन्द्रिय' कहा गया है। दो पैर, गुदा, दो हाथ, वाक् और उपस्थ—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। अब पञ्चभूतोंके नाम सुनो। आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—ये पाँच भूत हैं। इनके ही द्वारा सबका आधारभूत स्थूल शरीर उत्पन्न होता है। इन तत्त्वोंके वाचक जो उत्तम बीज-मन्त्र हैं, उनका न्यासके लिये यहाँ वर्णन किया जाता है। 'मं' यह बीज जीवस्वरूप (अथवा जीवतत्त्वका वाचक) है। वह सम्पूर्ण शरीरमें व्यापक है—इस भावनाके साथ उक्त बीजका सम्पूर्ण देहमें व्यापक-न्यास करना चाहिये। 'भं' यह प्राणतत्त्वका प्रतीक है। यह जीवकी उपाधिमें स्थित है, अतः इसका वहीं न्यास करना चाहिये। विद्वान् पुरुष बुद्धितत्त्वके बोधक बकार अथवा 'बं' बीजका हृदयमें न्यास करे। फकार (फं) अहंकारका स्वरूप है, अतः उसका भी हृदयमें ही न्यास करे। संकल्पके कारणभूत मनस्तत्त्वरूप पकार (पं)-का भी वहीं न्यास करे॥ १३—१८॥