भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 145
११८* अग्निपुराण *

इत्यादि मन्त्र पढ़कर भगवान्‌के श्रीअङ्गोंपर दूर्वा एवं अक्षत बिखेरे॥ १८-२२॥

'काण्डात्०'¹ इत्यादि मन्त्रसे निर्मञ्छन करे। 'गन्धवती०'² इत्यादिसे गन्ध अर्पित करे। 'उन्नयामि०' इस मन्त्रसे फूल-माला और 'इदं विष्णुः०'³ इत्यादि मन्त्रसे पवित्रक अर्पित करे। 'बृहस्पते०'⁴ इत्यादि मन्त्रसे एक जोड़ा वस्त्र चढ़ावे। 'वेदाहमेतम्‌०'⁵ इत्यादिसे उत्तरीय अर्पित करे। 'महाव्रतेन०' इस मन्त्रसे फूल और औषध—इन सबको चढ़ावे। तदनन्तर 'धूरसि०'⁶ इस मन्त्रसे धूप दे। 'विभ्राट्०'⁷ सूक्तसे अञ्जन अर्पित करे। 'युञ्जन्ति०'⁸ इत्यादि मन्त्रसे तिलक लगावे तथा 'दीर्घत्वाय०' (अथर्व० २।४।१) इस मन्त्रसे फूलमाला चढ़ावे। 'इन्द्र क्षत्रमभि०' (अथर्व० ७।४।२) इत्यादि मन्त्रसे छत्र, 'विराट्०'⁹ मन्त्रसे दर्पण, 'विकर्ण०' मन्त्रसे चँवर तथा 'रथन्तर०' साम-मन्त्रसे आभूषण निवेदित करे॥ २३-२६॥

वायुदेवता-सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा व्यजन, 'मुञ्चामि त्वा०' (ऋक् १०।१६१।१) इस मन्त्रसे फूल तथा वेदादि (प्रणव)-युक्त पुरुषसूक्तके मन्त्रोंद्वारा श्रीहरिकी स्तुति करे। ये सारी वस्तुएँ पिण्डिका आदिपर तथा शिव आदि देवताओंपर इसी प्रकार चढ़ावे। भगवान्‌को उठाते समय 'सौपर्ण' सूक्तका पाठ करे। 'प्रभो! उठिये' ऐसा कहकर भगवान्‌को उठावे और मण्डपमें शय्यापर ले जाय। उस समय 'शकुनि' सूक्तका पाठ करे। ब्रह्मरथ एवं पालकी आदिके द्वारा भगवान्‌को शय्यापर ले जाना चाहिये। 'अतो देवाः' (ऋक्० १।२२।१६) इस सूक्तसे तथा 'श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च०' (यजु० ३१।२२)-से प्रतिमा एवं पिण्डिकाको शय्यापर पधरावे। तदनन्तर भगवान् विष्णुके लिये निष्कली-करणकी क्रिया सम्पादित करे॥ २७-३०॥

सिंह, वृषभ, हाथी, व्यजन, कलश, वैजयन्ती (पताका), भेरी तथा दीपक—ये आठ मङ्गलसूचक वस्तुएँ हैं। इन सब वस्तुओंको अश्वसूक्तका पाठ करते हुए भगवान्‌को दिखावे। 'त्रिपात्०'¹⁰ इत्यादि मन्त्रसे भगवान्‌के चरण-प्रान्तमें उखा (पात्रविशेष), उसका ढक्कन, अम्बिका (कड़ाही), दर्बिका (करछुल), पात्र, ओखली, मूसल, सिल, झाडू, भोजन-पात्र तथा घरके अन्य सामान रखे। उनके सिरकी ओर वस्त्र और रत्नसे युक्त एक कलश स्थापित करे, जो खाँड और खाद्य-पदार्थसे भरा हुआ हो। उस घटकी 'निद्रा' संज्ञा होती है। इस प्रकार भगवान्‌के शयनकी विधि बतायी गयी है॥ ३१-३४॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'स्नपनकी विधि आदिका वर्णन' नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५८॥


१. काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि। एवा नो दूर्वे प्रत्तनु सहस्रेण शतेन च॥ (यजु० १३।२०)
२. 'गन्धद्वारां०' इत्यादि मन्त्र ही यहाँ गन्धवती नामसे गृहीत होते हैं।
३. इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूढमस्य पाꣳ सुरे स्वाहा॥ (यजु० ५।१५)
४. बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्। उपयामगृहीतोऽसि बृहस्पतये त्वैष ते योनिर्बृहस्पतये त्वा॥ (यजु० २६।३)
५. वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्। तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥ (यजु० ३१।१८)
६. धूरसि धूर्व धूर्वन्तं धूर्व तं योऽस्मान्धूर्वति तं धूर्वयं वयं धूर्वामः। देवानामसि वह्नितमꣳ सस्नितमं पप्रितमं जुष्टतमं देवहूतमम्॥ (यजु० १।८)
७. विभ्राड् बृहत्पिबतु सोम्यं मध्वायुर्दधद्यज्ञपतावविह्रुतम्। वातजूतो यो अभिरक्षति त्मना प्रजाः पुपोष पुरुधा वि राजति॥ (यजु० ३३।३०)
८. युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः। रोचन्ते रोचना दिवि॥ (यजु० २३।५)
९. विराट् ज्योतिरधारयत्स्वराड् ज्योतिरधारयत्। प्रजापतिष्ट्वा सादयतु पृष्ठे पृथिव्या ज्योतिष्मतीम्। विश्वस्मै प्राणायापानाय व्यानाय विश्वं ज्योतिर्यच्छ। अग्निष्टेऽधिपतिस्तया देवतयाङ्गिरस्वद् ध्रुवासीद॥ (यजु० १३।२४)
१०. त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः। ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि॥ (यजु० १३।४)