भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 878 में से

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पृष्ठ 149

१२२ * अग्निपुराण *


साठवाँ अध्याय

वासुदेव आदि देवताओंके स्थापनकी साधारण विधि

श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं— ब्रह्मन्! पिण्डिकाकी स्थापनाके लिये विद्वान् पुरुष मन्दिरके गर्भगृहको सात भागोंमें विभक्त करे और ब्रह्मभागमें प्रतिमाको स्थापित करे। देव, मनुष्य और पिशाच-भागोंमें कदापि उसकी स्थापना नहीं करनी चाहिये। ब्रह्मन्! ब्रह्मभागका कुछ अंश छोड़कर तथा देवभाग और मनुष्य-भागोंमेंसे कुछ अंश लेकर, उस भूमिमें यत्नपूर्वक पिण्डिका स्थापित करनी चाहिये। नपुंसक शिलामें रत्नन्यास करे। नृसिंह-मन्त्रसे हवन करके उसीसे रत्नन्यास भी करे। व्रीहि, रत्न, लोह आदि धातु और चन्दन आदि पदार्थोंको पूर्वाद दिशाओं तथा मध्यमें बने हुए नौ कुण्डोंमें अपनी रुचिके अनुसार छोड़े। तदनन्तर इन्द्र आदिके मन्त्रोंसे पूर्वाद दिशाओंके गर्तको गुग्गुलसे आवृत करके, रत्नन्यासकी विधि सम्पन्न करनेके पश्चात्, गुरु शलाकासहित कुश-समूहों और ‘सहदेव’ नामक औषधके द्वारा प्रतिमाको अच्छी तरह मले और झाड़-पोंछ करे। बाहर-भीतरसे संस्कार (सफाई) करके पञ्चगव्यद्वारा उसकी शुद्धि करे। इसके बाद कुशोंदक, नदीके जल एवं तीर्थ-जलसे उस प्रतिमाका प्रोक्षण करे॥ १—७॥

होमके लिये बालूद्वारा एक वेदी बनावे, जो सब ओरसे डेढ़ हाथकी लंबी-चौड़ी हो। वह वेदी चौकोर एवं सुन्दर शोभासे सम्पन्न हो। आठ दिशाओंमें यथास्थान कलशोंको भी स्थापित करे। उन पूर्वाद कलशोंको आठ प्रकारके रंगोंसे सुसज्जित करे। तत्पश्चात् अग्नि ले आकर वेदीपर उसकी स्थापना करे और कुशखण्डिकाद्वारा संस्कार करके उस अग्निमें ‘त्वमग्ने द्युभिः०’ (यजु० ११। २७) इत्यादिसे तथा गायत्री-मन्त्रसे समिधाओंका हवन करे। अष्टाक्षर-मन्त्रसे अष्टोत्तरशत घीकी आहुति दे, पूर्णाहुति प्रदान करे। तत्पश्चात् मूल-मन्त्रसे सौ बार अभिमन्त्रित किये गये शान्तिजलको आम्रपल्लवोंद्वारा लेकर इष्टदेवताके मस्तकपर अभिषेक करे। अभिषेक-कालमें ‘श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च०’$^१$ इत्यादि ऋचाका पाठ करता रहे। ‘उत्तिष्ठ$^२$ ब्रह्मणस्पते०’ इस मन्त्रसे प्रतिमाको उठाकर ब्रह्मरथपर रखे और ‘तद्$^३$ विष्णोः०’ इत्यादि मन्त्रसे उक्त रथद्वारा उसे मन्दिरकी ओर ले जाय। वहाँ श्रीहरिकी उस प्रतिमाको शिविका (पालकी)-में पधराकर नगर आदिमें घुमावे और गीत, वाद्य एवं वेदमन्त्रोंकी ध्वनिके साथ उसे पुनः लाकर मन्दिरके द्वारपर विराजमान करे॥ ८—१३॥

इसके बाद गुरु सुवासिनी स्त्रियों और ब्राह्मणोंद्वारा आठ मङ्गल-कलशोंके जलसे श्रीहरिको स्नान करावे तथा गन्ध आदि उपचारोंसे मूल-मन्त्रद्वारा पूजन करनेके पश्चात् ‘अतो देवाः०’ (ऋक्० १।२२।१६) इत्यादि मन्त्रसे वस्त्र आदि अष्टाङ्ग अर्घ्य निवेदन करे। फिर स्थिर लग्नमें पिण्डिकापर ‘देवस्य त्वा०’$^४$ इत्यादि मन्त्रसे इष्टदेवताके उस अर्चा-विग्रहको स्थापित कर दे। स्थापनाके पश्चात् इस प्रकार कहे— ‘सच्चिदानन्दस्वरूप त्रिविक्रम! आपने तीन पगोंद्वारा समूची त्रिलोकीको आक्रान्त कर लिया था।


१. श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम्। इष्णन्निषाणामुं म इषाण सर्वलोकं म इषाण॥ (यजु० ३१।२२)
२. उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवयन्तस्त्वेमहे। उप प्रयन्तु मरुतः सुदानव इन्द्र प्राशूर्भवा सचा॥ (यजु० ३४।५६)
३. तद् विष्णोः परमं पदᳵ सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ (यजु० ६।५)
४. देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्। अग्नये जुष्टं गृहाम्यग्नीषोमाभ्यां जुष्टं गृह्णामि॥ (यजु० १।१०)

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