अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१२२ * अग्निपुराण *
साठवाँ अध्याय
वासुदेव आदि देवताओंके स्थापनकी साधारण विधि
श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं— ब्रह्मन्! पिण्डिकाकी स्थापनाके लिये विद्वान् पुरुष मन्दिरके गर्भगृहको सात भागोंमें विभक्त करे और ब्रह्मभागमें प्रतिमाको स्थापित करे। देव, मनुष्य और पिशाच-भागोंमें कदापि उसकी स्थापना नहीं करनी चाहिये। ब्रह्मन्! ब्रह्मभागका कुछ अंश छोड़कर तथा देवभाग और मनुष्य-भागोंमेंसे कुछ अंश लेकर, उस भूमिमें यत्नपूर्वक पिण्डिका स्थापित करनी चाहिये। नपुंसक शिलामें रत्नन्यास करे। नृसिंह-मन्त्रसे हवन करके उसीसे रत्नन्यास भी करे। व्रीहि, रत्न, लोह आदि धातु और चन्दन आदि पदार्थोंको पूर्वाद दिशाओं तथा मध्यमें बने हुए नौ कुण्डोंमें अपनी रुचिके अनुसार छोड़े। तदनन्तर इन्द्र आदिके मन्त्रोंसे पूर्वाद दिशाओंके गर्तको गुग्गुलसे आवृत करके, रत्नन्यासकी विधि सम्पन्न करनेके पश्चात्, गुरु शलाकासहित कुश-समूहों और ‘सहदेव’ नामक औषधके द्वारा प्रतिमाको अच्छी तरह मले और झाड़-पोंछ करे। बाहर-भीतरसे संस्कार (सफाई) करके पञ्चगव्यद्वारा उसकी शुद्धि करे। इसके बाद कुशोंदक, नदीके जल एवं तीर्थ-जलसे उस प्रतिमाका प्रोक्षण करे॥ १—७॥
होमके लिये बालूद्वारा एक वेदी बनावे, जो सब ओरसे डेढ़ हाथकी लंबी-चौड़ी हो। वह वेदी चौकोर एवं सुन्दर शोभासे सम्पन्न हो। आठ दिशाओंमें यथास्थान कलशोंको भी स्थापित करे। उन पूर्वाद कलशोंको आठ प्रकारके रंगोंसे सुसज्जित करे। तत्पश्चात् अग्नि ले आकर वेदीपर उसकी स्थापना करे और कुशखण्डिकाद्वारा संस्कार करके उस अग्निमें ‘त्वमग्ने द्युभिः०’ (यजु० ११। २७) इत्यादिसे तथा गायत्री-मन्त्रसे समिधाओंका हवन करे। अष्टाक्षर-मन्त्रसे अष्टोत्तरशत घीकी आहुति दे, पूर्णाहुति प्रदान करे। तत्पश्चात् मूल-मन्त्रसे सौ बार अभिमन्त्रित किये गये शान्तिजलको आम्रपल्लवोंद्वारा लेकर इष्टदेवताके मस्तकपर अभिषेक करे। अभिषेक-कालमें ‘श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च०’$^१$ इत्यादि ऋचाका पाठ करता रहे। ‘उत्तिष्ठ$^२$ ब्रह्मणस्पते०’ इस मन्त्रसे प्रतिमाको उठाकर ब्रह्मरथपर रखे और ‘तद्$^३$ विष्णोः०’ इत्यादि मन्त्रसे उक्त रथद्वारा उसे मन्दिरकी ओर ले जाय। वहाँ श्रीहरिकी उस प्रतिमाको शिविका (पालकी)-में पधराकर नगर आदिमें घुमावे और गीत, वाद्य एवं वेदमन्त्रोंकी ध्वनिके साथ उसे पुनः लाकर मन्दिरके द्वारपर विराजमान करे॥ ८—१३॥
इसके बाद गुरु सुवासिनी स्त्रियों और ब्राह्मणोंद्वारा आठ मङ्गल-कलशोंके जलसे श्रीहरिको स्नान करावे तथा गन्ध आदि उपचारोंसे मूल-मन्त्रद्वारा पूजन करनेके पश्चात् ‘अतो देवाः०’ (ऋक्० १।२२।१६) इत्यादि मन्त्रसे वस्त्र आदि अष्टाङ्ग अर्घ्य निवेदन करे। फिर स्थिर लग्नमें पिण्डिकापर ‘देवस्य त्वा०’$^४$ इत्यादि मन्त्रसे इष्टदेवताके उस अर्चा-विग्रहको स्थापित कर दे। स्थापनाके पश्चात् इस प्रकार कहे— ‘सच्चिदानन्दस्वरूप त्रिविक्रम! आपने तीन पगोंद्वारा समूची त्रिलोकीको आक्रान्त कर लिया था।
१. श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम्। इष्णन्निषाणामुं म इषाण सर्वलोकं म इषाण॥ (यजु० ३१।२२)
२. उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवयन्तस्त्वेमहे। उप प्रयन्तु मरुतः सुदानव इन्द्र प्राशूर्भवा सचा॥ (यजु० ३४।५६)
३. तद् विष्णोः परमं पदᳵ सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ (यजु० ६।५)
४. देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्। अग्नये जुष्टं गृहाम्यग्नीषोमाभ्यां जुष्टं गृह्णामि॥ (यजु० १।१०)
- अध्याय ६० * १२३
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आपको नमस्कार है।' इस तरह पिण्डकापर प्रतिमाको स्थापित करके विद्वान् पुरुष उसे स्थिर करे। प्रतिमा-स्थिरीकरणके समय 'ध्रुवाद्यौः१०' इत्यादि तथा 'विश्वतश्चक्षुः०' (यजु० १७।१९) इत्यादि मन्त्रोंका पाठ करे। पञ्चगव्यसे स्नान कराकर गन्धोदकसे प्रतिमाका प्रक्षालन करे और सकलीकरण$^२$ करनेके पश्चात् श्रीहरिका साङ्गोपाङ्ग साधारण पूजन करे॥ १४-१७$\frac{१}{२}$॥
उस समय इस प्रकार ध्यान करे—'आकाश भगवान् विष्णुका विग्रह है और पृथिवी उसकी पीठिका (सिंहासन) है।' तदनन्तर तैजस परमाणुओंस भगवान्के श्रीविग्रहकी कल्पना करे और कहे—'मैं पच्चीस तत्त्वोंमें व्यापक जीवका आवाहन करूँगा।'॥ १८-१९॥
'वह जीव चैतन्यमय, परमानन्दस्वरूप तथा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंसे रहित है; देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण तथा अहंकारसे शून्य है। वह ब्रह्मा आदिसे लेकर कीटपर्यन्त समस्त जगत्में व्याप्त और सबके हृदयोंमें विराजमान है। परमेश्वर! आप ही जीव चैतन्य हैं; आप हृदयसे प्रतिमा-बिम्बमें आकर स्थिर होइये। आप इस प्रतिमा-बिम्बको इसके बाहर और भीतर स्थित होकर सजीव कीजिये। अङ्गुष्ठमात्र पुरुष (परमात्मा जीवरूपसे) सम्पूर्ण देहोपाधियोंमें स्थित हैं। वे ही ज्योतिःस्वरूप, ज्ञानस्वरूप, एकमात्र अद्वितीय परब्रह्म हैं।' इस प्रकार सजीवीकरण करके प्रणवद्वारा भगवान्को जगावे। फिर भगवान्के हृदयका स्पर्श करके पुरुषसूक्तका जप करे। इसे 'सांनिध्यकरण' नामक कर्म कहा गया है। इसके लिये भगवान्का ध्यान करते हुए निम्नाङ्कित गुह्य-मन्त्रका जप करे— ॥ २०-२४॥
'प्रभो! आप देवताओंके स्वामी हैं, संतोष-वैभव-रूप हैं। आपको नमस्कार है। ज्ञान और विज्ञान आपके रूप हैं, ब्रह्मतेज आपका अनुगामी है। आपका स्वरूप गुणातीत है। आप अन्तर्यामी पुरुष एवं परमात्मा हैं; अक्षय पुराणपुरुष हैं; आपको नमस्कार है। विष्णो! आप यहाँ संनिहित होइये। आपका जो परतत्त्व है, जो ज्ञानमय शरीर है, वह सब एकत्र हो, इस अर्चाविग्रहमें जाग उठे।' इस प्रकार परमात्मा श्रीहरिका सांनिध्यकरण करके ब्रह्मा आदि परिवारोंकी उनके नामसे स्थापना करे। उनके जो आयुध आदि हैं, उनकी भी मुद्रासहित स्थापना करे।
१. ध्रुवा द्यौर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवासः पर्वता इमे। ध्रुवं विश्वमिदं जगद् ध्रुवो राजा विशामयम्॥ (ऋक् १०।१७३।४)
२. श्रीविद्यारण्य मुनिने नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद्की टीकामें सकलीकरण नामक न्यासकी विधि यों बतायी है—पहले आत्माकी 'ॐ' इस नामके द्वारा प्रतिपादित होनेवाले ब्रह्मके साथ एकता करके, तथा ब्रह्मकी आत्माके साथ ओंकारके वाच्यार्थरूपसे एकता करके वह एकमात्र जरारहित, मृत्युरहित, अमृतस्वरूप, निर्भय, चिन्मय तत्त्व 'ॐ' है—इस प्रकार अनुभव करे। तत्पश्चात् उस परमात्मस्वरूप ओंकारमें स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीन शरीरोंवाले सम्पूर्ण दृश्य-प्रपञ्चका आरोप करके, अर्थात् एक परमात्मा ही सत्य है, उन्हींमें इस स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण-जगत्की कल्पना हुई है—ऐसा विवेकद्वारा अनुभव करके यह निश्चय करे कि 'यह जगत् सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा ही है; क्योंकि तन्मय (परमात्ममय) होनेके कारण अवश्य यह तत्स्वरूप (परमात्मस्वरूप) ही है' और इस दृढ़ निश्चयके द्वारा इस जगत्को 'ॐ' के वाच्यार्थभूत परमात्मामें विलीन कर डाले। इसके बाद चतुर्विध शरीरकी सृष्टिके लिये निम्नाङ्कित प्रकारसे सकलीकरण करे। 'ॐ'का उच्चारण अनेक प्रकारसे होता है—एक तो केवल मकार-पर्यन्त उच्चारण होता है, दूसरा बिन्दु-पर्यन्त, तीसरा नाद-पर्यन्त और चौथा शक्ति-पर्यन्त होता है। फिर उच्चारण बंद हो जानेपर उसकी 'शान्त' संज्ञा होती है। सकलीकरणकी क्रिया आरम्भ करते समय पहले 'ॐ' का उपर्युक्त रीतिसे शान्त-पर्यन्त उच्चारण करके 'शान्त्यतीतकलात्मने साक्षिणे नमः।' इस मन्त्रसे व्यापक-न्यास करते हुए 'साक्षी'का चिन्तन करे। फिर शक्तिपर्यन्त प्रणवका उच्चारण करके 'शान्तिकलाशक्तिपरावागात्मने सामान्यदेहाय नमः।' इस मन्त्रसे व्यापक करते हुए अन्तर्मुख, सत्स्वरूप, ब्रह्मज्ञानरूप सामान्य देहका चिन्तन करे। फिर प्रणवका नादपर्यन्त उच्चारण करके 'विद्याकलानादपश्यन्तीवागात्मने कारणदेहाय नमः।' इस मन्त्रसे व्यापक-न्यास करते हुए प्रलय, सुषुप्ति एवं ईक्षणावस्थामें स्थित किंचित् बहिर्मुख सत्स्वरूप कारणदेहका चिन्तन करे। फिर प्रणवका बिन्दुपर्यन्त उच्चारण करके 'प्रतिष्ठाकलाबिन्दुमध्यमावागात्मने सूक्ष्मदेहाय नमः।' इस मन्त्रसे व्यापक हुए सूक्ष्मभूत, अन्तःकरण, प्राण तथा इन्द्रियोंके संघातस्वरूप सूक्ष्म शरीरका चिन्तन करे। फिर प्रणवका मकार-पर्यन्त उच्चारण करके 'निवृत्तिकलाबीजवैखरीवागात्मने स्थूलशरीराय नमः।' इस मन्त्रसे व्यापक करते हुए पञ्चीकृत भूत एवं उसके कार्यरूप स्थूलशरीरका चिन्तन करे।
१२४ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
यात्रा-सम्बन्धी उत्सव तथा वार्षिक आदि उत्सवकी भी योजना करके और उन उत्सवोंका दर्शनकर श्रीहरिको अपने संनिहित जानना चाहिये। भगवान्को नमस्कार, स्तोत्र आदिके द्वारा उनकी स्तुति तथा उनके अष्टाक्षर आदि मन्त्रका जप करते समय भी भगवान्को अपने निकट उपस्थित जानना चाहिये॥ २५—२९॥
तदनन्तर आचार्य मन्दिरसे निकलकर द्वारवर्ती द्वारपाल चण्ड और प्रचण्डका पूजन करे। फिर मण्डपमें आकर गरुड़की स्थापना एवं पूजा करे। प्रत्येक दिशामें दिक्पालों तथा अन्य देवताओंका स्थापन-पूजन करके गुरु विष्वक्सेनकी स्थापना तथा शङ्ख, चक्र आदिकी पूजा करे। सम्पूर्ण पार्षदों और भूतोंको बलि अर्पित करे। आचार्यको दक्षिणारूपसे ग्राम, वस्त्र एवं सुवर्ण आदिका दान दे। यज्ञोपयोगी द्रव्य आदि आचार्यको अर्पित करे। आचार्यसे आधी दक्षिणा ऋत्विजोंको दे। इसके बाद अन्य ब्राह्मणोंको भी दक्षिणा दे और भोजन करावे। वहाँ आनेवाले किसी भी ब्राह्मणको रोके नहीं, सबका सत्कार करे। तदनन्तर गुरु यजमानको फल दे॥ ३०—३४॥
भगवद्विग्रहकी स्थापना करनेवाला पुरुष अपने साथ सम्पूर्ण कुलको भगवान् विष्णुके समीप ले जाता है। सभी देवताओंके लिये यह साधारण विधि है; किंतु उनके मूल-मन्त्र पृथक्-पृथक् होते हैं। शेष सब कार्य समान हैं॥ ३५-३६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वासुदेव आदि देवताओंकी स्थापनाके सामान्य विधानका वर्णन' नामक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६०॥
इकसठवाँ अध्याय
अवभृथस्नान, द्वारप्रतिष्ठा और ध्वजारोपण आदिकी विधिका वर्णन
श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं— ब्रह्मन्! अब मैं अवभृथस्नानका वर्णन करता हूँ। 'विष्णोर्नु कं* वीर्याणि०' इत्यादि मन्त्रसे हवन करे। इक्यासी पदवाले वास्तुमण्डलमें कलश स्थापित करके उनके जलसे श्रीहरिको स्नान करावे। स्नानके पश्चात् गन्ध, पुष्प आदिसे भगवान्की पूजा करे और बलि अर्पित करके गुरुका पूजन करे। अब मैं द्वारप्रतिष्ठाका वर्णन करूँगा। गुरु द्वारके निम्नभागमें सुवर्ण रखे और आठ कलशोंके साथ वहाँ दो गूलरकी शाखाओंको स्थापित करे। फिर गन्ध आदि उपचारों और वैदिक आदि मन्त्रोंसे सम्यक् पूजन करके कुण्डोंमें स्थापित अग्निमें समिधा, घी और तिल आदिकी आहुति दे। तत्पश्चात् शय्या आदिका दान देकर नीचे आधारशक्तिकी स्थापना करे॥ १-४॥
दोनों शाखाओंके मूलभागमें चण्ड और प्रचण्ड नामक देवताओंकी स्थापना करे। उदुम्बर-शाखाओंके ऊपरी भागमें देववृन्दपूजित लक्ष्मीदेवीकी स्थापना करके श्रीसूक्तसे उनका यथोचित पूजन करे। तत्पश्चात् ब्रह्माजीका पूजन करके आचार्य आदिको श्रीफल (नारियल) आदिकी दक्षिणा दे। प्रतिष्ठा-द्वारा सिद्ध द्वारपर आचार्य श्रीहरिकी स्थापना करे। मन्दिरकी प्रतिष्ठा 'हृत्प्रतिष्ठा०' इत्यादि मन्त्रसे की जाती है। उसका वर्णन सुनो। वेदीके पहले गर्भगृहके शिरोभागमें, जहाँ शुकनासाकी समाप्ति होती है, उस स्थानपर सोने अथवा चाँदीके बने हुए श्वेत निर्मल कलशकी स्थापना करे। उसमें आठ प्रकारके रत्न, ओषधि, धातु, बीज और लोह (सुवर्ण) छोड़ दे। उस सुन्दर कलशके कण्ठभागमें वस्त्र लपेटकर उसमें जल
* विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि। यो अस्कभायदुत्तरꣳ सधस्थं विचक्रमाणास्रेधोरुगायो विष्णवे त्वा॥ (यजु० ५। १८)
- अध्याय ६१ * १२५
भर दे और मण्डलमें उसका अधिवासन करे। उसमें पल्लव डाल दे। तत्पश्चात् नृसिंह-मन्त्रसे अग्निमें घीकी धारा गिराते हुए होम करे। नारायणतत्त्वसे प्राणन्यास करे॥५-१०॥
सुरेश्वर! प्रासादके उस कलशका वैराजरूपमें चिन्तन करे। तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष सम्पूर्ण प्रासादका ही पुरुषकी भाँति चिन्तन करे। तदनन्तर नीचे सुवर्ण देकर तत्त्वभूत कलशकी स्थापना करे। गुरु आदिको दक्षिणा दे और ब्राह्मण आदिको भोजन करावे। तत्पश्चात् वेदीके चारों ओर सूत या माला लपेटे। उसके ऊपर कण्ठभागमें सब ओर सूत अथवा बन्दनवार बाँधे और उसके भी ऊपर ‘विमलामलसार’ नामक पुष्पहार या बन्दनवार मन्दिरके चारों ओर बाँधे। उसके ऊपर ‘वृकल’ तथा उसके भी ऊपर आदि सुदर्शनचक्र बनावे। वहीं भगवान् वासुदेवकी ग्रहगुप्त मूर्ति निवेदित करे। अथवा पहले कलश और उसके ऊपर उत्तम सुदर्शनचक्रकी योजना करे। ब्रह्मन्! वेदीके चारों ओर आठ विघ्नेश्वरोंकी स्थापना करनी चाहिये। अथवा चार दिशाओंमें चार ही विघ्नेश्वर स्थापित किये जाने चाहिये। अब गरुडध्वजारोपणकी विधि बताता हूँ, जिसके होनेसे भूत आदि नष्ट हो जाते हैं॥११-१६॥
प्रासाद-बिम्बके द्रव्योंमें जितने परमाणु होते हैं, उतने सहस्र वर्षोंतक मन्दिर-निर्माता पुरुष विष्णुलोकमें निवास करता है। निष्पाप ब्रह्माजी! जब वायुसे ध्वज फहराता है और कलश, वेदी तथा प्रासादबिम्बके कण्ठको आवेष्टित कर लेता है, तब प्रासादकर्ताको ध्वजारोपणकी अपेक्षा भी कोटिगुना अधिक फल प्राप्त होता है, ऐसा समझना चाहिये। पताकाको प्रकृति जानो और दण्डको पुरुष। साथ ही मुझसे यह भी समझ लो कि प्रासाद (मन्दिर) भगवान् वासुदेवकी मूर्ति है। मन्दिर भगवान्को धारण करता है, यही उसमें धरणीतत्त्व है, ऐसा जानो। मन्दिरके भीतर जो शून्य अवकाश है, वही उसमें आकाशतत्त्व है। उसमें जो तेज या प्रकाश है, वही अग्नितत्त्व है और उसके भीतर जो हवाका स्पर्श होता है, वही उसमें वायुतत्त्व है॥१७-२०॥
पाषाण आदिमें ही जो जल है, वह पार्थिव जल है। उसमें पृथ्वीका गुण गन्ध विद्यमान है। प्रतिध्वनिसे जो शब्द प्रकट होता है, वही वहाँका शब्द है। छूनेमें कठोरता आदिका जो अनुभव होता है, वही वहाँका स्पर्श है। शुक्ल आदि वर्ण रूप है। आह्लादका अनुभव करानेवाला रस ही वहाँ रस है। धूप आदिकी गन्ध ही वहाँकी गन्ध है। भेरी आदिमें जो नाद प्रकट होता है, वही मानो वागिन्द्रियका कार्य है। इसलिये वहीं वागिन्द्रियकी स्थिति है। शुकनासामें नासिकाकी स्थिति है। दो भद्रात्मक भुजाएँ कही गयी हैं। शिखरपर जो अण्ड-सा बना रहता है, वही मस्तक कहा गया है और कलशको केश बताया गया है। प्रासादका कण्ठभाग ही उसका कण्ठ जानना चाहिये। वेदीको कंधा कहा गया है। दो नालियाँ गुदा और उपस्थ बतायी गयी हैं। मन्दिरपर जो चूना फेरा गया है, उसीको त्वचा नाम दिया गया है। द्वार उसका मुँह है और प्रतिमाको मन्दिरका जीवात्मा कहा गया है। पिण्डिकाको जीवकी शक्ति समझो और उसकी आकृतिको प्रकृति॥२१-२५॥
निश्चलता उसका गर्भ है और भगवान् केशव उसके अधिष्ठाता। इस प्रकार ये भगवान् विष्णु ही साक्षात् मन्दिररूपसे खड़े हैं। भगवान् शिव उसकी जंघा हैं, ब्रह्मा स्कन्धभागमें स्थित हैं और ऊर्ध्वभागमें स्वयं विष्णु विराजमान हैं। इस प्रकार स्थित हुए प्रासादकी ध्वजरूपसे जो प्रतिष्ठा की गयी है, उसको मुझसे सुनो। शस्त्रादिचिह्नित ध्वजका आरोपण करके देवताओंने दैत्योंको जीता है। अण्डके ऊपर कलश रखकर उसके ऊपर ध्वजकी स्थापना करे। ध्वजका मान बिम्बके मानका आधा भाग है। ध्वजदण्डकी लंबाईके एक तिहाई भागसे चक्रका निर्माण कराना चाहिये। वह चक्र आठ या बारह अरोंका
१२६ * अग्निपुराण *
हो और उसके मध्यभागमें भगवान् नृसिंह अथवा गरुडकी मूर्ति हो। ध्वज-दण्ड टूटा-फूटा या छेदवाला न हो। प्रासादकी जो चौड़ाई है, उसीको दण्डकी लंबाईका मान कहा गया है। अथवा शिखरके आधे या एक तिहाई भागसे उसकी लंबाईका अनुमान करना चाहिये। अथवा द्वारकी लंबाईसे दुगुना बड़ा दण्ड बनाना चाहिये। उस ध्वज-दण्डको देवमन्दिरपर ईशान या वायव्यकोणकी ओर स्थापित करना चाहिये॥ २६—३२॥
उसकी पताका रेशमी आदि वस्त्रोंसे विचित्र शोभायुक्त बनावे। अथवा उसे एक रंगकी ही बनावे। यदि उसे घण्टा, चँवर अथवा छोटी-छोटी घंटियोंसे विभूषित करे तो वह पापोंका नाश करनेवाली होती है। दण्डके अग्रभागसे लेकर भूमितक लंबा जो एक वस्त्र है, उसे 'महाध्वज' कहा गया है। वह सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाला है। जो उससे एक चौथाई छोटा हो, वह ध्वज पूजित होनेपर सर्वमनोरथोंका पूरक होता है। ध्वजके आधे मानवाले वस्त्रसे बने हुए झंडेको 'पताका' कहते हैं अथवा पताकाका कोई माप नहीं होता। ध्वजका विस्तार बीस अङ्गुलके बराबर होना चाहिये। चक्र, दण्ड और ध्वज—इन सबका अधिवासनकी विधिसे देवताकी ही भाँति सकलीकरण करके मण्डप-स्नान (मण्डपमें नहलानेकी क्रिया) आदि सब कार्य करे। 'नेत्रोन्मीलन'को छोड़कर पूर्वोक्त सब कर्मोंका अनुष्ठान करे। आचार्यको चाहिये कि वह इन सबको विधिवत् शय्यापर स्थापित करके इनका अधिवासन करे॥ ३३—३७॥
तदनन्तर विद्वान् पुरुष 'सहस्रशीर्षा०' (यजु० अ० ३१) इत्यादि सूक्तका ध्वजाङ्कित चक्रमें न्यास करे तथा सुदर्शन-मन्त्र एवं 'मनस्तत्त्व'का न्यास करे। यह 'मन' रूपसे उस चक्रका ही 'सजीवीकरण' कहा गया है। सुरश्रेष्ठ! बारह अरोंमें क्रमशः केशव आदि मूर्तियोंका न्यास करना चाहिये। गुरु चक्रकी नाभि, कमल एवं प्रतिनेमियोंमें तत्त्वोंका न्यास करे। कमलमें नृसिंह अथवा विश्वरूपका निवेश करे। दण्डमें जीवसहित सम्पूर्ण सूत्रात्माका न्यास करे। ध्वजमें श्रीहरिका ध्यान करते हुए निष्कल परमात्माका निवेश करे। उनकी बलाबलारूपा व्यापिनी शक्तिका ध्वजके रूपमें ध्यान करे। मण्डपमें उसकी स्थापना और पूजा करके कुण्डोंमें हवन करे। कलशमें सोनेका टुकड़ा और पञ्चरत्न डालकर अस्त्र-मन्त्रसे चक्रकी स्थापना करे। तदनन्तर स्वर्णचक्रको नीचेसे पारेद्वारा सम्प्लावित करके नेत्रपटसे आच्छादित करे। तदनन्तर चक्रका निवेश करे और उसके भीतर श्रीहरिका स्मरण करे॥ ३८—४४॥
'ॐ क्षौं नृसिंहाय नमः।'—इस मन्त्रसे श्रीहरिकी स्थापना और पूजा करे। तदनन्तर बन्धु-बान्धवोंसहित यजमान ध्वज लेकर दही-भातसे युक्त पात्रमें ध्वजका अग्रभाग डाले। आदिमें (ॐ) और अन्तमें 'फट्' लगाकर 'ॐ फट्' इस मन्त्रसे ध्वजका पूजन करे। तत्पश्चात् उस पात्रको सिरपर रखकर नारायणका बारंबार स्मरण करते हुए वाद्योंकी ध्वनि और मङ्गलपाठके साथ परिक्रमा करे। तदनन्तर अष्टाक्षर-मन्त्रसे ध्वजदण्डकी स्थापना करे। विद्वान् पुरुष 'मुञ्चामि त्वा' (ऋक्० १०। १६१। १) इस सूक्तके द्वारा ध्वजको फहरावे। द्विजको चाहिये कि वह आचार्यको पात्र, ध्वज और हाथी आदि दान करे। यह ध्वजारोपणकी साधारण विधि बतायी गयी है॥ ४५—४९॥
जिस देवताका जो चिह्न है, उससे युक्त ध्वजको उसी देवताके मन्त्रसे स्थिरतापूर्वक स्थापित करे। मनुष्य ध्वज-दानके पुण्यसे स्वर्गलोकमें जाता है तथा वह पृथ्वीपर बलवान् राजा होता है॥ ५०॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अवभृथस्नान, द्वारप्रतिष्ठा और ध्वजारोपण आदिकी विधिका वर्णन' नामक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६१॥
- अध्याय ६२ * १२७
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बासठवाँ अध्याय
लक्ष्मी आदि देवियोंकी प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि
श्रीभगवान् कहते हैं— अब मैं सामूहिक रूपसे देवता आदिकी प्रतिष्ठाका तुमसे वर्णन करता हूँ। पहले लक्ष्मीकी, फिर अन्य देवियोंके समुदायकी स्थापनाका वर्णन करूँगा। पूर्ववर्ती अध्यायोंमें जैसा बताया गया है, उसके अनुसार मण्डप-अभिषेक आदि सारा कार्य करे। तत्पश्चात् भद्रपीठपर लक्ष्मीकी स्थापना करके आठ दिशाओंमें आठ कलश स्थापित करे। देवीकी प्रतिमाका घीसे अभ्यञ्जन करके मूल-मन्त्रद्वारा पञ्चगव्यसे उसको स्नान करावे। फिर 'हिरण्यवर्णां हरिणीम्०'^१^ इत्यादि मन्त्रसे लक्ष्मीजीके दोनों नेत्रोंका उन्मीलन करे। 'तां म आवह०'^२^ इत्यादि मन्त्र पढ़कर देवीके लिये मधु, घी और चीनी अर्पित करे। तत्पश्चात् 'अश्वपूर्वाम्०'^३^ इत्यादि मन्त्रसे पूर्ववर्ती कलशके जलद्वारा श्रीदेवीका अभिषेक करे। 'कां सोऽस्मिताम्०'^४^ इस मन्त्रको पढ़कर दक्षिण कलशसे 'चन्द्रां प्रभासाम्०'^५^ इत्यादि मन्त्रका उच्चारण करके पश्चिम कलशसे तथा 'आदित्यवर्णे०'^६^ इत्यादि मन्त्र बोलकर उत्तरवर्ती कलशसे देवीका अभिषेक करे॥ १—५॥
'उपैतु माम्०'^७^ इत्यादि मन्त्रका उच्चारण करके आग्नेय कोणके कलशसे, 'क्षुत्पिपासामलाम्—'^८^ इत्यादि मन्त्र बोलकर नैर्ऋत्यकोणके कलशसे 'गन्धद्वारां दुराधर्षाम्०'^९^ इत्यादि मन्त्रको पढ़कर वायव्यकोणके कलशसे तथा 'मनसः काममाकूतिम्—'^१०^ इत्यादि मन्त्र कहकर ईशानकोणवर्ती कलशसे लक्ष्मीदेवीका अभिषेक करे। 'कर्दमेन प्रजा भूता०'^११^ इत्यादि मन्त्रसे सुवर्णमय कलशके जलसे देवीके मस्तकका अभिषेक करे। तदनन्तर 'आपः सृजन्तु०'^१२^ इत्यादि मन्त्रसे इक्यासी कलशोंद्वारा श्रीदेवीकी प्रतिमाको स्नान करावे॥ ६-७॥
तत्पश्चात् (श्री-प्रतिमाको शुद्ध वस्त्रसे पोंछकर सिंहासनपर विराजमान करे और वस्त्र आदि समर्पित करनेके बाद) 'आर्द्रां पुष्करिणीम्०'^१३^ इस मन्त्रसे गन्ध अर्पित करे। 'आर्द्रां यः करिणीम्०'^१४^ आदिसे पुष्प और माला चढ़ाकर पूजा करे। इसके बाद 'तां म आ वह जातवेदो०'^१५^ इत्यादि मन्त्रसे और 'आनन्दो०'^१६^ इत्यादि श्लोकसे अखिल उपचार अर्पित करे॥ ८॥
१. हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
२. तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्। यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥
३. अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम्। श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम्॥
४. कां सोऽस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्। पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्॥
५. चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्। तां पद्मिनीमीं शरणं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥
६. आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः। तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥
७. उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह। प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे॥
८. क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्। अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्।
९. गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्। ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्॥
१०. मनसः काममाकृतिं वाचः सत्यमशीमहि। पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः॥
११. कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम। श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥
१२. आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे। नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥
१३. आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
१४. आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्। सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
१५. तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्। यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम्॥
१६. आनन्दमन्थरपुरन्दरमुक्तमाल्यं मौलौ बलेन निहितं महिषासुरस्य। पादाम्बुजं भवतु मे विजयाय मञ्जुमञ्जीरशिञ्जितमनोहरमम्बिकायाः॥
१२८ * अग्निपुराण *
'श्रीयन्ती०' आदि मन्त्रसे श्री-प्रतिमाको शय्यापर शयन करावे। फिर श्रीसूक्तसे संनिधिकरण करे और लक्ष्मी (श्री) बीज (श्रीं)-से चित्-शक्तिका विन्यास करके पुनः अर्चना करे। इसके बाद श्रीसूक्तसे मण्डपस्थ कुण्डोंमें कमलों अथवा करवीर-पुष्पोंका हवन करे। होमसंख्या एक हजार या एक सौ होनी चाहिये। गृहोपकरण आदि समस्त पूजन-सामग्री आदितः श्रीसूक्तके मन्त्रोंसे ही समर्पित करे। फिर पूर्ववत् पूर्णरूपसे प्रासाद-संस्कार सम्पन्न करके माता लक्ष्मीके लिये पिण्डिका-निर्माण करे। तदनन्तर उस पिण्डिकापर लक्ष्मीकी प्रतिष्ठा करके श्रीसूक्तसे संनिधिकरण करते हुए, पूर्ववत् उसकी प्रत्येक ऋचाका जप करे॥ ९—१२॥
मूल-मन्त्रसे चित्-शक्तिको जाग्रत् करके पुनः संनिधिकरण करे। तदनन्तर आचार्य और ब्रह्मा तथा अन्य ऋत्विज् ब्राह्मणोंको भूमि, सुवर्ण, वस्त्र, गौ एवं अन्नादिका दान करे। इस प्रकार सभी देवियोंकी स्थापना करके मनुष्य राज्य और स्वर्ग आदिका भागी होता है॥ १३-१४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'लक्ष्मी आदि देवियोंकी प्रतिष्ठाके सामान्य विधानका वर्णन' नामक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६२॥
तिरसठवाँ अध्याय
विष्णु आदि देवताओंकी प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि तथा पुस्तक-लेखन-विधि
श्रीभगवान् कहते हैं— इस प्रकार विनतानन्दन गरुड, सुदर्शनचक्र, ब्रह्मा और भगवान् नृसिंहकी प्रतिष्ठा भी उनके अपने-अपने मन्त्रसे श्रीविष्णुकी ही भाँति करनी चाहिये; इसका श्रवण करो॥ १॥
'ॐ सुदर्शन महाचक्र शान्त दुष्टभयंकर, छिन्धिच्छिन्धि भिन्धि भिन्धि विदारय विदारय परमन्त्रान् ग्रस ग्रस भक्षय भक्षय भूतांस्त्रासय त्रासय हुं फट् सुदर्शनाय नमः।'
इस मन्त्रसे चक्रका पूजन करके वीर पुरुष युद्धक्षेत्रमें शत्रुओंको विदीर्ण कर डालता है॥ २-३॥
'ॐ क्षौं नरसिंह उग्ररूप ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल स्वाहा।'
यह नरसिंहभगवान्का मन्त्र है। अब मैं तुमको पाताल-नृसिंह-मन्त्रका उपदेश करता हूँ—॥ ४-५॥
'ॐ क्षौं नमो भगवते नरसिंहाय प्रदीप्तसूर्य-कोटिसहस्रसमतेजसे वज्रनखदंष्ट्रायुधाय स्फुटविकट-विकीर्णकेसरसटाप्रक्षुभितमहार्णवाम्भोदुन्दुभिनिर्घोषाय सर्वमन्त्रोत्तारणाय एहोहि भगवन्नरसिंह पुरुष परापर ब्रह्म सत्येन स्फुर स्फुर विजृम्भ विजृम्भ आक्रम आक्रम गर्ज गर्ज मुञ्च मुञ्च सिंहनादं विदारय विदारय विद्रावय विद्रावयाऽऽविशाऽऽविश सर्वमन्त्ररूपाणि मन्त्रजातींश्च हन हन छिन्दच्छिन्द संक्षिप संक्षिप दर दर दारय दारय स्फुट स्फुट स्फोटय स्फोटय ज्वालामालासंघातमय सर्वतोऽनन्तज्वालावज्राशनिचक्रेण सर्वपातालानुत्सादयोत्सादय सर्वतोऽनन्तज्वालावज्रशरपञ्जरेण सर्वपातालान्यनिवारय परिवारय सर्वपातालासुरवासिनां हृदयान्याकर्षयाऽऽकर्षय शीघ्रं दह दह पच पच मथ मथ शोषय शोषय निकृन्तय निकृन्तय तावद्यावन्मे वशमागताः पातालेभ्यः ( फट्सुरेभ्यः फण्मन्त्ररूपेभ्यः फण्मन्त्रजातिभ्यः फट् संशयान्मां भगवन्नरसिंहरूप विष्णो सर्वापद्भ्यः ) सर्वमन्त्ररूपेभ्यो रक्ष रक्ष हुं फण्ममो नमस्ते॥ ६॥'
* अध्याय ६३ * १२९
यह श्रीहरिस्वरूपिणी नृसिंह-विद्या है, जो अर्थसिद्धि प्रदान करनेवाली है। त्रैलोक्यमोहन श्रीविष्णुकी त्रैलोक्यमोहन मन्त्रसमूहसे प्रतिष्ठा करे। उनके द्विभुज विग्रहके वाम हस्तमें गदा और दक्षिण हस्तमें अभयमुद्रा होनी चाहिये। यदि चतुर्भुज रूपकी प्रतिष्ठा की जाय, तो दक्षिणोर्ध्व हस्तमें चक्र और वामोर्ध्वमें पाञ्चजन्य शङ्ख होना चाहिये। उनके साथ श्री एवं पुष्टि, अथवा बलराम, सुभद्राकी भी स्थापना करनी चाहिये। श्रीविष्णु, वामन, वैकुण्ठ, हयग्रीव और अनिरुद्धकी प्रासादमें, घरमें अथवा मण्डपमें स्थापना करनी चाहिये। मत्स्यादि अवतारोंको जल-शय्यापर स्थापित करके शयन करावे। संकर्षण, विश्वरूप, रुद्रमूर्तिलिङ्ग, अर्धनारीश्वर, हरिहर, मातृकागण, भैरव, सूर्य, ग्रह, विनायक तथा इन्द्र आदिके द्वारा सेवनीया गौरी, चित्रजा एवं 'बलाबला' विद्याकी भी उसी प्रकार स्थापना करनी चाहिये॥ ७—१२॥
अब मैं ग्रन्थकी प्रतिष्ठा और उसकी लेखन-विधिका वर्णन करता हूँ। आचार्य स्वस्तिक-मण्डलमें शरयन्त्रके आसनपर स्थित लेख्य, लिखित पुस्तक, विद्या एवं श्रीहरिका यजन करे। फिर यजमान, गुरु, विद्या एवं भगवान् विष्णु और लिपिक (लेखक) पुरुषकी अर्चना करे। तदनन्तर पूर्वाभिमुख होकर पद्मिनीका ध्यान करे और चाँदीकी दावातमें रखी हुई स्याही तथा सोनेकी कलमसे देवनागरी अक्षरोंमें पाँच श्लोक लिखे। फिर ब्राह्मणोंको यथाशक्ति भोजन करावे और अपनी सामर्थ्यके अनुसार दक्षिणा दे। आचार्य, विद्या और श्रीविष्णुका पूजन करके लेखक पुराण आदिका लेखन प्रारम्भ करे। पूर्ववत् मण्डल आदिके द्वारा ईशानकोणमें भद्रपीठपर दर्पणके ऊपर पुस्तक रखकर पहलेकी ही भाँति कलशोंसे सेचन करे। फिर यजमान नेत्रोन्मीलन करके शय्यापर उस पुस्तकका स्थापन करे। तत्पश्चात् पुस्तकपर पुरुषसूक्त तथा वेद आदिका न्यास करे॥ १३—१८॥
तदनन्तर प्राण-प्रतिष्ठा, पूजन एवं चरुहोम करके, पूजनके पश्चात् दक्षिणासे आचार्य आदिका सत्कार करके ब्राह्मण-भोजन करावे। उस ग्रन्थको रथ या हाथीपर रखकर जनसमाजके साथ नगरमें घुमावे। अन्तमें गृह या देवालयमें उसे स्थापित करके उसकी पूजा करे। ग्रन्थको वस्त्रसे आवेष्टित करके पाठके आदि-अन्तमें उसका पूजन करे। पुस्तकवाचक विश्वशान्तिका संकल्प करके एक अध्यायका पाठ करे। फिर गुरु कुम्भजलसे यजमान आदिका अभिषेक करे। ब्राह्मणको पुस्तक-दान करनेसे अनन्त फलकी प्राप्ति होती है। गोदान, भूमि-दान और विद्यादान—ये तीन अतिदान कहे गये हैं। ये क्रमशः दोहन, वपन और पाठमात्र करनेपर नरकसे उद्धार कर देते हैं। मसीलिखित पत्र-संचयका दान विद्यादानका फल देता है और उन पत्रोंकी एवं अक्षरोंकी जितनी संख्या होती है, दाता पुरुष उतने ही हजार वर्षोंतक विष्णुलोकमें पूजित होता है। पञ्चरात्र, पुराण और महाभारतका दान करनेवाला मनुष्य अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके परमतत्त्वमें विलीन हो जाता है॥ १९—२६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'विष्णु आदि देवताओंकी प्रतिष्ठाकी सामान्य विधिका वर्णन' नामक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६३॥
१३० * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
चौंसठवाँ अध्याय
कुआँ, बावड़ी और पोखरे आदिकी प्रतिष्ठाकी विधि
**श्रीभगवान् कहते हैं—**ब्रह्मन्! अब मैं कूप, वापी और तड़ागकी प्रतिष्ठाकी विधिका वर्णन करता हूँ, उसे सुनो। भगवान् श्रीहरि ही जलरूपसे देवश्रेष्ठ सोम और वरुण हुए हैं। सम्पूर्ण विश्व अग्नीषोमय है। जलरूप नारायण उसके कारण हैं। मनुष्य वरुणकी स्वर्ण, रौप्य या रत्नमयी प्रतिमाका निर्माण करावे। वरुणदेव द्विभुज, हंसारूढ और नदी एवं नालोंसे युक्त हैं। उनके दक्षिण-हस्तमें अभयमुद्रा और वाम-हस्तमें नागपाश सुशोभित होता है। यज्ञमण्डपके मध्यभागमें कुण्डसे सुशोभित वेदिका होनी चाहिये तथा उसके तोरण (पूर्व-द्वार)-पर कमण्डलुसहित वरुण-कलशकी स्थापना करनी चाहिये। इसी तरह भद्रक (दक्षिण-द्वार), अर्द्धचन्द्र (पश्चिम-द्वार) तथा स्वस्तिक (उत्तर-द्वार)-पर भी वरुणकलशोंकी स्थापना आवश्यक है। कुण्डमें अग्निका आधान करके पूर्णाहुति प्रदान करे॥ १-५॥
'ये ते शतं वरुण०' आदि मन्त्रसे स्नानपीठपर वरुणकी स्थापना करे। तत्पश्चात् आचार्य मूल-मन्त्रका उच्चारण करके, वरुण देवताकी प्रतिमाको वहीं पधराकर, उसमें घृतका अभ्यङ्ग करे। फिर 'शं नो देवी०' (अथर्व० १।६।१; शु० यजु० ३६।१२) इत्यादि मन्त्रसे उसका प्रक्षालन करके 'शुद्धवालः सर्वशुद्धवालो०' (शु० यजु० २४।३) आदिसे पवित्र जलद्वारा उसे स्नान करावे। तदनन्तर स्नानपीठकी पूर्वादि दिशाओंमें आठ कलशोंका अधिवासन (स्थापन) करे। इनमेंसे पूर्ववर्ती कलशमें समुद्रके जल, आग्नेयकोणवर्ती कुम्भमें गङ्गाजल, दक्षिणके कलशमें वर्षाके जल, नैर्ऋत्यकोणवाले कुम्भमें झरनेके जल, पश्चिमवाले कलशमें नदीके जल, वायव्यकोणमें नदके जल, उत्तर-कुम्भमें औद्भिद्य (सोते)-के जल एवं ईशानवर्ती कलशमें तीर्थके जलको भरे। उपर्युक्त विविध जल न मिलनेपर सब कलशोंमें नदीके ही जलको डाले। उक्त सभी कलशोंको 'यासां राजा०' (अथर्व० १।३३।२) आदि मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे। विद्वान् पुरोहित वरुणदेवका 'सुमित्रिया०' (शु० यजु० ३५।१२) आदि मन्त्रसे मार्जन और निर्मञ्छन करके, 'चित्रं देवानां०' (शु० यजु० १३।४६) तथा 'तच्चक्षुर्देवहितं०' (शु० यजु० ३६।२४)—इन मन्त्रोंसे मधूत्रय (शहद, घी और चीनी) द्वारा वरुणदेवके नेत्रोंका उन्मीलन करे। फिर वरुणकी उस सुवर्णमयी प्रतिमामें ज्योतिका पूजन करे एवं आचार्यको गोदान दे॥ ६-१०$\frac{१}{२}$॥
तदनन्तर 'समुद्रज्येष्ठाः०' (ऋक्० ७।४९।१) आदि मन्त्रके द्वारा वरुणदेवताका पूर्व-कलशके जलसे अभिषेक करे। 'समुद्रं गच्छ०' (यजु० ६।२१) इत्यादि मन्त्रके द्वारा अग्निकोणवर्ती कलशके गङ्गाजलसे, 'सोमो धेनुं०' (शु० यजु० ३४।२१) इत्यादि मन्त्रके द्वारा दक्षिण-कलशके वर्षाजलसे, 'देवीरापो०' (शु० यजु० ६।२७) इत्यादि मन्त्रके द्वारा नैर्ऋत्यकोणवर्ती कलशके निर्झर-जलसे, 'पञ्च नद्यः०' (शु० यजु० ३४।११) आदि मन्त्रके द्वारा पश्चिम-कलशके नदी-जलसे, 'उद्भिद्भ्यः०' इत्यादि मन्त्रके द्वारा उत्तरवर्ती कलशके उद्भिज्ज-जलसे और पावमानी ऋचाके द्वारा ईशानकोणवाले कलशके तीर्थ-जलसे वरुणका अभिषेक करे। फिर यजमान मौन रहकर 'आपो हि ष्ठा०' (शु० यजु० ११।५०) मन्त्रके द्वारा पञ्चगव्यसे, 'हिरण्यवर्णा०' (श्रीसूक्त)-के द्वारा स्वर्ण-जलसे, 'आपो अस्मान्०' (शु० यजु० ४।२)
- अध्याय ६४ * १३१
मन्त्रके द्वारा वर्षाजलसे, व्याहृतियोंका उच्चारण करके कूप-जलसे तथा 'आपो देवीः०' (शु० यजु० १२।३५) मन्त्रके द्वारा तड़ाग-जल एवं तोरणवर्ती वरुण-कलशके जलसे वरुणदेवको स्नान करावे। 'वरुणस्योत्तम्भनमसि०' (शु० यजु० ४।३६) मन्त्रके द्वारा पर्वतीय जल (अर्थात् झरनेके पानी)-से भरे हुए इक्यासी कलशोंद्वारा उसको स्नान करावे। फिर 'त्वं नो अग्ने वरुणस्य०' (शु० यजु० २१।३) इत्यादि मन्त्रसे अर्घ्य प्रदान करे। व्याहृतियोंका उच्चारण करके मधुपर्क, 'बृहस्पते अति यदर्यो०' (शु० यजु० २६।३) मन्त्रसे वस्त्र, 'इमं मे वरुणः०' (शु० यजु० २१।१) इस मन्त्रसे पवित्रक और प्रणवसे उत्तरीय समर्पित करे॥ ११-१६॥
वारुणसूक्तसे वरुणदेवताको पुष्प, चँवर, दर्पण, छत्र और पताका निवेदन करे। मूल-मन्त्रसे 'उत्तिष्ठ' ऐसा कहकर उत्थापन करे। उस रात्रिको अधिवासन करे। 'वरुणं वा०' इस मन्त्रसे संनिधीकरण करके वरुणसूक्तसे उनका पूजन करे। फिर मूल-मन्त्रसे सजीवीकरण करके चन्दन आदिद्वारा पूजन करे। मण्डलमें पूर्ववत् अर्चना कर ले। अग्निकुण्डमें समिधाओंका हवन करे। वैदिक मन्त्रोंसे गङ्गा आदि चारों गौओंका दोहन करे। तदनन्तर सम्पूर्ण दिशाओंमें यवनिर्मित चरुकी स्थापना करके होम करे। चरुको व्याहृति, गायत्री या मूल-मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके, सूर्य, प्रजापति, दिव्, अन्तक-निग्रह, पृथिवी, देहधृति, स्वधृति, रति, रमती, उग्र, भीम, रौद्र, विष्णु, वरुण, धाता, रायस्पोष, महेन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, ईश, अनन्त, ब्रह्मा, राजा जलेश्वर (वरुण)—इन नामोंका चतुर्थ्यन्तरूप बोलकर, अन्तमें स्वाहा लगाकर बलि समर्पित करे। 'इदं विष्णुः०' (शु० यजु०५। १५)और 'तद् विप्रासो०' (शु० यजु० ३४।४४)—इन मन्त्रोंसे आहुति दे। 'सोमो धेनुम्०' (शु० यजु० ३४।२१) मन्त्रसे छः आहुतियाँ देकर 'इमं मे वरुणः०' (शु० यजु० २१।१) मन्त्रसे एक आहुति दे। 'आपो हि ष्ठा०' (शुक्ल यजु० ११।५०-५२) आदि तीन ऋचाओंसे तथा 'इमा रुद्र०' इत्यादि मन्त्रसे भी आहुतियाँ दे॥ १७-२५॥
फिर दसों दिशाओंमें बलि समर्पित करे और गन्ध-पुष्प आदिसे पूजन करे। तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष प्रतिमाको उठाकर मण्डलमें स्थापित करे तथा गन्ध-पुष्प आदि एवं स्वर्ण-पुष्प आदिके द्वारा क्रमशः उसका पूजन करे। तदनन्तर श्रेष्ठ आचार्य आठों दिशाओंमें दो बित्ते प्रमाणके जलाशय और आठ बालुकामयी सुरम्य वेदियोंका निर्माण करे। 'वरुणस्य०' (यजु० ४।३६) इस मन्त्रसे घृत एवं यवनिर्मित चरुकी पृथक्-पृथक् एक सौ आठ आहुतियाँ देकर शान्ति-जल ले आवे और उस जलसे वरुणदेवके सिरपर अभिषेक करके सजीवीकरण करे। वरुणदेव अपनी धर्मपत्नी गौरीदेवीके साथ विराजमान नदी-नदोंसे घिरे हुए हैं—इस प्रकार उनका ध्यान करे। 'ॐ वरुणाय नमः।' मन्त्रसे पूजन करके सांनिध्यकरण करे। तत्पश्चात् वरुणदेवको उठाकर गजराजके पृष्ठदेश आदि सवारियोंपर मङ्गल-द्रव्योंसहित स्थापित करके नगरमें भ्रमण करावे। इसके बाद उस वरुणमूर्तिको 'आपो हि ष्ठा०' आदि मन्त्रका उच्चारण करके त्रिमधुयुक्त कलश-जलमें रखे और कलशसहित वरुणको जलाशयके मध्यभागमें सुरक्षितरूपसे स्थापित कर दे॥ २६-३१॥
इसके बाद यजमान स्नान करके वरुणका ध्यान करे। फिर ब्रह्माण्ड-संज्ञिका सृष्टिको अग्निबीज (रं)-से दग्ध करके उसकी भस्मराशिको जलसे प्लावित करनेकी भावना करे। 'समस्त लोक जलमय हो गया है'—ऐसी भावना करके
१३२ * अग्निपुराण *
उस जलमें जलेश्वर वरुणका ध्यान करे। इस प्रकार जलके मध्यभागमें वरुणदेवताका चिन्तन करके वहाँ यूपकी स्थापना करे। यूप चतुष्कोण, अष्टकोण या गोलाकार हो तो उत्तम माना गया है। उसकी लंबाई दस हाथकी होनी चाहिये। उसमें उपास्यदेवताका परिचायक चिह्न हो। उसका निर्माण किसी यज्ञ-सम्बन्धी वृक्षके काष्ठसे हुआ हो। ऐसा ही यूप कूपके लिये उपयोगी होता है। उसके मूलभागमें हेममय फलका न्यास करे। वापीमें पंद्रह हाथका, पुष्करिणीमें बीस हाथका और पोखरेमें पचीस हाथका यूपकाष्ठ जलके भीतर निवेशित करे। यज्ञमण्डपके प्राङ्गणमें ‘यूप ब्रह्म०’ आदि मन्त्रसे यूपकी स्थापना करके उसको वस्त्रोंसे आवेष्टित करे तथा यूपके ऊपर पताका लगावे। उसका गन्ध आदिसे पूजन करके जगत्के लिये शान्तिकर्म करे। आचार्यको भूमि, गौ, सुवर्ण तथा जलपात्र आदि दक्षिणामें दे। अन्य ब्राह्मणोंको भी दक्षिणा दे और समागत जनोंको भोजन कराये।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं ये केचित्सलिलार्थिनः।
ते तृप्तिमुपगच्छन्तु तडागस्थेन वारिणा॥
‘ब्रह्मासे लेकर तृण-पर्यन्त जो भी जलपिपासु हैं, वे इस तडागमें स्थित जलके द्वारा तृप्तिको प्राप्त हों।’—ऐसा कहकर जलका उत्सर्ग करे और जलाशयमें पञ्चगव्य डाले॥ ३२—४०॥
तदनन्तर ‘आपो हि ष्ठा०’ इत्यादि तीन ऋचाओंसे ब्राह्मणोंद्वारा सम्पादित शान्ति-जल तथा पवित्र तीर्थ-जलका निक्षेप करे एवं ब्राह्मणोंको गोवंशका दान करे। सर्वसाधारणके लिये बेरोक-टोक अन्न-वितरणका प्रबन्ध करावे। जो मनुष्य एक लाख अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करता है तथा जो एक बार भी जलाशयकी प्रतिष्ठा करता है, उसका पुण्य उन यज्ञोंकी अपेक्षा हजारों गुना अधिक है। वह स्वर्गलोकको प्राप्त होकर विमानमें प्रमुदित होता है और नरकको कभी नहीं प्राप्त होता है॥ ४१—४३॥
जलाशयसे गौ आदि पशु जल पीते हैं, इससे कर्ता पापमुक्त हो जाता है, मनुष्य जलदानसे सम्पूर्ण दानोंका फल प्राप्त करके स्वर्गलोकको जाता है॥ ४४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘कुआँ, बावड़ी तथा पोखरे आदिकी प्रतिष्ठाका वर्णन’ नामक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६४॥
पैंसठवाँ अध्याय
सभा-स्थापन और एकशालादि भवनके निर्माण आदिकी विधि, गृहप्रवेशका क्रम तथा गोमातासे अभ्युदयके लिये प्रार्थना
श्रीभगवान् बोले— अब मैं सभा (देवमन्दिर) आदिकी स्थापनाका विषय बताऊँगा तथा इन सबकी प्रवृत्तिके विषयमें भी कुछ कहूँगा। भूमिकी परीक्षा करके वहाँ वास्तुदेवताका पूजन करे। अपनी इच्छाके अनुसार देव-सभा (मन्दिर)-का निर्माण करके अपनी ही रुचिके अनुकूल देवताओंकी स्थापना करे। नगरके चौराहेपर अथवा ग्राम आदिमें सभाका निर्माण करावे; सूने स्थानमें नहीं। देव-सभाका निर्माण एवं स्थापना करनेवाला पुरुष निर्मल (पापरहित) होकर, अपने समस्त कुलका उद्धार करके स्वर्गलोकमें आनन्दका अनुभव करता है। इस विधिसे भगवान् श्रीहरिके सतमहले मन्दिरका निर्माण करना चाहिये। ठीक उसी तरह, जैसे राजाओंके प्रासाद बनाये जाते हैं। अन्य देवताओंके लिये भी यही बात है। पूर्वादि दिशाओंके क्रमसे जो ध्वज आदि आय
* अध्याय ६५ * १३३
होते हैं, उनमेंसे कोण-दिशाओंमें स्थित आयोंको त्याग देना चाहिये। चार, तीन, दो अथवा एकशालाका गृह बनावे। जहाँ व्यय (ऋण) अधिक हो, ऐसे 'पद¹' पर घर न बनावे; क्योंकि वह व्ययरूपी दोषको उत्पन्न करनेवाला होता है। अधिक 'आय' होनेपर भी पीड़ाकी सम्भावना रहती है; अतः आय-व्ययको समभावसे संतुलित करके रखे॥ १-५$\frac{१}{२}$॥
घरकी लंबाई और चौड़ाई जितने हाथकी हों, उन्हें परस्पर गुणित करनेसे जो संख्या होती है, उसे 'करराशि' कहा गया है; उसे गर्गाचार्यकी बतायी हुई ज्योतिष-विद्यामें प्रवीण गुरु (पुरोहित) आठगुना करे। फिर सातसे भाग देनेपर शेषके अनुसार 'वार' का निश्चय होता है और आठसे भाग देनेपर जो शेष होता है, वह 'व्यय' माना गया है। अथवा विद्वान् पुरुष करराशिमें सातसे गुणा करे। फिर उस गुणनफलमें आठसे भाग देकर शेषके अनुसार ध्वजादि आयोंकी कल्पना करे।
१. ध्वज, २. धूम्र, ३. सिंह, ४. श्वान, ५. वृषभ, ६. खर (गधा), ७. गज (हाथी) और ८. ध्वाङ्क्ष (काक)—ये क्रमशः आठ आय कहे गये हैं, जो पूर्वादि दिशाओंमें प्रकट होते हैं—इस प्रकार इनकी कल्पना करनी चाहिये॥ ६-९॥
तीन शालाओंसे युक्त गृहके अनेक भेदोंमेंसे तीन प्रारम्भिक भेद उत्तम माने गये हैं।² उत्तर-पूर्व दिशामें इसका निर्माण वर्जित है। दक्षिण दिशामें अन्यगृहसे युक्त दो शालाओंवाला भवन सदा श्रेष्ठ माना जाता है। दक्षिण दिशामें अनेक या एक शालावाला गृह भी उत्तम है। दक्षिण-पश्चिममें भी एक शालावाला गृह श्रेष्ठ होता है। एक शालावाले गृहके जो प्रथम (ध्रुव और धान्य नामक) दो भेद हैं, वे उत्तम हैं। इस प्रकार गृहके सोलह³ भेदोंमेंसे अधिकांश (अर्थात् १०) उत्तम हैं और शेष (छः, अर्थात् पाँचवाँ, नवाँ, दसवाँ, ग्यारहवाँ, तेरहवाँ और चौदहवाँ भेद) भयावह हैं। चार शाला (या द्वार)-वाला गृह सदा उत्तम है; वह सभी दोषोंसे रहित है। देवताके लिये एक मंजिलसे लेकर सात मंजिलतकका मन्दिर बनावे, जो द्वार-वेधादि दोष तथा पुराने सामानसे रहित हो। उसे सदा मानव-समुदायके लिये कथित कर्म एवं प्रतिष्ठा-विधिके अनुसार स्थापित करे॥ १०-१३$\frac{१}{२}$॥
गृहप्रवेश करनेवाले गृहस्थ पुरुषको चाहिये कि वह आलस्य छोड़कर प्रातःकाल सर्वौषधि-मिश्रित जलसे स्नान करके, पवित्र हो, दैवज्ञ ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें मधुर अन्न (मीठे पकवान) भोजन करावे। फिर उन ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर गायके पीठपर हाथ रखे हुए, पूर्ण कलश आदिसे सुशोभित तोरणयुक्त गृहमें प्रवेश करे। घरमें जाकर एकाग्रचित्त हो, गौके सम्मुख हाथ जोड़ यह पुष्टिकारक मन्त्र पढ़े—'ॐ श्रीवसिष्ठजीके द्वारा लालित-पालित नन्दे! धन और संतान देकर मेरा आनन्द बढ़ाओ। प्रजाको विजय दिलानेवाली भार्गवनन्दिनि जये! तुम मुझे धन और सम्पत्तिसे आनन्दित करो।
१. भूमिकी लंबाई-चौड़ाईको परस्पर गुणित करनेसे जो संख्या आती है, उसे 'पद' कहते हैं।
२-३. नारदपुराण, पूर्वभाग, द्वितीयपाद, अध्याय ५६के श्लोक ५८० से ५८२ में कहा गया है कि 'घरके छः भेद हैं—एकशाला, द्विशाला, त्रिशाला, चतुःशाला, सप्तशाला और दशशाला'। इनमेंसे प्रत्येकके सोलह-सोलह भेद होते हैं। उन सबके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—१. ध्रुव, २. धान्य, ३. जय, ४. नन्द, ५. खर, ६. कान्त, ७. मनोरम, ८. सुमुख, ९. दुर्मुख, १०. क्रूर, ११. शत्रुद, १२. स्वर्णद, १३. क्षय, १४. आक्रन्द, १५. विपुल, १६. विजय। पूर्वादि दिशाओंमें इनका निर्माण होता है। इनका जैसा नाम, वैसा ही गुण है।
१३४ * अग्निपुराण *
अङ्गिराकी पुत्री पूर्णे! तुम मेरे मनोरथको पूर्ण करो—मुझे पूर्णकाम बना दो। काश्यपकुमारी भद्रे! तुम मेरी बुद्धिको कल्याणमयी बना दो। सबको आनन्द प्रदान करनेवाली वसिष्ठनन्दिनी नन्दे! तुम समस्त बीजों और ओषधियोंसे युक्त तथा सम्पूर्ण रत्नौषधियोंसे सम्पन्न होकर इस सुन्दर घरमें सदा आनन्दपूर्वक रहो'॥ १४-१९॥
'कश्यप प्रजापतिकी पुत्री देवि भद्रे! तुम सर्वथा सुन्दर हो, महती महत्तासे युक्त हो, सौभाग्यशालिनी एवं उत्तम व्रतका पालन करनेवाली हो; मेरे घरमें आनन्दपूर्वक निवास करो। देवि भार्गवि जये! सर्वश्रेष्ठ आचार्य-चरणोंने तुम्हारा पूजन किया है, तुम चन्दन और पुष्पमालासे अलंकृत हो तथा संसारके समस्त ऐश्वर्योंको देनेवाली हो। तुम मेरे घरमें आनन्दपूर्वक विहरो। अङ्गिरामुनिकी पुत्री पूर्णे! तुम अव्यक्त एवं अव्याकृत हो; इष्टके देवि! तुम मुझे अभीष्ट वस्तु प्रदान करो। मैं तुम्हारी इस घरमें प्रतिष्ठा चाहता हूँ। देवि! तुम देशके स्वामी (राजा), ग्राम या नगरके स्वामी तथा गृहस्वामीपर भी अनुग्रह करनेवाली हो। मेरे घरमें जन, धन, हाथी, घोड़े तथा गाय-भैंस आदि पशुओंकी वृद्धि करनेवाली बनो'॥ २०-२३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सभा आदिकी स्थापनाके विधानका वर्णन' नामक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६५॥
छाछठवाँ अध्याय
देवता-सामान्य-प्रतिष्ठा
श्रीभगवान् कहते हैं— अब मैं देव-समुदायकी प्रतिष्ठाका वर्णन करूँगा। यह भगवान् वासुदेवकी प्रतिष्ठाकी भाँति ही होती है। आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, ऋषि तथा अन्य देवगण—ये देवसमुदाय हैं। इनकी स्थापनाके विषयमें जो विशेषता है, वह बतलाता हूँ। जिस देवताका जो नाम है, उसका आदि अक्षर ग्रहण करके उसे मात्राओंद्वारा भेदन करे, अर्थात् उसमें स्वरमात्रा लगावे। फिर दीर्घ स्वरोंसे युक्त उन बीजोंद्वारा अङ्गन्यास करे। उस प्रथम अक्षरको बिन्दु और प्रणवसे संयुक्त करके 'बीज' माने। समस्त देवताओंका मूल-मन्त्रके द्वारा ही पूजन एवं स्थापन करे। इसके सिवा मैं नियम, व्रत, कृच्छ्र, मठ, सेतु, गृह, मासोपवास और द्वादशीव्रत आदिकी स्थापनाके विषयमें भी कहूँगा॥ १-४½॥
पहले शिला, पूर्णकुम्भ और कांस्यपात्र लाकर रखे। साधक ब्रह्मकूर्चको लाकर 'तद् विष्णोः परमम्प०' (शु० यजु० ६।५) मन्त्रके द्वारा कपिला गौके दुग्धसे यवमय चरु श्रपित करे। प्रणवके द्वारा उसमें घृत डालकर दर्वी (कलछी)-से संघटित करे। इस प्रकार चरुको सिद्ध करके उतार ले। फिर श्रीविष्णुका पूजन करके हवन करे। व्याहृति और गायत्रीसे युक्त 'तद्विप्रासो०' (शु० यजु० ३४।४४) आदि मन्त्रसे चरु-होम करे। 'विश्वतश्चक्षुः०' (शु० यजु० १७।१९) आदि वैदिक मन्त्रोंसे भूमि, अग्नि, सूर्य, प्रजापति, अन्तरिक्ष, द्यौ, ब्रह्मा, पृथ्वी, कुबेर तथा राजा सोमको चतुर्थ्यन्त एवं 'स्वाहा' संयुक्त करके इनके उद्देश्यसे आहुतियाँ प्रदान करे। इन्द्र आदि देवताओंको इन्द्र आदिसे सम्बन्धित मन्त्रोंद्वारा आहुति दे। इस प्रकार चरुभागोंका हवन करके आदरपूर्वक दिग्बलि समर्पित करे॥ ५-१०॥
फिर एक सौ आठ पलाश-समिधाओंका हवन करके पुरुषसूक्तसे घृत-होम करे। 'इरावती
* अध्याय ६६ * १३५
धेनुमती०' (शु० यजु० ५।१६) मन्त्रसे तिलाष्टकका होम करके ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव — इन देवताओंके पार्षदों, ग्रहों तथा लोकपालोंके लिये पुनः आहुति दे। पर्वत, नदी, समुद्र—इन सबके उद्देश्यसे आहुतियोंका हवन करके, तीन महाव्याहृतियोंका उच्चारण करके, स्रुवाके द्वारा तीन पूर्णाहुति दे। पितामह! 'वौषट्' संयुक्त वैष्णव मन्त्रसे पञ्चगव्य तथा चरुका प्राशन करके आचार्यको सुवर्णयुक्त तिलपात्र, वस्त्र एवं अलंकृत गौ दक्षिणामें दे। विद्वान् पुरुष 'भगवान् विष्णुः प्रीयताम्'—ऐसा कहकर व्रतका विसर्जन करे॥ ११—१५ ॥
मैं मासोपवास आदि व्रतोंकी दूसरी विधि भी कहता हूँ। पहले देवाधिदेव श्रीहरिको यज्ञसे सन्तुष्ट करे। तिल, तण्डुल, नीवार, श्यामाक अथवा यवके द्वारा वैष्णव चरु श्रपित करे। उसको घृतसे संयुक्त करके उतारकर मूर्ति-मन्त्रोंसे हवन करे। तदनन्तर मासाधिपति विष्णु आदि देवताओंके उद्देश्यसे पुनः होम करे॥ १६—१८ ॥
ॐ श्रीविष्णवे स्वाहा। ॐ विष्णवे विभूषणाय स्वाहा। ॐ विष्णवे शिपिविष्टाय स्वाहा। ॐ नरसिंहाय स्वाहा। ॐ पुरुषोत्तमाय स्वाहा।
—आदि मन्त्रोंसे घृतप्लुत अश्वत्थवृक्षकी बारह समिधाओंका हवन करे। 'विष्णो रराटमसि०' (शु० यजु० ५।२१) मन्त्रके द्वारा भी बारह आहुतियाँ दे। फिर 'इदं विष्णु०' (शु० यजु० ५।१५) 'इरावती०' (शु० यजु० ५।१६) मन्त्रसे चरुकी बारह आहुतियाँ प्रदान करे। 'तद्विप्रासो०' (शु० यजु० ३४।४४) आदि मन्त्रसे घृताहुति समर्पित करे। फिर शेष होम करके तीन पूर्णाहुति दे। 'युञ्जते०' (शु० यजु० ५।१४) आदि अनुवाकका जप करके मन्त्रके आदिमें स्वकर्तृक मन्त्रोच्चारणके पश्चात् पीपलके पत्ते आदिके पात्रमें रखकर चरुका प्राशन करे॥ १९—२२ $\frac{\text{१}}{\text{२}}$ ॥
तदनन्तर मासाधिपतियोंके उद्देश्यसे बारह ब्राह्मणोंको भोजन करावे। आचार्य उनमें तेरहवाँ होना चाहिये। उनको मधुर जलसे पूर्ण तेरह कलश, उत्तम छत्र, पादुका, श्रेष्ठ वस्त्र, सुवर्ण तथा माला प्रदान करे। व्रतपूर्तिके लिये सभी वस्तुएँ तेरह-तेरह होनी चाहिये। 'गौएँ प्रसन्न हों। वे हर्षित होकर चरें।'—ऐसा कहकर पौंसला, उद्यान, मठ तथा सेतु आदिके समीप गोपथ (गोचरभूमि) छोड़कर दस हाथ ऊँचा यूप निवेशित करे। गृहस्थ घरमें होम तथा अन्य कार्य विधिवत् करके, पूर्वोक्त विधिके अनुसार गृहमें प्रवेश करे। इन सभी कार्योंमें जनसाधारणके लिये अनिवारित अन्न-सत्र खुलवा दे। विद्वान् पुरुष ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा दे॥ २३—२८ ॥
जो मनुष्य उद्यानका निर्माण कराता है, वह चिरकालतक नन्दनकाननमें निवास करता है। मठ-प्रदानसे स्वर्गलोक एवं इन्द्रलोककी प्राप्ति होती है। प्रपादान करनेवाला वरुणलोकमें तथा पुलका निर्माण करनेवाला देवलोकमें निवास करता है। ईंटका सेतु बनवानेवाला भी स्वर्गको प्राप्त होता है। गोपथ-निर्माणसे गोलोककी प्राप्ति होती है। नियमों और व्रतोंका पालन करनेवाला विष्णुके सारूप्यको अधिगत करता है। कृच्छ्रव्रत करनेवाला सम्पूर्ण पापोंका नाश कर देता है। गृहदान करके दाता प्रलयकालपर्यन्त स्वर्गमें निवास करता है। गृहस्थ-मनुष्योंको शिव आदि देवताओंकी समुदाय-प्रतिष्ठा करनी चाहिये॥ २९—३२ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'देवता-सामान्य-प्रतिष्ठा-कथन' नामक छासठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६६ ॥
१३६ * अग्निपुराण *
सड़सठवाँ अध्याय
जीर्णोद्धार-विधि
**श्रीभगवान् कहते हैं—**ब्रह्मन्! अब मैं जीर्णोद्धारकी विधि बतलाता हूँ। आचार्य मूर्तिको विभूषित करके स्नान करावे। अत्यन्त जीर्ण, अङ्गहीन, भग्न तथा शिलामात्रावशिष्ट (विशेष चिह्नसे रहित) प्रतिमाका परित्याग करे। उसके स्थानपर पूर्ववत् देवगृहमें नवीन स्थिर-मूर्तिका न्यास करे। आचार्य वहाँपर (भूतशुद्धि-प्रकरणमें उक्त) संहारविधिसे सम्पूर्ण तत्त्वोंका संहार करे। गुरु नृसिंह-मन्त्रकी सहस्र आहुतियाँ देकर मूर्तिको उखाड़ दे। फिर दारुमयी मूर्तिको अग्निमें जला दे, प्रस्तरनिर्मित विसर्जित प्रतिमाको जलमें फेंक दे, धातुमयी या रत्नमयी मूर्ति हो तो उसे समुद्रकी अगाध जलराशिमें विसर्जित कर दे। जीर्णाङ्ग प्रतिमाको यानपर आरूढ़ कर, वस्त्र आदिसे आच्छादित करके, गाजे-बाजेके साथ ले जाय और जलमें छोड़ दे। फिर आचार्यको दक्षिणा दे। उसी दिन पूर्व प्रतिमाके प्रमाण तथा द्रव्यके अनुसार उसी प्रमाणकी मूर्ति स्थापित करे। इसी प्रकार कूप, वापी और तड़ाग आदिका जीर्णोद्धार करनेसे भी महान् फलकी प्राप्ति होती है॥ १–६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'जीर्णोद्धारविधि-कथन' नामक सड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६७॥
अड़सठवाँ अध्याय
उत्सव-विधिका कथन
श्रीभगवान् कहते हैं— अब मैं उत्सवकी विधिका वर्णन करता हूँ। देवस्थापन होनेके पश्चात् उसी वर्षमें एकरात्र, त्रिरात्र या अष्टरात्र उत्सव मनावे; क्योंकि उत्सवके बिना देवप्रतिष्ठा निष्फल होती है। अयन या विषुव-संक्रान्तिके समय शयनोपवन या देवगृहमें अथवा कर्ताके जिस प्रकार अनुकूल हो, भगवान्की नगरयात्रा करावे। उस समय मङ्गलाङ्कुरोंका रोपण, नृत्य-गीत तथा गाजे-बाजेका प्रबन्ध करे। अङ्कुरोंके रोपणके लिये शराव (परई) या हँडिया श्रेष्ठ मानी गयी हैं। यव, शालि, तिल, मुद्ग, गोधूम, श्वेत सर्षप, कुलत्थ, माष और निष्पावको प्रक्षालित करके वपन करे। प्रदीपोंके साथ रात्रिमें नगरभ्रमण करते हुए इन्द्रादि दिक्पालों, कुमुद आदि दिग्गजों तथा सम्पूर्ण भूत-प्राणियोंके उद्देश्यसे पूर्वादि दिशाओंमें बलि-प्रदान करे। जो मनुष्य देवबिम्बका वहन करते हुए देवयात्राका अनुगमन करते हैं, उनको पद-पदपर अश्वमेध यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है॥ १–६ $\frac{१}{२}$॥
आचार्य पहले दिन देवमन्दिरमें आकर देवताको सूचित करे—'भगवन्! देवश्रेष्ठ! आपको कल तीर्थयात्रा करनी है। सर्वज्ञ! आप उसका आरम्भ करनेकी आज्ञा देनेमें सदा समर्थ हैं।' देवताके सम्मुख इस प्रकार निवेदन करके उत्सव-कार्यका आरम्भ करे। चार स्तम्भोंसे युक्त मङ्गलाङ्कुरोंकी घटिकासे समन्वित तथा विभूषित वेदिकाके समीप जाय। उसके मध्यभागमें स्वस्तिकपर प्रतिमाका न्यास करे। काम्य अर्थको लिखकर चित्रोंमें स्थापित करके अधिवासन करे॥ ७–१०॥
फिर विद्वान् पुरुष वैष्णवोंके साथ मूल-मन्त्रसे देवमूर्तिके अङ्गोंमें घृतका लेपन करे तथा सारी रात घृतधारासे अभिषेक करे। देवताको दर्पण दिखलाकर, आरती, गीत, वाद्य आदिके
* अध्याय ६९ * १३७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
साथ मङ्गल कृत्य करे, व्यजन डुलावे एवं पूजन करे। फिर दीप, गन्ध तथा पुष्पादिसे यजन करे। हरिद्रा, कपूर, केसर और श्वेत चन्दन-चूर्णको देवमूर्ति तथा भक्तोंके सिरपर छोड़नेसे समस्त तीर्थोंके फलकी प्राप्ति होती है। आचार्य यात्राके लिये नियत देवमूर्तिकी रथपर स्थापना और अर्चना करके छत्र-चँवर तथा शङ्खनाद आदिके साथ राष्ट्रका पालन करनेवाली नदीके तटपर ले जाय॥ ११-१४॥
नदीमें नहलानेसे पूर्व वहाँ तटपर वेदीका निर्माण करे। फिर मूर्तिको यानसे उतारकर उसे वेदिकापर विन्यस्त करे। वहाँ चरु निर्मित करके उसकी आहुति देनेके पश्चात् पायसका होम करे। फिर वरुणदेवतासम्बन्धी मन्त्रोंसे तीर्थोंका आवाहन करे। ‘आपो हि ष्ठा०’ आदि मन्त्रोंसे उनको अर्घ्य प्रदान करके पूजन करे। देवमूर्तिको लेकर जलमें अघमर्षण करके ब्राह्मणों और महाजनोंके साथ स्नान करे। स्नानके पश्चात् मूर्तिको ले आकर वेदिकापर रखे। उस दिन देवताका वहाँ पूजन करके देवप्रासादमें ले जाय। आचार्य अग्निमें स्थित देवका पूजन करे। यह उत्सव भोग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है॥ १५-१९॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘उत्सव-विधि-कथन’ नामक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६८॥
उनहत्तरवाँ अध्याय
स्नपनोत्सवके विस्तारका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं—ब्रह्मन्! अब मैं स्नपनोत्सवका विस्तारपूर्वक वर्णन करता हूँ। प्रासादके सम्मुख मण्डपके नीचे मण्डलमें कलशोंका न्यास करे। प्रारम्भकालमें तथा सम्पूर्ण कर्मोंको करते समय भगवान् श्रीहरिका ध्यान, पूजन और हवन करे। पूर्णाहुतिके साथ हजार या सौ आहुतियाँ दे। फिर स्नान-द्रव्योंको लाकर कलशोंका विन्यास करे। कण्ठसूत्रयुक्त कुम्भोंका अधिवासन करके मण्डलमें रखे॥ १-३॥
चौकोर मण्डलका निर्माण करके उसे ग्यारह रेखाओंद्वारा विभाजित कर दे। फिर पार्श्वभागकी एक रेखा मिटा दे। इस तरह उस मण्डलमें चारों दिशाओंमें नौ-नौ कोष्ठकोंकी स्थापना करके उनको पूर्व आदिके क्रमसे शालिचूर्ण आदिसे पूरित करे। फिर विद्वान् मनुष्य कुम्भमुद्राकी रचना करके पूर्वादि दिशाओंमें स्थित नवकमें कलश लाकर रखे। पुण्डरीकाक्ष-मन्त्रसे उनमें दर्भ डाले। सर्वरत्नसमन्वित जलपूर्ण कुम्भको मध्यमें विन्यस्त करे। शेष आठ कुम्भोंमें क्रमशः यव, व्रीहि, तिल, नीवार, श्यामाक, कुलत्थ, मुद्ग और श्वेत सर्षप डालकर आठ दिशाओंमें स्थापित करे। पूर्वदिशावर्ती नवकमें घृतपूर्ण कुम्भ रखे। इसमें पलाश, अश्वत्थ, वट, बिल्व, उदुम्बर, प्लक्ष, जम्बू, शमी तथा कपित्थ वृक्षकी छालका क्वाथ डाले। आग्नेयकोणवर्ती नवकमें मधुपूर्ण घटका न्यास करे। इस कलशमें गोशृङ्ग, पर्वत, गङ्गाजल, गजशाला, तीर्थ, खेत और खलिहान—इन आठ स्थलोंकी मृत्तिका छोड़े॥ ४-१०॥
दक्षिणदिशावर्ती नवकमें तिल-तैलसे परिपूर्ण घट स्थापित करे। उसमें क्रमशः नारंगी, जम्बीरी नींबू, खजूर, मृत्तिका, नारिकेल, सुपारी, अनार और पनस (कटहल)-का फल डाल दे। नैर्ऋत्यकोणगत नवकमें क्षीरपूर्ण कलश रखे। उसमें कुङ्कुम, नागपुष्प, चम्पक, मालती, मल्लिका, पुंनाग, करवीर एवं कमल-कुसुमोंको प्रक्षिप्त करे। पश्चिमीय नवकमें नारिकेल-जलसे पूर्ण
१३८ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
कलशमें नदी, समुद्र, सरोवर, कूप, वर्षा, हिम, निर्झर तथा देवनदीका जल छोड़े। वायव्यकोणवर्ती नवकमें कदलीजलपूरित कुम्भ रखे। उसमें सहदेवी, कुमारी, सिंही, व्याघ्री, अमृता, विष्णुकर्णी, दूर्वा, वच—इन दिव्य ओषधियोंको प्रक्षिप्त करे। पूर्वादि उत्तरवर्ती नवकमें दधिकलशका विन्यास करे। उसमें क्रमशः पत्र, इलायची, तज, कूट, सुगन्धवाला, चन्दनद्वय, लता, कस्तूरी, कृष्णागुरु तथा सिद्ध द्रव्य डाल दे। ईशानस्थ नवकमें शान्तिजलसे पूर्ण कुम्भ रखे। उसमें क्रमशः शुभ्र रजत, लौह, त्रपु, कांस्य, सीसक तथा रत्न डाले। प्रतिमाको घृतका अभ्यङ्ग तथा उद्वर्तन करके मूल-मन्त्रसे स्नान करावे। फिर उसका गन्धादिके द्वारा पूजन करे। अग्निमें होम करके पूर्णाहुति दे। सम्पूर्ण भूतोंको बलि प्रदान करे। ब्राह्मणोंको दक्षिणापूर्वक भोजन करावे। देवता और मुनि तथा बहुत-से भूपाल भी भगवद्विग्रहका अभिषेक करके ईश्वरत्वको प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार एक हजार आठ कलशोंसे स्नपनोत्सवका अनुष्ठान करे। इससे मनुष्य सब कुछ प्राप्त करता है। यज्ञके अवभृथ-स्नानमें भी पूर्णस्नान सम्पन्न हो जाता है। पार्वती तथा लक्ष्मीके विवाह आदिमें भी स्नपनोत्सव किया जाता है॥ ११—२३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'स्नपनोत्सव-विधि-कथन' नामक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६९॥
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सत्तरवाँ अध्याय
वृक्षोंकी प्रतिष्ठाकी विधि
**श्रीभगवान् कहते हैं—**ब्रह्मन्! अब मैं वृक्षप्रतिष्ठाका वर्णन करता हूँ, जो भोग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाली है। वृक्षोंको सर्वोषधिजलसे लिप्त, सुगन्धित चूर्णसे विभूषित तथा मालाओंसे अलंकृत करके वस्त्रोंसे आवेष्टित करे। सभी वृक्षोंका सुवर्णमयी सूचीसे कर्णवेधन तथा सुवर्णमयी शलाकासे अञ्जन करे। वेदिकापर सात फल रखे। प्रत्येक वृक्षका अधिवासन करे तथा कुम्भ समर्पित करे। फिर इन्द्र आदि दिक्पालोंके उद्देश्यसे बलिप्रदान करे। वृक्षके अधिवासनके समय ऋग्वेद, यजुर्वेद या सामवेदके मन्त्रोंसे अथवा वरुणदेवता-सम्बन्धी तथा मत्तभैरव-सम्बन्धी मन्त्रोंसे होम करे। श्रेष्ठ ब्राह्मण वृक्षवेदीपर स्थित कलशोंद्वारा वृक्षों और यजमानको स्नान करावें। यजमान अलंकृत होकर ब्राह्मणोंको गो, भूमि, आभूषण तथा वस्त्रादिकी दक्षिणा दे तथा चार दिनतक क्षीरयुक्त भोजन करावे। इस कर्ममें तिल, घृत तथा पलाश-समिधाओंसे हवन करना चाहिये। आचार्यको दुगुनी दक्षिणा दे। मण्डप आदिका पूर्ववत् निर्माण करे। वृक्ष तथा उद्यानकी प्रतिष्ठासे पापोंका नाश होकर परम सिद्धिकी प्राप्ति होती है। अब सूर्य, शिव, गणपति, शक्ति तथा श्रीहरिके परिवारकी प्रतिष्ठाकी विधि सुनिये, जो भगवान् महेश्वरने कार्तिकेयको बतलायी थी॥ १—९॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पादप-प्रतिष्ठा-विधिवर्णन' नामक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७० ॥
| * अध्याय ७२ * | १३९ |
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इकहत्तरवाँ अध्याय
गणपतिपूजनकी विधि
भगवान् महेश्वरने कहा—कार्तिकय! मैं विघ्नोंके विनाशके लिये गणपतिपूजाकी विधि बतलाता हूँ, जो सम्पूर्ण अभीष्ट अर्थोंको सिद्ध करनेवाली है। 'गणंजयाय स्वाहा०'—हृदय, 'एकदंष्ट्राय हुं फट्'—सिर, 'अचलकर्णिने नमो नमः।'—शिखा, 'गजवक्त्राय नमो नमः।'—कवच, 'महोदराय चण्डाय नमः।'—नेत्र एवं 'सुदण्डहस्ताय हुं फट्।'—अस्त्र है। इन मन्त्रोंद्वारा अङ्गन्यास करे। गण, गुरु, गुरु-पादुका, शक्ति, अनन्त और धर्म—इनका मुख्य कमल-मण्डलके ऊर्ध्व तथा निम्न दलोंमें पूजन करे एवं कमलकर्णिकामें बीजकी अर्चना करे। तीव्रा, ज्वालिनी, नन्दा, भोगदा, कामरूपिणी, उग्रा, तेजोवती, सत्या एवं विघ्ननाशिनी—इन नौ पीठशक्तियोंकी भी पूजा करे। फिर चन्दनके चूर्णका आसन समर्पित करे। 'यं' शोषकवायु, 'रं' अग्नि, 'लं' प्लव (पृथिवी) तथा 'वं' अमृतका बीज माना गया है।
'ॐ लम्बोदराय विद्महे महोदराय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।'—यह गणेश-गायत्री-मन्त्र है। गणपति, गणाधिप, गणेश, गणनायक, गणक्रीड, वक्रतुण्ड, एकदंष्ट्र, महोदर, गजवक्त्र, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशन, धूम्रवर्ण तथा इन्द्र आदि दिक्पाल—इन सबका गणपतिकी पूजामें अङ्गरूपसे पूजन करे॥ १—८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गणपतिपूजा-विधिकथन' नामक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७१ ॥
बहत्तरवाँ अध्याय
स्नान, संध्या और तर्पणकी विधिका वर्णन
भगवान् महेश्वर कहते हैं—स्कन्द! अब मैं नित्य-नैमित्तिक आदि स्नान, संध्या और प्रतिष्ठासहित पूजाका वर्णन करूँगा। किसी तालाब या पोखरेसे अस्त्रमन्त्र (फट्)-के उच्चारणपूर्वक आठ अङ्गुल गहरी मिट्टी खोदकर निकाले। उसे सम्पूर्णरूपसे ले आकर उसी मन्त्रद्वारा उसका पूजन करे। इसके बाद शिरोमन्त्र (स्वाहा)-से उस मृत्तिकाको जलाशयके तटपर रखकर अस्त्रमन्त्रसे उसका शोधन करे। फिर शिखामन्त्र (वषट्)-के उच्चारणपूर्वक उसमेंसे तृण आदिको निकालकर, कवच-मन्त्र (हुम्)-से उस मृत्तिकाके तीन भाग करे। प्रथम भागकी जलमिश्रित मिट्टीको नाभिसे लेकर पैरतकके अङ्गोंमें लगावे। तत्पश्चात् उसे धोकर, अस्त्र-मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित हुई दूसरे भागकी दीप्तिमती मृत्तिकाद्वारा शेष सम्पूर्ण शरीरको अनुलिप्त करके, दोनों हाथोंसे कान-नाक आदि इन्द्रियोंके छिद्रोंको बंद कर, साँस रोक मन-ही-मन कालाग्निके समान तेजोमय अस्त्रका चिन्तन करते हुए पानीमें डुबकी लगाकर स्नान करे। यह मल (शारीरिक मैल)-को दूर करनेवाला स्नान कहलाता है। इसे इस प्रकार करके जलके भीतरसे निकल आवे और संध्या करके विधि-स्नान करे॥ १—५$\frac{१}{२}$॥
हृदय-मन्त्र (नमः)-के उच्चारणपूर्वक अङ्कुशमुद्राद्वारा$^१$ सरस्वती आदि तीर्थोंमेंसे किसी एक तीर्थका भावनाद्वारा आकर्षण करके, फिर संहारमुद्राद्वारा$^२$ उसे अपने समीपवर्ती जलाशयमें स्थापित करे। तदनन्तर शेष (तीसरे भागकी)
१. मध्यमा अँगुलीको सीधी रखकर तर्जनीको बिचले पोरतक उसके साथ सटाकर कुछ सिकोड़ ले—यही अङ्कुश-मुद्रा है।
२. अधोमुख वामहस्तपर ऊर्ध्वमुख दाहिना हाथ रखकर अंगुलियोंको परस्पर ग्रथित करके घुमावे—यह संहार-मुद्रा है। (मन्त्रमहार्णव)
१४० * अग्निपुराण *
संध्यादेवी—सायंकाल [ अग्नि० अ० ७२ ]
संध्यादेवी—मध्याह्न
संध्यादेवी—प्रातःकाल
* अध्याय ७२ * १४१
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मिट्टी लेकर नाभितक जलके भीतर प्रवेश करे और उत्तराभिमुख हो, बायीं हथेलीपर उसके तीन भाग करे। दक्षिणभागकी मिट्टीको अङ्गन्यास-सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा (अर्थात् ॐ हृदयाय नमः, शिरसे स्वाहा, शिखायै वषट्, कवचाय हुम्, नेत्रत्रयाय वौषट् तथा अस्त्राय फट् — इन छः मन्त्रोंद्वारा) एक बार अभिमन्त्रित करे। पूर्वभागकी मिट्टीको ‘अस्त्राय फट्’ — इस मन्त्रका सात बार जप करके अभिमन्त्रित करे तथा उत्तरभागकी मिट्टीका ‘ॐ नमः शिवाय’ — इस मन्त्रका दस बार जप करके अभिमन्त्रण करे। इस तरह पूर्वोक्त मृत्तिकाके तीन भागोंका क्रमशः अभिमन्त्रण करना चाहिये। तत्पश्चात् पहले उन मृत्तिकाओंमेंसे थोड़ा-थोड़ा-सा भाग लेकर सम्पूर्ण दिशाओंमें छोड़े। छोड़ते समय ‘अस्त्राय हुं फट्।’ का जप करता रहे। इसके बाद ‘ॐ नमः शिवाय।’ — इस शिव-मन्त्रका तथा ‘ॐ सोमाय स्वाहा।’ इस सोम-मन्त्रका जप करके जलमें अपनी भुजाओंको घुमाकर उसे शिवतीर्थस्वरूप बना दे तथा पूर्वोक्त अङ्गन्यास-सम्बन्धी मन्त्रोंका जप करते हुए उसे मस्तकसे लेकर पैरतकके सारे अङ्गोंमें लगावे ॥ ६—९ ॥
तदनन्तर अङ्गन्यास-सम्बन्धी चार मन्त्रोंका पाठ करते हुए दाहिनेसे आरम्भ करके बायें-तकके हृदय, सिर, शिखा और दोनों भुजाओंका स्पर्श करे तथा नाक, कान आदि सारे छिद्रोंको बंद करके सम्मुखीकरण-मुद्राद्वारा भगवान् शिव, विष्णु अथवा गङ्गाजीका स्मरण करते हुए जलमें गोता लगावे। ‘ॐ हृदयाय नमः।’ ‘शिरसे स्वाहा।’ ‘शिखायै वषट्।’ ‘कवचाय हुम्।’ ‘नेत्रत्रयाय वौषट्।’ तथा ‘अस्त्राय फट्।’ — इन षडङ्ग-सम्बन्धी मन्त्रोंका उच्चारण करके, जलमें स्थित हो, बायें और दायें हाथ दोनोंको मिलाकर, कुम्भमुद्राद्वारा अभिषेक करे। फिर रक्षाके लिये पूर्वादि दिशाओंमें जल छोड़े। सुगन्ध और आँवला आदि राजोचित उपचारसे स्नान करे। स्नानके पश्चात् जलसे बाहर निकलकर संहारिणी-मुद्राद्वारा उस तीर्थका उपसंहार करे। इसके बाद विधि-विधानसे शुद्ध, संहितामन्त्रसे अभिमन्त्रित तथा निवृत्ति आदिके द्वारा शोधित भस्मसे स्नान करे ॥ १०—१४ $\frac{१}{२}$ ॥
‘ॐ अस्त्राय हुं फट्।’ — इस मन्त्रका उच्चारण करके, सिरसे पैरतक भस्मद्वारा मलस्नान करके फिर विधिपूर्वक शुद्ध स्नान करे। ईशान, तत्पुरुष, अघोर, गुह्यक या वामदेव तथा सद्योजात-सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा क्रमशः मस्तक, मुख, हृदय, गुह्याङ्ग तथा शरीरके अन्य अवयवोंमें उद्वर्तन (अनुलेप) लगाना चाहिये। तीनों संध्याओंके समय, निशीथकालमें, वर्षाके पहले और पीछे, सोकर, खाकर, पानी पीकर तथा अन्य आवश्यक कार्य करके आग्नेय स्नान करना चाहिये। स्त्री, नपुंसक, शूद्र, बिल्ली, शव और चूहेका स्पर्श हो जानेपर भी आग्नेय स्नानका विधान है। चुल्लूभर पवित्र जल पी ले, यही ‘आग्नेय-स्नान’ है। सूर्यकी किरणोंके दिखायी देते समय यदि आकाशसे जलकी वर्षा हो रही हो तो पूर्वाभिमुख हो, दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर, ईशान-मन्त्रका उच्चारण करते हुए, सात पग चलकर उस वर्षाके जलसे स्नान करे। यह ‘माहेन्द्र-स्नान’ कहलाता है। गौओंके समूहके मध्यभागमें स्थित हो उनकी खुरोंसे खुदकर ऊपरको उड़ी हुई धूलसे इष्टदेव-सम्बन्धी मूलमन्त्रका जप करते हुए अथवा कवच-मन्त्र (हुम्)-का जप करते हुए जो स्नान किया जाता है, उसे ‘पावनस्नान’ कहते हैं॥ १५—२० $\frac{१}{२}$ ॥
सद्योजात आदि मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक जो जलसे अभिषेक किया जाता है, उसे ‘मन्त्रस्नान’ कहते हैं। इसी प्रकार वरुणदेवता और अग्निदेवता-