अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 157, कुल 878 में से
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चौंसठवाँ अध्याय
कुआँ, बावड़ी और पोखरे आदिकी प्रतिष्ठाकी विधि
**श्रीभगवान् कहते हैं—**ब्रह्मन्! अब मैं कूप, वापी और तड़ागकी प्रतिष्ठाकी विधिका वर्णन करता हूँ, उसे सुनो। भगवान् श्रीहरि ही जलरूपसे देवश्रेष्ठ सोम और वरुण हुए हैं। सम्पूर्ण विश्व अग्नीषोमय है। जलरूप नारायण उसके कारण हैं। मनुष्य वरुणकी स्वर्ण, रौप्य या रत्नमयी प्रतिमाका निर्माण करावे। वरुणदेव द्विभुज, हंसारूढ और नदी एवं नालोंसे युक्त हैं। उनके दक्षिण-हस्तमें अभयमुद्रा और वाम-हस्तमें नागपाश सुशोभित होता है। यज्ञमण्डपके मध्यभागमें कुण्डसे सुशोभित वेदिका होनी चाहिये तथा उसके तोरण (पूर्व-द्वार)-पर कमण्डलुसहित वरुण-कलशकी स्थापना करनी चाहिये। इसी तरह भद्रक (दक्षिण-द्वार), अर्द्धचन्द्र (पश्चिम-द्वार) तथा स्वस्तिक (उत्तर-द्वार)-पर भी वरुणकलशोंकी स्थापना आवश्यक है। कुण्डमें अग्निका आधान करके पूर्णाहुति प्रदान करे॥ १-५॥
'ये ते शतं वरुण०' आदि मन्त्रसे स्नानपीठपर वरुणकी स्थापना करे। तत्पश्चात् आचार्य मूल-मन्त्रका उच्चारण करके, वरुण देवताकी प्रतिमाको वहीं पधराकर, उसमें घृतका अभ्यङ्ग करे। फिर 'शं नो देवी०' (अथर्व० १।६।१; शु० यजु० ३६।१२) इत्यादि मन्त्रसे उसका प्रक्षालन करके 'शुद्धवालः सर्वशुद्धवालो०' (शु० यजु० २४।३) आदिसे पवित्र जलद्वारा उसे स्नान करावे। तदनन्तर स्नानपीठकी पूर्वादि दिशाओंमें आठ कलशोंका अधिवासन (स्थापन) करे। इनमेंसे पूर्ववर्ती कलशमें समुद्रके जल, आग्नेयकोणवर्ती कुम्भमें गङ्गाजल, दक्षिणके कलशमें वर्षाके जल, नैर्ऋत्यकोणवाले कुम्भमें झरनेके जल, पश्चिमवाले कलशमें नदीके जल, वायव्यकोणमें नदके जल, उत्तर-कुम्भमें औद्भिद्य (सोते)-के जल एवं ईशानवर्ती कलशमें तीर्थके जलको भरे। उपर्युक्त विविध जल न मिलनेपर सब कलशोंमें नदीके ही जलको डाले। उक्त सभी कलशोंको 'यासां राजा०' (अथर्व० १।३३।२) आदि मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे। विद्वान् पुरोहित वरुणदेवका 'सुमित्रिया०' (शु० यजु० ३५।१२) आदि मन्त्रसे मार्जन और निर्मञ्छन करके, 'चित्रं देवानां०' (शु० यजु० १३।४६) तथा 'तच्चक्षुर्देवहितं०' (शु० यजु० ३६।२४)—इन मन्त्रोंसे मधूत्रय (शहद, घी और चीनी) द्वारा वरुणदेवके नेत्रोंका उन्मीलन करे। फिर वरुणकी उस सुवर्णमयी प्रतिमामें ज्योतिका पूजन करे एवं आचार्यको गोदान दे॥ ६-१०$\frac{१}{२}$॥
तदनन्तर 'समुद्रज्येष्ठाः०' (ऋक्० ७।४९।१) आदि मन्त्रके द्वारा वरुणदेवताका पूर्व-कलशके जलसे अभिषेक करे। 'समुद्रं गच्छ०' (यजु० ६।२१) इत्यादि मन्त्रके द्वारा अग्निकोणवर्ती कलशके गङ्गाजलसे, 'सोमो धेनुं०' (शु० यजु० ३४।२१) इत्यादि मन्त्रके द्वारा दक्षिण-कलशके वर्षाजलसे, 'देवीरापो०' (शु० यजु० ६।२७) इत्यादि मन्त्रके द्वारा नैर्ऋत्यकोणवर्ती कलशके निर्झर-जलसे, 'पञ्च नद्यः०' (शु० यजु० ३४।११) आदि मन्त्रके द्वारा पश्चिम-कलशके नदी-जलसे, 'उद्भिद्भ्यः०' इत्यादि मन्त्रके द्वारा उत्तरवर्ती कलशके उद्भिज्ज-जलसे और पावमानी ऋचाके द्वारा ईशानकोणवाले कलशके तीर्थ-जलसे वरुणका अभिषेक करे। फिर यजमान मौन रहकर 'आपो हि ष्ठा०' (शु० यजु० ११।५०) मन्त्रके द्वारा पञ्चगव्यसे, 'हिरण्यवर्णा०' (श्रीसूक्त)-के द्वारा स्वर्ण-जलसे, 'आपो अस्मान्०' (शु० यजु० ४।२)