भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 158
  • अध्याय ६४ * १३१

मन्त्रके द्वारा वर्षाजलसे, व्याहृतियोंका उच्चारण करके कूप-जलसे तथा 'आपो देवीः०' (शु० यजु० १२।३५) मन्त्रके द्वारा तड़ाग-जल एवं तोरणवर्ती वरुण-कलशके जलसे वरुणदेवको स्नान करावे। 'वरुणस्योत्तम्भनमसि०' (शु० यजु० ४।३६) मन्त्रके द्वारा पर्वतीय जल (अर्थात् झरनेके पानी)-से भरे हुए इक्यासी कलशोंद्वारा उसको स्नान करावे। फिर 'त्वं नो अग्ने वरुणस्य०' (शु० यजु० २१।३) इत्यादि मन्त्रसे अर्घ्य प्रदान करे। व्याहृतियोंका उच्चारण करके मधुपर्क, 'बृहस्पते अति यदर्यो०' (शु० यजु० २६।३) मन्त्रसे वस्त्र, 'इमं मे वरुणः०' (शु० यजु० २१।१) इस मन्त्रसे पवित्रक और प्रणवसे उत्तरीय समर्पित करे॥ ११-१६॥

वारुणसूक्तसे वरुणदेवताको पुष्प, चँवर, दर्पण, छत्र और पताका निवेदन करे। मूल-मन्त्रसे 'उत्तिष्ठ' ऐसा कहकर उत्थापन करे। उस रात्रिको अधिवासन करे। 'वरुणं वा०' इस मन्त्रसे संनिधीकरण करके वरुणसूक्तसे उनका पूजन करे। फिर मूल-मन्त्रसे सजीवीकरण करके चन्दन आदिद्वारा पूजन करे। मण्डलमें पूर्ववत् अर्चना कर ले। अग्निकुण्डमें समिधाओंका हवन करे। वैदिक मन्त्रोंसे गङ्गा आदि चारों गौओंका दोहन करे। तदनन्तर सम्पूर्ण दिशाओंमें यवनिर्मित चरुकी स्थापना करके होम करे। चरुको व्याहृति, गायत्री या मूल-मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके, सूर्य, प्रजापति, दिव्, अन्तक-निग्रह, पृथिवी, देहधृति, स्वधृति, रति, रमती, उग्र, भीम, रौद्र, विष्णु, वरुण, धाता, रायस्पोष, महेन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, ईश, अनन्त, ब्रह्मा, राजा जलेश्वर (वरुण)—इन नामोंका चतुर्थ्यन्तरूप बोलकर, अन्तमें स्वाहा लगाकर बलि समर्पित करे। 'इदं विष्णुः०' (शु० यजु०५। १५)और 'तद् विप्रासो०' (शु० यजु० ३४।४४)—इन मन्त्रोंसे आहुति दे। 'सोमो धेनुम्०' (शु० यजु० ३४।२१) मन्त्रसे छः आहुतियाँ देकर 'इमं मे वरुणः०' (शु० यजु० २१।१) मन्त्रसे एक आहुति दे। 'आपो हि ष्ठा०' (शुक्ल यजु० ११।५०-५२) आदि तीन ऋचाओंसे तथा 'इमा रुद्र०' इत्यादि मन्त्रसे भी आहुतियाँ दे॥ १७-२५॥

फिर दसों दिशाओंमें बलि समर्पित करे और गन्ध-पुष्प आदिसे पूजन करे। तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष प्रतिमाको उठाकर मण्डलमें स्थापित करे तथा गन्ध-पुष्प आदि एवं स्वर्ण-पुष्प आदिके द्वारा क्रमशः उसका पूजन करे। तदनन्तर श्रेष्ठ आचार्य आठों दिशाओंमें दो बित्ते प्रमाणके जलाशय और आठ बालुकामयी सुरम्य वेदियोंका निर्माण करे। 'वरुणस्य०' (यजु० ४।३६) इस मन्त्रसे घृत एवं यवनिर्मित चरुकी पृथक्-पृथक् एक सौ आठ आहुतियाँ देकर शान्ति-जल ले आवे और उस जलसे वरुणदेवके सिरपर अभिषेक करके सजीवीकरण करे। वरुणदेव अपनी धर्मपत्नी गौरीदेवीके साथ विराजमान नदी-नदोंसे घिरे हुए हैं—इस प्रकार उनका ध्यान करे। 'ॐ वरुणाय नमः।' मन्त्रसे पूजन करके सांनिध्यकरण करे। तत्पश्चात् वरुणदेवको उठाकर गजराजके पृष्ठदेश आदि सवारियोंपर मङ्गल-द्रव्योंसहित स्थापित करके नगरमें भ्रमण करावे। इसके बाद उस वरुणमूर्तिको 'आपो हि ष्ठा०' आदि मन्त्रका उच्चारण करके त्रिमधुयुक्त कलश-जलमें रखे और कलशसहित वरुणको जलाशयके मध्यभागमें सुरक्षितरूपसे स्थापित कर दे॥ २६-३१॥

इसके बाद यजमान स्नान करके वरुणका ध्यान करे। फिर ब्रह्माण्ड-संज्ञिका सृष्टिको अग्निबीज (रं)-से दग्ध करके उसकी भस्मराशिको जलसे प्लावित करनेकी भावना करे। 'समस्त लोक जलमय हो गया है'—ऐसी भावना करके