अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ७२ *
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इसके बाद अघमर्षण करे। दाहिने हाथके दोनेमें रखे हुए बोधरूप शिवमय जलको नासिकाके समीप ले जाकर बायीं—इडा नाड़ीद्वारा साँसको खींचकर रोके और भीतरसे काले रंगके पाप-पुरुषको दाहिनी—पिङ्गला नाडीद्वारा बाहर निकालकर उस जलमें स्थापित करे। फिर उस पापयुक्त जलको हथेलीद्वारा वज्रमयी शिलाकी भावना करके उसपर दे मारे। इससे अघमर्षणकर्म सम्पन्न होता है। तदनन्तर कुश, पुष्प, अक्षत और जलसे युक्त अर्घ्याञ्जलि लेकर, उसे ‘ॐ नमः शिवाय स्वाहा।’—इस मन्त्रसे भगवान् शिवको समर्पित करे और यथाशक्ति गायत्रीमन्त्रका जप करे॥ ३६—३८॥
अब मैं तर्पणकी विधिका वर्णन करूँगा। देवताओंके लिये देवतीर्थसे उनके नाममन्त्रके उच्चारणपूर्वक तर्पण करे। ‘ॐ हूं शिवाय स्वाहा।’ ऐसा कहकर शिवका तर्पण करे। इसी प्रकार अन्य देवताओंको भी उनके स्वाहायुक्त नाम लेकर जलसे तृप्त करना चाहिये। ‘ॐ हां हृदयाय नमः। ॐ हीं शिरसे स्वाहा। ॐ हूं शिखायै वषट्। ॐ हैं कवचाय हुम्। ॐ हौं नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ हः अस्त्राय फट्।’—इन वाक्योंको क्रमशः पढ़कर हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र एवं अस्त्र-विषयक न्यास करना चाहिये। आठ देवगणोंको उनके नामके अन्तमें ‘नमः’ पद जोड़कर तर्पणार्थ जल अर्पित करना चाहिये। यथा—‘ॐ हां आदित्येभ्यो नमः। ॐ हां वसुभ्यो नमः। ॐ हां रुद्रेभ्यो नमः। ॐ हां विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः। ॐ हां मरुद्भ्यो नमः। ॐ हां भृगुभ्यो नमः। ॐ हां अङ्गिरोभ्यो नमः।’ तत्पश्चात् जनेऊको कण्ठमें मालाकी भाँति धारण करके ऋषियोंका तर्पण करे॥ ३९—४१॥
‘ॐ हां अत्रये नमः। ॐ हां वसिष्ठाय नमः। ॐ हां पुलस्तये नमः। ॐ हां क्रतवे नमः। ॐ हां भरद्वाजाय नमः। ॐ हां विश्वामित्राय नमः। ॐ हां प्रचेतसे नमः। ॐ हां मरीचये नमः।’—इन मन्त्रोंको पढ़ते हुए अत्रि आदि ऋषियोंको (ऋषितीर्थसे) एक-एक अञ्जलि जल दे। तत्पश्चात् सनकादि मुनियोंको (दो-दो अञ्जलि) जल देते हुए निम्नाङ्कित मन्त्रवाक्य पढ़े—‘ॐ हां सनकाय वषट्। ॐ हां सनन्दनाय वषट्। ॐ हां सनातनाय वषट्। ॐ हां सनत्कुमाराय वषट्। ॐ हां कपिलाय वषट्। ॐ हां पञ्चशिखाय वषट्। ॐ हां ऋभवे वषट्।’—इन मन्त्रोंद्वारा जुड़े हाथोंकी कनिष्ठिकाओंके मूलभागसे जलाञ्जलि देनी चाहिये॥ ४२—४४॥
‘ॐ हां सर्वेभ्यो भूतेभ्यो वषट्’—इस मन्त्रसे वषट्स्वरूप भूतगणोंका तर्पण करे। तत्पश्चात् यज्ञोपवीतको दाहिने कंधेपर करके दुहरे मुड़े हुए कुशके मूल और अग्रभागसे तिलसहित जलकी तीन-तीन अञ्जलियाँ दिव्य पितरोंके लिये अर्पित करे। ‘ॐ हां कव्यवाहनाय स्वधा। ॐ हां अनलाय स्वधा। ॐ हां सोमाय स्वधा। ॐ हां यमाय स्वधा। ॐ हां अर्यम्णे स्वधा। ॐ हां अग्निष्वात्तेभ्यः स्वधा। ॐ हां बर्हिषदभ्यः स्वधा। ॐ हां आज्यपेभ्यः स्वधा। ॐ हां सोमपेभ्यः स्वधा।’—इत्यादि मन्त्रोंका उच्चारण कर विशिष्ट देवताओंकी भाँति दिव्य पितरोंको जलाञ्जलिसे तृप्त करना चाहिये॥ ४५—४६½॥
‘ॐ हां ईशानाय पित्रे स्वधा।’ कहकर पिताको, ‘ॐ हां पितामहाय स्वधा।’ कहकर पितामहको तथा ‘ॐ हां शान्तप्रपितामहाय स्वधा।’ कहकर प्रपितामहको भी तृप्त करे। इसी प्रकार समस्त प्रेत-पितरोंका तर्पण करे। यथा—‘ॐ हां पितृभ्यः स्वधा। ॐ हां पितामहेभ्यः स्वधा। ॐ हां प्रपितामहेभ्यः स्वधा। ॐ हां वृद्धप्रपितामहेभ्यः स्वधा। ॐ हां मातृभ्यः स्वधा। ॐ हां मातामहेभ्यः स्वधा। ॐ हां प्रमातामहेभ्यः