भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 171

१४४ * अग्निपुराण *


स्वधा। ॐ हां वृद्धप्रमातामहेभ्यः स्वधा। ॐ हां सर्वेभ्यः पितृभ्यः स्वधा। ॐ हां सर्वेभ्यः ज्ञातिभ्यः स्वधा। ॐ हां सर्वाचार्येभ्यः स्वधा। ॐ हां दिग्भ्यः स्वधा। ॐ हां दिक्पतिभ्यः स्वधा। ॐ हां सिद्धेभ्यः स्वधा। ॐ हां मातृभ्यः स्वधा। ॐ हां ग्रहेभ्यः स्वधा। ॐ हां रक्षोभ्यः स्वधा।'— इन वाक्योंको पढ़ते हुए क्रमशः पितरों, पितामहों, वृद्धप्रपितामहों, माताओं, मातामहों, प्रमातामहों, वृद्धप्रमातामहों, सभी पितरों, सभी ज्ञातिजनों, सभी आचार्यों, सभी दिशाओं, दिक्पतियों, सिद्धों, मातृकाओं, ग्रहों और राक्षसोंको जलाञ्जलि दे॥४७—५१॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'स्नान आदिकी विधिका वर्णन' नामक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥७२॥


तिहत्तरवाँ अध्याय

सूर्यदेवकी पूजा-विधिका वर्णन

महादेवजी कहते हैं—स्कन्द! अब मैं करन्यास और अङ्गन्यासपूर्वक सूर्यदेवताके पूजनकी विधि बताऊँगा। 'मैं तेजोमय सूर्य हूँ'—ऐसा चिन्तन करके अर्घ्य-पूजन करे। लाल रंगके चन्दन या रोलीसे मिश्रित जलको ललाटके निकटतक ले जाकर उसके द्वारा अर्घ्यपात्रको पूर्ण करे। उसका गन्धादिसे पूजन करके सूर्यके अङ्गोंद्वारा रक्षावगुण्ठन करे। तत्पश्चात् जलसे पूजा-सामग्रीका प्रोक्षण करके पूर्वाभिमुख हो सूर्यदेवकी पूजा करे। 'ॐ आं हृदयाय नमः।' इस प्रकार आदिमें स्वर-बीज लगाकर सिर आदि अन्य सब अङ्गोंमें भी न्यास करे। पूजा-गृहके द्वारदेशमें दक्षिणकी ओर 'दण्डी' का और वामभागमें 'पिङ्गल' का पूजन करे। ईशानकोणमें 'गं गणपतये नमः।' इस मन्त्रसे 'गणेश' की और अग्निकोणमें गुरुकी पूजा करे। पीठके मध्यभागमें कमलाकार आसनका चिन्तन एवं पूजन करे। पीठके अग्नि आदि चारों कोणोंमें क्रमशः विमल, सार, आराध्य तथा परम सुखकी और मध्यभागमें प्रभूतासनकी पूजा करे। उपर्युक्त प्रभूत आदि चारोंके वर्ण क्रमशः श्वेत, लाल, पीले और नीले हैं तथा उनकी आकृति सिंहके समान है। इन सबकी पूजा करनी चाहिये॥१—५॥

पीठस्थ कमलके भीतर 'रां दीप्तायै नमः।' इस मन्त्रद्वारा दीप्ताकी, 'रीं सूक्ष्मायै नमः।' इस मन्त्रसे सूक्ष्माकी, 'रूं जयायै नमः।' इससे जयाकी, 'रैं भद्रायै नमः।' इससे भद्राकी, 'रैं विभूतये नमः।' इससे विभूतिकी, 'रों विमलायै नमः।' इससे विमलाकी, 'रौं अमोघायै नमः।' इससे अमोघाकी तथा 'रं विद्युतायै नमः।' इससे विद्युताकी पूर्व आदि आठों दिशाओंमें पूजा करे और मध्य-भागमें 'रः सर्वतोमुख्यै नमः।' इस मन्त्रसे नवीं पीठशक्ति सर्वतोमुखीकी आराधना करे। तत्पश्चात् 'ॐ ब्रह्मविष्णुशिवात्मकाय सौराय योगपीठात्मने नमः।' इस मन्त्रके द्वारा सूर्यदेवके आसन (पीठ)-का पूजन करे। तदनन्तर 'खखोल्काय नमः।' इस षडक्षर मन्त्रके आरम्भमें 'ॐ हं खं' जोड़कर नौ अक्षरोंसे युक्त ('ॐ हं खं खखोल्काय नमः।'—इस) मन्त्रद्वारा सूर्यदेवके विग्रहका आवाहन करे। इस प्रकार आवाहन करके भगवान् सूर्यकी पूजा करनी चाहिये॥६—७$\frac{१}{२}$॥

अञ्जलिमें लिये हुए जलको ललाटके निकटतक ले जाकर रक्त वर्णवाले सूर्यदेवका ध्यान करके उन्हें भावनाद्वारा अपने सामने स्थापित करे। फिर 'हां ह्रीं सः सूर्याय नमः।' ऐसा कहकर उक्त जलसे सूर्यदेवको अर्घ्य दे। इसके बाद