भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 172
  • अध्याय ७३ * १४५

‘बिम्बमुद्रा’$^१$ दिखाते हुए आवाहन आदि उपचार अर्पित करे। तदनन्तर सूर्यदेवकी प्रीतिके लिये गन्ध (चन्दन-रोली) आदि समर्पित करे। तत्पश्चात् ‘पद्ममुद्रा’$^२$ और ‘बिम्बमुद्रा’ दिखाकर अग्नि आदि कोणोंमें हृदय आदि अङ्गोंकी पूजा करे। अग्निकोणमें ‘ॐ आं हृदयाय नमः।’ इस मन्त्रसे हृदयकी, नैर्ऋत्यकोणमें ‘ॐ भूः अर्काय शिरसे स्वाहा।’ इससे सिरकी, वायव्यकोणमें ‘ॐ भुवः सुरेशाय शिखायै वषट्।’ इससे शिखाकी, ईशानकोणमें ‘ॐ स्वः कवचाय हुम्।’ इससे कवचकी, इष्टदेव और उपासकके बीचमें ‘ॐ हां नेत्रत्रयाय वौषट्।’ से नेत्रकी तथा देवताके पश्चिमभागमें ‘वः अस्त्राय फट्।’ इस मन्त्रसे अस्त्रकी पूजा करे।$^३$ इसके बाद पूर्वादि दिशाओंमें मुद्राओंका प्रदर्शन करे॥ ८—११$\frac{१}{२}$॥

हृदय, सिर, शिखा और कवच—इनके लिये पूर्वादि दिशाओंमें धेनुमुद्राका प्रदर्शन करे। नेत्रोंके लिये गोशृङ्गकी मुद्रा दिखाये। अस्त्रके लिये त्रासनीमुद्राकी योजना करे। तत्पश्चात् ग्रहोंको नमस्कार और उनका पूजन करे। ‘ॐ सों सोमाय नमः।’ इस मन्त्रसे पूर्वमें चन्द्रमाकी, ‘ॐ बुं बुधाय नमः।’ इस मन्त्रसे दक्षिणमें बुधकी, ‘ॐ बृं बृहस्पतये नमः’ इस मन्त्रसे पश्चिममें बृहस्पतिकी और ‘ॐ भं भार्गवाय नमः।’ इस मन्त्रसे उत्तरमें शुक्रकी पूजा करे। इस तरह पूर्वादि दिशाओंमें चन्द्रमा आदि ग्रहोंकी पूजा करके, अग्नि आदि कोणोंमें शेष ग्रहोंका पूजन करे। यथा—‘ॐ भौं भौमाय नमः।’ इस मन्त्रसे अग्निकोणमें मङ्गलकी, ‘ॐ शं शनैश्चराय नमः।’ इस मन्त्रसे नैर्ऋत्यकोणमें शनैश्चरकी, ‘ॐ रां राहवे नमः’ इस मन्त्रसे वायव्यकोणमें राहुकी तथा ‘ॐ कें केतवे नमः।’ इस मन्त्रसे ईशानकोणमें केतुकी गन्ध आदि उपचारोंसे पूजा करे। खखोल्की (भगवान् सूर्य)-के साथ इन सब ग्रहोंका पूजन करना चाहिये॥ १२—१४॥

मूलमन्त्रका$^४$ जप करके, अर्घ्यपात्रमें जल लेकर सूर्यको समर्पित करनेके पश्चात् उनकी स्तुति करे। इस तरह स्तुतिके पश्चात् सामने मुँह किये खड़े हुए सूर्यदेवको नमस्कार करके कहे—‘प्रभो! मेरे अपराधों और त्रुटियोंको आप क्षमा करें।’ इसके बाद ‘अस्त्राय फट्।’ इस मन्त्रसे अणुसंहारका समाहरण करके ‘शिव! सूर्य! (कल्याणमय सूर्यदेव!)’—ऐसा कहते हुए संहारिणी-शक्ति या मुद्राके द्वारा सूर्यदेवके उपसंहृत तेजको अपने हृदय-कमलमें स्थापित कर दे तथा सूर्यदेवका निर्माल्य उनके पार्षद चण्डको अर्पित कर दे। इस प्रकार जगदीश्वर सूर्यका पूजन करके उनके जप, ध्यान और होम करनेसे साधकका सारा मनोरथ सिद्ध होता है॥ १५—१७॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘सूर्यपूजाकी विधिका वर्णन’ नामक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७३॥


१. पद्माकारौ करौ कृत्वा प्रतिश्लिष्टे तु मध्यमे। अङ्गुल्यौ धारयेत्तस्मिन् बिम्बमुद्रेति सोच्यते॥
२. हस्तौ तु सम्मुखौ कृत्वा संनतोन्नताङ्गुली। तलान्तर्मिलिताङ्गुष्ठौ मुद्रैषा पद्मसंज्ञिता॥
३. मन्त्रमहार्णवमें हृदयादि अङ्गोंके पूजनका क्रम इस प्रकार दिया गया है—
अग्निकोणे—ॐ सत्यतेजोज्वालामणे हुं फट् स्वाहा हृदयाय नमः हृदयश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। निर्ऋतिकोणे—ॐ ब्रह्मतेजो ज्वालामणे हुं फट् स्वाहा शिरसे स्वाहा शिरःश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। वायव्ये—ॐ विष्णुतेजोज्वालामणे हुं फट् स्वाहा शिखायै वषट् शिखाश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ऐशान्ये—ॐ रुद्रतेजोज्वालामणे हुं फट् स्वाहा कवचाय हुं कवचश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। पूज्य-पूजकयोर्मध्ये—ॐ अग्नितेजोज्वालामणे हुं फट् स्वाहा नेत्रत्रयाय वौषट् नेत्रश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। देवता पश्चिमे—ॐ सर्वतेजोज्वालामणे हुं फट् स्वाहा अस्त्राय फट् अस्त्रश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। यहाँ मूलकी व्याख्यामें भी इसी क्रमसे संगति लगाते हुए अर्थ किया गया है।
४. ‘शारदातिलक’ के अनुसार सूर्यका दशाक्षर मूलमन्त्र इस प्रकार है—‘ॐ ह्रीं घृणिः सूर्य्य आदित्य श्रीं।’ इति दशाक्षरो मन्त्रः। किन्तु इस ग्रन्थमें ‘ॐ हं खं’ इन बीजोंके साथ ‘खखोल्काय नमः।’ इस षडक्षर मन्त्रका उल्लेख है। अतः इसीको यहाँ मूल मन्त्र समझना चाहिये।