भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 878 में से

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पृष्ठ 176

* अध्याय ७४ * १४९

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नाद-पर्यन्त उच्चारण करके मन्त्रका शोधन करे। फिर उत्तम संस्कारयुक्त देव-पूजा आरम्भ करे। मूलगायत्री (अथवा रुद्र-गायत्री)-से अर्घ्य-पूजन करके रखे और वह सामान्य अर्घ्य देवताको अर्पित करे॥ ३८-४०॥

ब्रह्मपञ्चक (पञ्चगव्य और कुशोदकसे बना हुआ ब्रह्मकूर्च$^१$) तैयार करके पूजित शिवलिङ्गसे पुष्प-निर्माल्य ले ईशानकोणकी ओर 'चण्डाय नमः।' कहकर चण्डको समर्पित करे। तत्पश्चात् उक्त ब्रह्मपञ्चकसे पिण्डिका (पिण्डी या अर्घा) और शिवलिङ्गको नहलाकर 'फट्'-का उच्चारण करके उन्हें जलसे नहलाये। फिर 'नमो नमः' के उच्चारणपूर्वक पूर्वोक्त अर्घ्यपात्रके जलसे उस लिङ्गका अभिषेक करे। यह लिङ्ग-शोधनका प्रकार बताया गया है॥ ४१-४२॥

आत्मा (शरीर और मन), द्रव्य (पूजनसामग्री), मन्त्र तथा लिङ्गकी शुद्धि हो जानेपर सब देवताओंका पूजन करे। वायव्यकोणमें 'ॐ हां गणपतये नमः।'$^२$ कहकर गणेशजीकी पूजा करे और ईशानकोणमें 'ॐ हां गुरुभ्यो नमः।' कहकर गुरु, परम गुरु, परात्पर गुरु तथा परमेष्ठी गुरु-गुरुपंक्तिकी पूजा करे॥ ४३॥

तत्पश्चात् कूर्मरूपी शिलापर स्थित अङ्कुर-सदृश आधारशक्तिका तथा ब्रह्मशिलापर आरूढ़ शिवके आसनभूत अनन्तदेवका 'ॐ हां अनन्तासनाय नमः।' मन्त्रद्वारा पूजन करे। शिवके सिंहासनके रूपमें जो मञ्च या चौकी है, उसके चार पाये हैं, जो विचित्र सिंहकी-सी आकृतिसे सुशोभित होते हैं। वे सिंह मण्डलाकारमें स्थित रहकर अपने आगेवालेके पृष्ठभागको ही देखते हैं तथा सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग-इन चार युगोंके प्रतीक हैं। तत्पश्चात् भगवान् शिवकी आसन-पादुकांकी पूजा करे। तदनन्तर धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यकी पूजा करे। वे अग्नि आदि चारों कोणोंमें स्थित हैं। उनके वर्ण क्रमशः कपूर, कुङ्कुम, सुवर्ण और काजलके समान हैं। इनका चारों पायोंपर क्रमशः पूजन करे। इसके बाद (ॐ हां अधश्छदनाय नमोऽधः', ॐ हां ऊर्ध्वच्छदनाय नम ऊर्ध्वे। ॐ हां पद्मासनाय नमः।-ऐसा कहकर) आसनपर विराजमान अष्टदल कमलके नीचे-ऊपरके दलोंकी, सम्पूर्ण कमलकी तथा 'ॐ हां कर्णिकायै नमः।' के द्वारा कर्णिकाके मध्यभागकी पूजा करे। उस कमलके पूर्व आदि आठ दलोंमें तथा मध्यभागमें नौ पीठ-शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। वे शक्तियाँ चँवर लेकर खड़ी हैं। उनके हाथ वरद एवं अभयकी मुद्राओंसे सुशोभित हैं॥ ४४-४७॥

उनके नाम इस प्रकार हैं-वामा, ज्येष्ठा,


१. ब्रह्मकूर्चकी विधि इस प्रकार है-पलाश या कमलके पत्तेमें अथवा ताँबे या सुवर्णके पात्रमें पञ्चगव्य संग्रह करना चाहिये। गायत्री-मन्त्रसे गोमूत्रका, 'गन्धद्वारां०' (श्रीसूक्त) इस मन्त्रसे गोबरका, 'आप्यायस्व०' (शु० यजु० १२।११२) इस मन्त्रसे दूधका, 'दधिक्राव्णो०' (शु० यजु० २३।३२) इस मन्त्रसे दहीका, 'तेजोऽसि शुक्रं०' (शु० यजु० २२।१९) इस मन्त्रसे घीका और 'देवस्य त्वा०' (शु० यजु० ६।३०) इस मन्त्रसे कुशोदकका संग्रह करे। चतुर्दशीको उपवास करके अमावस्याको उपर्युक्त वस्तुओंका संग्रह करे। गोमूत्र एक पल होना चाहिये, गोबर आधे अँगूठेके बराबर हो, दूधका मान सात पल और दहीका तीन पल है। घी और कुशोदक एक-एक पल बताये गये हैं। इस प्रकार इन सबको एकत्र करके परस्पर मिला दे। तत्पश्चात् सात-सात पत्तोंके तीन कुश लेकर जिनके अग्रभाग कटे न हों, उनसे उस पञ्चगव्यकी अग्निमें आहुति दे। आहुतिसे बचे हुए पञ्चगव्यको प्रणवसे आलोडन और प्रणवसे ही मन्थन करके, प्रणवसे ही हाथमें ले तथा फिर प्रणवका ही उच्चारण करके उसे पी जाय। इस प्रकार तैयार किये हुए पञ्चगव्यको 'ब्रह्मकूर्च' कहते हैं। स्त्री-शूद्रोंको ब्राह्मणके द्वारा पञ्चगव्य बनवाकर प्रणव-उच्चारणके बिना ही पीना चाहिये। सर्वसाधारणके लिये ब्रह्मकूर्च-पानका मन्त्र यह है-
यत्त्वगस्थिगतं पापं देहे तिष्ठति देहिनाम्। ब्रह्मकूर्चो दहेत्सर्वं प्रदीप्ताग्निरिवेन्धनम्॥ (वृद्धशातातप० १२)
अर्थात् 'देहधारियोंके शरीरमें चमड़े और हड्डीतकमें जो पाप विद्यमान है, वह सब ब्रह्मकूर्च इस प्रकार जला दे, जैसे प्रज्वलित आग इन्धनको जला डालती है।'
२. प्रचलित 'गं' आदि स्वबीजके स्थानपर 'हां' बीज सोमशम्भुकी 'कर्मकाण्डक्रमावली' में भी मिलता है।