अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 177, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें१५० * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
रौद्री, काली, कलविकारिणी$^१$, बलविकारिणी$^२$, बलप्रमथिनी, सर्वभूतदमनी तथा मनोन्मनी—इन सबका क्रमशः पूजन करना चाहिये। वामा आदि आठ शक्तियोंका कमलके पूर्व आदि आठ दलोंमें तथा नवीं मनोन्मनीका कमलके केसर-भागमें क्रमशः पूजन किया जाता है। यथा—'ॐ हां वामायै नमः।' इत्यादि। तदनन्तर पृथ्वी आदि अष्ट मूर्तियों एवं विशुद्ध विद्यादेहका चिन्तन एवं पूजन करे। (यथा—पूर्वमें 'ॐ सूर्यमूर्तये नमः।' अग्निकोणमें 'ॐ चन्द्रमूर्तये नमः।' दक्षिणमें 'ॐ पृथ्वीमूर्तये नमः।' नैर्ऋत्यकोणमें 'ॐ जलमूर्तये नमः।' पश्चिममें 'ॐ वह्निमूर्तये नमः।' वायव्यकोणमें 'ॐ वायुमूर्तये नमः।' उत्तरमें 'ॐ आकाशमूर्तये नमः।' और ईशानकोणमें 'ॐ यजमानमूर्तये नमः।') तत्पश्चात् शुद्ध विद्याकी और तत्त्वव्यापक आसनकी पूजा करनी चाहिये। उस सिंहासनपर कर्पूर-गौर, सर्वव्यापी एवं पाँच मुखोंसे सुशोभित भगवान् महादेवको प्रतिष्ठित करे। उनके दस भुजाएँ हैं। वे अपने मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण करते हैं। उनके दाहिने हाथोंमें शक्ति, ऋष्टि, शूल, खट्वाङ्ग और वरद-मुद्रा हैं तथा अपने बायें हाथोंमें वे डमरू, बिजौरा नीबू, सर्प, अक्षसूत्र और नील कमल धारण करते हैं$^३$॥ ४८–५१॥
आसनके मध्यमें विराजमान भगवान् शिवकी वह दिव्य मूर्ति बत्तीस लक्षणोंसे सम्पन्न है, ऐसा चिन्तन करके स्वयं-प्रकाश शिवका स्मरण करते हुए 'ॐ हां हां हां शिवमूर्तये नमः।' कहकर उसे नमस्कार करे। ब्रह्मा आदि कारणोंके त्यागपूर्वक मन्त्रको शिवमें प्रतिष्ठित करे। फिर यह चिन्तन करे कि ललाटके मध्यभागमें विराजमान तथा तारापति चन्द्रमाके समान प्रकाशमान बिन्दुरूप परमशिव हृदयादि छः अङ्गोंसे संयुक्त हो पुष्पाञ्जलिमें उतर आये हैं। ऐसा ध्यान करके उन्हें प्रत्यक्ष पूजनीय मूर्तिमें स्थापित कर दे। इसके बाद 'ॐ हां ह्रौं शिवाय नमः।'—यह मन्त्र बोलकर मन-ही-मन आवाहनी$^४$-मुद्राद्वारा मूर्तिमें भगवान् शिवका आवाहन करे। फिर स्थापनी-मुद्राद्वारा$^५$ वहाँ उनकी स्थापना और संनिधापिनी-मुद्राद्वारा$^६$ भगवान् शिवको समीपमें विराजमान करके संनिरोधनी-मुद्राद्वारा$^७$ उन्हें उस मूर्तिमें अवरुद्ध करे। तत्पश्चात् 'निष्ठुरायै कालकल्यायै (कालकान्त्यै अथवा कालकान्तायै) फट्।' का उच्चारण करके खड्ग-मुद्रासे भय दिखाते हुए विघ्नोंको मार भगावे। इसके बाद लिङ्ग-मुद्राका$^८$ प्रदर्शन करके नमस्कार करे॥ ५२–५६॥
इसके बाद 'नमः' बोलकर अवगुण्ठन करे। आवाहनका अर्थ है सादर सम्मुखीकरण—इष्टदेवको अपने सामने उपस्थित करना। देवताको अर्चा-विग्रहमें बिठाना ही उसकी स्थापना है।
१. अन्य तन्त्र-ग्रन्थोंमें 'कलविकरिणी' नाम मिलता है। २. अन्यत्र 'बलविकरिणी' नाम मिलता है। ३. न्यसेत् सिंहासने देवं शुक्लं पञ्चमुखं विभुम्। दशबाहुं च खण्डेन्दुं दधानं दक्षिणैः करैः॥ शक्त्यृष्टिशूलखट्वाङ्गवरदं वामकैः करैः। डमरुं बीजपूरं च नागाक्षं सूत्रकोत्पलम्॥ (अग्नि० ७४। ५०-५१) ४. दोनों हाथोंकी अञ्जलि बनाकर अनामिका अँगुलियोंके मूलपर्वपर अँगूठेको लगा देना—यह आवाहनकी मुद्रा है। ५. यह आवाहनी मुद्रा ही अधोमुखी (नीचेकी ओर मुखवाली) कर दी जाय तो 'स्थापिनी (बिठानेवाली) मुद्रा' कहलाती है। ६. अँगूठोंको ऊपर उठाकर दोनों हाथोंकी संयुक्त मुट्ठी बाँध लेनेपर 'संनिधापिनी (निकट सम्पर्कमें लानेवाली) मुद्रा' बन जाती है। ७. यदि मुट्ठीके भीतर अँगूठेको डाल दिया जाय तो 'संनिरोधिनी (रोक रखनेवाली) मुद्रा' कहलाती है। ८. दोनों हाथोंकी अञ्जलि बाँधकर अनामिका और कनिष्ठिका अँगुलियोंको परस्पर सटाकर लिङ्गाकार खड़ी कर ले। दोनों मध्यमाओंका अग्रभाग बिना खड़ी किये परस्पर मिला दे। दोनों तर्जनियोंको मध्यमाओंके साथ सटाये रखे और अँगूठोंको तर्जनियोंके मूलभागमें लगा ले। यह अर्घासहित शिवलिङ्गकी मुद्रा है।