अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 178, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ७४ * १५१
‘प्रभो! मैं आपका हूँ’—ऐसा कहकर भगवान्से निकटतम सम्बन्ध स्थापित करना ही ‘संनिधान’ या ‘संनिधापन’ कहलाता है। जबतक पूजन-सम्बन्धी कर्मकाण्ड चालू रहे, तबतक भगवान्की समीपताको अक्षुण्ण रखना ही ‘निरोध’ है और अभक्तोंके समक्ष जो शिवतत्त्वका अप्रकाशन या संगोपन किया जाता है, उसीका नाम ‘अवगुण्ठन’ है। तदनन्तर सकलीकरण करके ‘हृदयाय नमः’, ‘शिरसे स्वाहा’, ‘शिखायै वषट्’, ‘कवचाय हुम्’, ‘नेत्राभ्यां वौषट्’, ‘अस्त्राय फट्’—इन छः मन्त्रोंद्वारा हृदयादि अङ्गोंकी अङ्गीके साथ एकता स्थापित करे—यही ‘अमृतीकरण’ है। चैतन्यशक्ति भगवान् शंकरका हृदय है, आठ प्रकारका ऐश्वर्य उनका सिर है, वशित्व उनकी शिखा है तथा अभेद्य तेज भगवान् महेश्वरका कवच है। उनका दुःसह प्रताप ही समस्त विघ्नोंका निवारण करनेवाला अस्त्र है। हृदय आदिको पूर्वमें रखकर क्रमशः ‘नमः’, ‘स्वधा’, ‘स्वाहा’ और ‘वौषट्’ का क्रमशः उच्चारण करके पाद्य आदि निवेदन करे॥ ५७-६१ $\frac{१}{२}$ ॥
पाद्यको आराध्यदेवके युगल चरणारविन्दोंमें, आचमनको मुखारविन्दमें तथा अर्घ्य, दूर्वा, पुष्प और अक्षतको इष्टदेवके मस्तकपर चढ़ाना चाहिये। इस प्रकार दस संस्कारोंसे परमेश्वर शिवका संस्कार करके गन्ध-पुष्प आदि पञ्च-उपचारोंसे विधिपूर्वक उनकी पूजा करे। पहले जलसे देवविग्रहका अभ्युक्षण (अभिषेक) करके राई-लोन आदिसे उबटन और मार्जन करना चाहिये। तत्पश्चात् अर्घ्यजलकी बूँदों और पुष्प आदिसे अभिषेक करके गडुओॅंमें रखे हुए जलके द्वारा धीरे-धीरे भगवान्को नहलावे। दूध, दही, घी, मधु और शक्कर आदिको क्रमशः ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव और सद्योजात—इन पाँच* मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित करके उनके द्वारा बारी-बारीसे स्नान करावे। उनको परस्पर मिलाकर पञ्चामृत बना ले और उससे भगवान्को नहलावे। इससे भोग और मोक्षकी प्राप्ति होती है। पूर्वोक्त दूध-दही आदिमें जल और धूप मिलाकर उन सबके द्वारा इष्ट देवता-सम्बन्धी मूल-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक भगवान् शिवको स्नान करावे॥ ६२-६६॥
तदनन्तर जौके आटेसे चिकनाई मिटाकर इच्छानुसार शीतल जलसे स्नान करावे। अपनी शक्तिके अनुसार चन्दन, केसर आदिसे युक्त जलद्वारा स्नान कराकर शुद्ध वस्त्रसे इष्टदेवके श्रीविग्रहको अच्छी तरह पोंछे। उसके बाद अर्घ्य निवेदन करे। देवताके ऊपर हाथ न घुमावे। शिवलिङ्गके मस्तकभागको कभी पुष्पसे शून्य न रखे। तत्पश्चात् अन्यान्य उपचार समर्पित करे। (स्नानके पश्चात् देवविग्रहको वस्त्र और यज्ञोपवीत धारण कराकर) चन्दन-रोली आदिका अनुलेप करे। फिर शिव-सम्बन्धी मन्त्र बोलकर पुष्प अर्पण करते हुए पूजन करे। धूपके पात्रका अस्त्र-मन्त्र (फट्)-से प्रोक्षण करके शिव-मन्त्रसे धूपद्वारा पूजन करे। फिर अस्त्र-मन्त्रद्वारा पूजित घण्टा बजाते हुए गुग्गुलका धूप जलावे। फिर ‘शिवाय नमः।’ बोलकर अमृतके समान
* ये पाँच मन्त्र इस प्रकार हैं—
(१) ॐ ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणो ब्रह्मा शिवो मेऽस्तु सदा शिवोम्॥
(२) ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
(३) ॐ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥
(४) ॐ वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः॥
(५) ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः। भवे भवे नातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः॥