भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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१५४ * अग्निपुराण *


दे तथा शिखा-मन्त्रसे ही मुख आदि अङ्गोंकी कल्पना करे। मुखका उद्घाटन एवं प्रकटीकरण करे। तत्पश्चात् पूर्ववत् दसवें मासमें होनेवाले जातकर्म एवं नरकर्मकी भावनासे तत्पुरुष-मन्त्रद्वारा दर्भ आदिसे अग्निका पूजन एवं प्रज्वलन करके गर्भमलको दूर करनेवाला स्नान करावे तथा ध्यानद्वारा देवीके हाथमें सुवर्ण-बन्धन करके हृदय-मन्त्रसे पूजन करे। फिर सूतककी तत्काल निवृत्तिके लिये अस्त्र-मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित जलसे अभिषेक करे॥ १४—१९॥

कुण्डका बाहरकी ओरसे अस्त्र-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक कुशोंद्वारा ताडन या मार्जन करे। फिर ‘हुम्’ का उच्चारण करके उसे जलसे सींचे। तत्पश्चात् कुण्डके बाहर मेखलाओंपर अस्त्र-मन्त्रसे उत्तर और दक्षिण दिशाओंमें पूर्वाग्र तथा पूर्व और पश्चिम दिशाओंमें उत्तराग्र कुशाओंको बिछावे। उनपर हृदय-मन्त्रसे परिधि-विष्टर (आठों दिशाओंमें आसनविशेष) स्थापित करे। इसके बाद सद्योजातादि पाँच मुख-सम्बन्धी मन्त्रोंसे तथा अस्त्र-मन्त्रसे नालच्छेदनके उद्देश्यसे पाँच समिधाओंके मूलभागको घीमें डुबोकर उन पाँचोंकी आहुति दे। तदनन्तर ब्रह्मा, शंकर, विष्णु और अनन्तका दूर्वा और अक्षत आदिसे पूजन करे। पूजनके समय उनके नामके अन्तमें ‘नमः’ जोड़कर उच्चारण करे। यथा—‘ब्रह्मणे नमः।’ ‘शंकराय नमः।’ ‘विष्णवे नमः।’ ‘अनन्ताय नमः।’ फिर कुण्डके चारों ओर बिछे हुए पूर्वोक्त आठ विष्टरोंपर पूर्वाद दिशाओंमें क्रमशः इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर और ईशानका आवाहन और स्थापन करके यह भावना करे कि उन सबका मुख अग्निदेवकी ओर है। फिर उन सबकी अपनी-अपनी दिशामें पूजा करे। पूजाके समय उनके नाम मन्त्रके अन्तमें ‘नमः’ जोड़कर बोले। यथा—‘इन्द्राय नमः।’ इत्यादि॥ २०—२३ $\frac{१}{२}$ ॥

इसके बाद उन सब देवताओंको भगवान् शिवकी यह आज्ञा सुनावे—‘देवताओ! तुम सब लोग विघ्नसमूहका निवारण करके इस बालक (अग्नि)-का पालन करो।’ तदनन्तर ऊर्ध्वमुख स्रुक् और स्रुवको लेकर उन्हें बारी-बारीसे तीन बार अग्निमें तपावे। फिर कुशके मूल, मध्य और अग्रभागसे उनका स्पर्श करावे। कुशसे स्पर्श कराये हुए स्थानोंमें क्रमशः आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्व—इन तीनोंका न्यास करे। न्यास-वाक्य इस प्रकार हैं—‘ॐ हां आत्मतत्त्वाय नमः।’ ‘ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वाय नमः।’ ‘ॐ हूँ शिवतत्त्वाय नमः।’॥ २४—२६ $\frac{१}{२}$ ॥

तत्पश्चात् स्रुक्में ‘नमः’ के साथ शक्तिका और स्रुवमें शिवका न्यास करे। यथा—‘शक्त्यै नमः।’ ‘शिवाय नमः।’ फिर तीन आवृत्तिमें फैले हुए रक्षासूत्रसे स्रुक् और स्रुव दोनोंके ग्रीवाभागको आवेष्टित करे। इसके बाद पुष्पादिसे उनका पूजन करके अपने दाहिने भागमें कुशोंके ऊपर उन्हें रख दे। फिर गायका घी लेकर, उसे अच्छी तरह देख-भालकर शुद्ध कर ले और अपने स्वरूपके ब्रह्ममय होनेकी भावना करके, उस घीके पात्रको हाथमें लेकर हृदय-मन्त्रसे कुण्डके ऊपर अग्निकोणमें घुमाकर, पुनः अपने स्वरूपके विष्णुमय होनेकी भावना करे। तत्पश्चात् घृतको ईशानकोणमें रखकर कुशाग्रभागसे घी निकाले और ‘शिरसे स्वाहा।’ एवं ‘विष्णवे स्वाहा।’ बोलकर भगवान् विष्णुके लिये उस घृतबिन्दु की आहुति दे। अपने स्वरूपके रुद्रमय होनेकी भावना करके, कुण्डके नाभिस्थानमें घृतको रखकर उसका आप्लावन करे॥ २७—३१ $\frac{१}{२}$ ॥

(फैलाये हुए अँँगूठेसे लेकर तर्जनीतककी