अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 182, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ७५ * १५५
लंबाईको 'प्रादेश' कहते हैं।) प्रादेश बराबर लंबे दो कुशोंको अङ्गुष्ठ तथा अनामिका—इन दो अँगुलियोंसे पकड़कर उनके द्वारा अस्त्र (फट्)—के उच्चारणपूर्वक अग्निके सम्मुख घीको प्रवाहित करे। इसी प्रकार हृदय-मन्त्र (नमः)-का उच्चारण करके अपने सम्मुख भी घृतका आप्लावन करे। 'नमः' के उच्चारणपूर्वक हाथमें लिये हुए कुशके दग्ध हो जानेपर उसे शस्त्र-क्षेप (फट्के उच्चारण)-के द्वारा पवित्र करे। एक जलते हुए कुशसे उसकी नीराजना (आरती) करके फिर दूसरे कुशसे उसे जलावे। उस जले हुए कुशको अस्त्र-मन्त्रसे पुनः अग्निमें ही डाल दे। तत्पश्चात् घृतमें एक प्रादेश बराबर कुश छोड़े, जिसमें गाँठ लगायी गयी हो। फिर घीमें दो पक्षों तथा इडा आदि तीन नाड़ियोंकी भावना करे। इडा आदि तीनों भागोंसे क्रमशः स्रुवद्वारा घी लेकर उसका होम करे। 'स्वा' का उच्चारण करके स्रुवावस्थित घीको अग्निमें डाले और 'हा' का उच्चारण करके हुतशेष घीको उसे डालनेके लिये रखे हुए पात्रविशेषमें छोड़ दे। अर्थात् 'स्वाहा' बोलकर क्रमशः दोनों कार्य (अग्निमें हवन और शेषका पात्रविशेषमें प्रक्षेप) करे॥ ३२-३६॥
प्रथम इडाभागसे घी लेकर 'ॐ हामग्नये स्वाहा।' इस मन्त्रका उच्चारण करके घीका अग्निमें होम करे और हुतशेषका पात्रविशेषमें प्रक्षेप करे। इसी प्रकार दूसरे पिङ्गलाभागसे घी लेकर 'ॐ हां सोमाय स्वाहा।' बोलकर घीमें आहुति दे और शेषका पात्रविशेषमें प्रक्षेप करे। फिर 'सुषुम्णा' नामक तृतीय भागसे घी लेकर 'ॐ हामग्नीषोमाभ्यां स्वाहा।' बोलकर स्रुवाद्वारा घी अग्निमें डाले और शेषका पात्रविशेषमें प्रक्षेपण करे। तत्पश्चात् बालक अग्निके मुखमें नेत्रत्रयके स्थानविशेषमें तीनों नेत्रोंका उद्घाटन करनेके लिये घृतपूर्ण स्रुवद्वारा निम्नाङ्कित मन्त्र बोलकर अग्निमें चौथी आहुति दे—'ॐ हामग्नये स्विष्टकृते स्वाहा'॥ ३७-३९॥
तत्पश्चात् (पहले अध्यायमें बताये अनुसार) 'ॐ हां हृदयाय नमः।' इत्यादि छहों अङ्ग-सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा घीको अभिमन्त्रित करके धेनुमुद्राद्वारा जगावे। फिर कवच-मन्त्र (हुम्)-से अवगुण्ठित करके शरमन्त्र (फट्)-से उसकी रक्षा करे। इसके बाद हृदय-मन्त्रसे घृतबिन्दुका उत्क्षेपण करके उसका अभ्युक्षण एवं शोधन करे। साथ ही शिवस्वरूप अग्निके पाँच मुखोंके लिये अभिघार-होम, अनुसंधान-होम तथा मुखोंके एकीकरण-सम्बन्धी होम करे। अभिघार-होमकी विधि यों है—'ॐ हां सद्योजाताय स्वाहा। ॐ हां वामदेवाय स्वाहा। ॐ हां अघोराय स्वाहा। ॐ हां तत्पुरुषाय स्वाहा। ॐ हां ईशानाय स्वाहा।'—इन पाँच मन्त्रोंद्वारा सद्योजातादि पाँच मुखोंके लिये अलग-अलग क्रमशः घीकी एक-एक आहुति देकर उन मुखोंको अभिघारित-घीसे आप्लावित करे। यही मुखाभिघार-सम्बन्धी होम है। तत्पश्चात् दो-दो मुखोंके लिये एक साथ आहुति दे; यही मुखानुसंधान होम है। यह होम निम्नाङ्कित मन्त्रोंसे सम्पन्न करे—'ॐ हां सद्योजातवामदेवाभ्यां स्वाहा। ॐ हां वामदेवाघोराभ्यां स्वाहा। ॐ हां अघोरतत्पुरुषाभ्यां स्वाहा। ॐ हां तत्पुरुषेशानाभ्यां स्वाहा।'॥ ४०-४४ $\frac{३}{२}$॥
तदनन्तर कुण्डमें अग्निकोणसे वायव्यकोणतक तथा नैर्ऋत्यकोणसे ईशानकोणतक घीकी अविच्छिन्न धाराद्वारा आहुति देकर उक्त पाँचों मुखोंकी एकता करे। यथा—'ॐ हां सद्योजातवामदेवाघोर-तत्पुरुषेशानेभ्यः स्वाहा।' इस मन्त्रसे पाँचों मुखोंके लिये एक ही आहुति