अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 183, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें१५६ * अग्निपुराण *
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देनेसे उन सबका एकीकरण होता है। इस प्रकार इष्टमुखमें सभी मुखोंका अन्तर्भाव होता है, अतः वह एक ही मुख उन सभी मुखोंका आकार धारण करता है-उन सबके साथ उसकी एकता हो जाती है। इसके बाद कुण्डके ईशानकोणमें अग्निकी पूजा करके, अस्त्र-मन्त्रसे तीन आहुतियाँ देकर अग्निका नामकरण करे- "हे अग्निदेव! तुम सब प्रकारसे शिव हो, तुम्हारा नाम 'शिव' है।" इस प्रकार नामकरण करके नमस्कारपूर्वक, पूजित हुए माता-पिता वागीश्वरी एवं वागीश्वर अथवा शक्ति एवं शिवका अग्निमें विसर्जन करके उनके लिये विधिपूर्वक पूर्णाहुति दे। मूल- मन्त्रके अन्तमें 'वौषट्' पद जोड़कर (यथा- ॐ नमः शिवाय वौषट्।- ऐसा कहकर) शिव और शक्तिके लिये विधिपूर्वक पूर्णाहुति देनी चाहिये। तत्पश्चात् हृदय-कमलमें अङ्ग और सेनासहित परम तेजस्वी शिवका पूर्ववत् आवाहन करके पूजन करे और उनकी आज्ञा लेकर उन्हें पूर्णतः तृप्त करे॥ ४५-४९$\frac{१}{२}$॥
यज्ञाग्नि तथा शिवका अपने साथ नाड़ीसंधान करके अपनी शक्तिके अनुसार मूल-मन्त्रसे अङ्गोंसहित दशांश होम करे। घी, दूध और मधुका एक-एक 'कर्ष' (सोलह माशा) होम करना चाहिये। दहीकी आहुतिकी मात्रा एक 'सितुही' बतायी गयी है। दूधकी आहुतिका मान एक 'पसर' है। सभी भक्ष्य पदार्थों तथा लावाकी आहुतिकी मात्रा एक-एक 'मुट्ठी' है। मूलके तीन टुकड़ोंकी एक आहुति दी जाती है। फलकी आहुति उसके अपने ही प्रमाणके अनुसार दी जाती है, अर्थात् एक आहुतिमें छोटा हो या बड़ा एक फल देना चाहिये। उसे खण्डित नहीं करना चाहिये। अन्नकी आहुतिका मान आधा ग्रास है। जो सूक्ष्म किसमिस आदि वस्तुएँ हैं, उन्हें एक बार पाँचकी संख्यामें लेकर होम करना चाहिये। ईंखकी आहुतिका मान एक 'पोर' है। लताओंकी आहुतिका मान दो-दो अङ्गुलका टुकड़ा है। पुष्प और पत्रकी आहुति उनके अपने ही मानसे दी जाती है, अर्थात् एक आहुतिमें पूरा एक फूल और पूरा एक पत्र देना चाहिये। समिधाओंकी आहुतिका मान दस अङ्गुल है॥ ५०-५४॥
कपूर, चन्दन, केसर और कस्तूरीसे बने हुए दक्ष-कर्दम (अनुलेपविशेष)-की मात्रा एक कलाय (मटर या केराव)-के बराबर है। गुग्गुलकी मात्रा बेरके बीजके बराबर होनी चाहिये। कंदोंके आठवें भागसे एक आहुति दी जाती है। इस प्रकार विचार करके विधिपूर्वक उत्तम होम करे। इस तरह प्रणव तथा बीज-पदोंसे युक्त मन्त्रोंद्वारा होम-कर्म सम्पन्न करना चाहिये॥ ५५-५६॥
तदनन्तर घीसे भरे हुए स्रुक्के ऊपर अधोमुख स्रुवको रखकर स्रुक्के अग्रभागमें फूल रख दे। फिर बायें और दायें हाथसे उन दोनोंको शङ्खकी मुद्रासे पकड़े। इसके बाद शरीरके ऊपरी भागको उन्नत रखते हुए उठकर खड़ा हो जाय। पैरोंको समभावसे रखे। स्रुक् और स्रुव दोनोंके मूलभागको अपनी नाभिमें टिका दे। नेत्रोंको स्रुक्के अग्र- भागपर ही स्थिरतापूर्वक जमाये रखे। ब्रह्मा आदि कारणोंका त्याग करते हुए भावनाद्वारा सुषुम्णा नाड़ीके मार्गसे निकलकर ऊपर उठे। स्रुक्- स्रुवके मूलभागको नाभिसे ऊपर उठाकर बायें स्तनके पास ले आवे। अपने तन-मनसे आलस्यको दूर रखे तथा (ॐ नमः शिवाय वौषट्। - इस प्रकार) मूल-मन्त्रका वौषट्-पर्यन्त अस्पष्ट (मन्द स्वरसे) उच्चारण करे और उस घीको जौकी-सी पतली धाराके साथ अग्निमें होम दे॥ ५७-६०$\frac{१}{२}$॥
इसके बाद आचमन, चन्दन और ताम्बूल आदि देकर भक्तिभावसे भगवान् शिवके ऐश्वर्यकी वन्दना करते हुए उनके चरणोंमें उत्तम (साष्टाङ्ग) प्रणाम करे। फिर अग्निकी पूजा करके 'ॐ हः अस्त्राय फट्।' के उच्चारणपूर्वक संहारमुद्राके