अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 184, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ७६ * १५७
द्वारा शंवरोंका आहरण करके इष्टदेवसे 'भगवन्! मेरे अपराधको क्षमा करें'—ऐसा कहकर हृदय-मन्त्रसे पूरक प्राणायामके द्वारा उन तेजस्वी परिधियोंको बड़ी श्रद्धाके साथ अपने हृदयकमलमें स्थापित करे ॥ ६१—६३ $\frac{१}{२}$ ॥
सम्पूर्ण पाक (रसोई)-से अग्रभाग निकालकर कुण्डके समीप अग्निकोणमें दो मण्डल बनाकर एकमें अन्तर्बलि दे और दूसरेमें बाह्य-बलि। प्रथम मण्डलके भीतर पूर्व दिशामें 'ॐ हां रुद्रेभ्यः स्वाहा।'—इस मन्त्रसे रुद्रोंके लिये बलि (उपहार) अर्पित करे। दक्षिण दिशामें 'ॐ हां मातृभ्यः स्वाहा।' कहकर मातृकाओंके लिये, पश्चिम दिशामें 'ॐ हां गणेभ्यः स्वाहा तेभ्योऽयं बलिरस्तु।' ऐसा कहकर गणोंके लिये, उत्तर दिशामें 'ॐ हां यक्षेभ्यः स्वाहा तेभ्योऽयं बलिरस्तु।' कहकर यक्षोंके लिये, ईशानकोणमें 'ॐ हां ग्रहेभ्यः स्वाहा तेभ्योऽयं बलिरस्तु।' ऐसा कहकर ग्रहोंके लिये, अग्निकोणमें 'ॐ हां असुरेभ्यः स्वाहा तेभ्योऽयं बलिरस्तु।' ऐसा कहकर असुरोंके लिये, नैर्ऋत्यकोणमें 'ॐ हां रक्षोभ्यः स्वाहा तेभ्योऽयं बलिरस्तु।' ऐसा कहकर राक्षसोंके लिये, वायव्यकोणमें 'ॐ हां नागेभ्यः स्वाहा तेभ्योऽयं बलिरस्तु।' ऐसा कहकर नागोंके लिये तथा मण्डलके मध्यभागमें 'ॐ हां नक्षत्रेभ्यः स्वाहा तेभ्योऽयं बलिरस्तु' ऐसा कहकर नक्षत्रोंके लिये बलि अर्पित करे ॥ ६४—६७ ॥
इसी तरह 'ॐ हां राशिभ्यः स्वाहा तेभ्योऽयं बलिरस्तु।' ऐसा कहकर अग्निकोणमें राशियोंके लिये, 'ॐ हां विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा तेभ्योऽयं बलिरस्तु।' ऐसा कहकर नैर्ऋत्यकोणमें विश्वेदेवोंके लिये तथा 'ॐ हां क्षेत्रपालाय स्वाहा तस्मा अयं बलिरस्तु।' ऐसा कहकर पश्चिममें क्षेत्रपालको बलि दे ॥ ६८ ॥
तदनन्तर दूसरे बाह्य-मण्डलमें पूर्व आदि दिशाओंके क्रमसे इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, जलेश्वर वरुण, वायु, धनरक्षक कुबेर तथा ईशानके लिये बलि समर्पित करे। फिर ईशानकोणमें 'ॐ ब्रह्मणे नमः स्वाहा।' कहकर ब्रह्माके लिये तथा नैर्ऋत्यकोणमें 'ॐ विष्णवे नमः स्वाहा।' कहकर भगवान् विष्णुके लिये बलि दे। मण्डलसे बाहर काक आदिके लिये भी बलि देनी चाहिये। आन्तर और बाह्य—दोनों बलियोंमें उपयुक्त होनेवाले मन्त्रोंको संहारमुद्राके द्वारा अपने-आपमें समेट ले ॥ ६९—७१ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शिवपूजाके अङ्गभूत होमकी विधिका निरूपण' नामक पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७५ ॥
छहत्तरवाँ अध्याय
चण्डकी पूजाका वर्णन
**महादेवजी कहते हैं—**स्कन्द! तदनन्तर शिवविग्रहके निकट जाकर साधक इस प्रकार प्रार्थना करे—'भगवन्! मेरे द्वारा जो पूजन और होम आदि कार्य सम्पन्न हुआ है, उसे तथा उसके पुण्यफलको आप ग्रहण करें।' ऐसा कहकर, स्थिरचित्त हो 'उद्भव' नामक मुद्रा दिखाकर अर्घ्यजलसे 'नमः' सहित पूर्वोक्त मूल-मन्त्र पढ़ते हुए इष्टदेवको अर्घ्य निवेदन करे। तत्पश्चात् पूर्ववत् पूजन तथा स्तोत्रोंद्वारा स्तवन करके प्रणाम करे तथा पराङ्मुख अर्घ्य देकर कहे—'प्रभो! मेरे अपराधोंको क्षमा करें।' ऐसा कहकर दिव्य नाराचमुद्रा दिखा 'अस्त्राय फट्' का उच्चारण करके समस्त संग्रहका अपने-आपमें उपसंहार करनेके पश्चात् शिवलिङ्गको मूर्ति-सम्बन्धी मन्त्रसे