भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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१६८ * अग्निपुराण *

ईशानकोणमें एक दोनेमें उसके फल और मूलको रखकर भगवान् शिवका पूजन करे। उस वृक्षकी जड़, नाल, पत्र, फूल और फल—इन पाँचों अङ्गोंको अञ्जलिमें लेकर आमन्त्रित करते हुए सिरपर रखे और इस प्रकार कहे—'देवेश्वर! मैं आज आपको निमन्त्रित करता हूँ। कल प्रातःकाल मुझे तपस्याका लाभ लेना है—की हुई उपासनाको सफल बनाना है। वह सब कार्य आपकी आज्ञासे पूर्ण हो।' तत्पश्चात् पात्रमें रखे हुए शेष पवित्रकको मूल-मन्त्रसे ढककर प्रातःकाल स्नान करनेके पश्चात् जगदीश्वर शिवका गन्ध-पुष्प आदिसे पूजन करे॥ ८—१०॥

तदनन्तर नित्य-नैमित्तिक कर्म करके दमनकसे पूजन करे। शेष दमनकको अञ्जलिमें लेकर—'ॐ हां आत्मतत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा।', 'ॐ हां विद्यातत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा।', 'ॐ हां शिवतत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा।', 'ॐ हां सर्वतत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा।'—इन चार मन्त्रोंद्वारा दमनक चढ़ाकर शिवका पूजन करना चाहिये। तदनन्तर दमनककी चौथी अञ्जलि लेकर 'ॐ ह्रौं महेश्वराय मखं पूरय पूरय शूलपाणये नमः।'—इस मन्त्रके उच्चारणपूर्वक भगवान् शिवको अर्पित करे॥ ११—१३॥

इस प्रकार शिव और अग्निकी पूजा करके गुरुकी विशेषरूपसे अर्चना करते हुए प्रार्थना करे—'भगवन्! मैंने दमनकद्वारा पूजनकर्ममें जो न्यूनता या अधिकता कर दी है, वह सब आपकी कृपासे परिपूर्ण हो जाय।' इस रीतिसे दमनकारोपण-कर्मका सम्पादन करके मनुष्य चैत्रमासजनित सम्पूर्ण फलको पाता है और अन्तमें स्वर्ग-लोकको जाता है॥ १४-१५॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'दमनकारोपणकी विधिका वर्णन' नामक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८०॥


इक्यासीवाँ अध्याय

समयाचार-दीक्षाकी विधि

**भगवान् महेश्वर कहते हैं—**स्कन्द! अब मैं भोग और मोक्षकी सिद्धिके लिये दीक्षाकी विधि बताऊँगा, जो समस्त पापोंका नाश करनेवाली है तथा जिसके द्वारा मल और माया आदि पाशोंका निवारण किया जाता है। जिससे शिष्यमें ज्ञानकी उत्पत्ति करायी जाती है, उसका नाम 'दीक्षा' है। वह भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली है। पशु (पाश-बद्ध जीव) शुद्ध विद्याद्वारा अनुग्राह्य कहा गया है। वह तीन प्रकारका होता है—पहला विज्ञानाकल, दूसरा प्रलयाकल तथा तीसरा सकल॥ १ $\frac{१}{२}$॥

उनमेंसे प्रथम अर्थात् 'विज्ञानाकल' पशु केवल मलरूप पाशसे युक्त होता है,$^१$ दूसरा अर्थात् 'प्रलयाकल' पशु मल और कर्म—इन दो पाशोंसे आबद्ध होता है$^२$ तथा तीसरा अर्थात्


१. जो परमात्माके स्वरूपको पहचानकर जप, ध्यान तथा संन्यासद्वारा अथवा भोगद्वारा कर्मोंका क्षय कर डालता है और कर्मोंका क्षय हो जानेके कारण जिसके लिये शरीर और इन्द्रिय आदिका कोई बन्धन नहीं रहता, उसमें केवल मलरूपी पाश (बन्धन) रह जाता है, उसे 'विज्ञानाकल' कहते हैं। मल तीन प्रकारके होते हैं—'आणव-मल', 'कर्मज-मल', तथा 'मायेय-मल'। विज्ञानाकलमें केवल आणव-मल रहता है। वह विज्ञान (तत्त्वज्ञान)-द्वारा अकल—कलारहित (कलादि भोग-बन्धनोंसे शून्य) हो जाता है, इसलिये उसकी 'विज्ञानाकल' संज्ञा होती है। २. जिस जीवात्माके देह, इन्द्रिय आदि प्रलयकालमें लीन हो जाते हैं, इससे उसमें मायेय मल तो नहीं रहता, परंतु आणव और कर्मज—ये दो मलरूपी पाश (बन्धन) रह जाते हैं, वह प्रलयकालमें ही अकल (कलारहित) होनेके कारण 'प्रलयाकल' कहलाता है।