अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 196, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ८१ * । १६९
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| ‘सकल’ पशु कला आदिसे लेकर भूमिपर्यन्त सारे तत्त्वसमूहोंसे बँधा होता है (अर्थात् वह | मल, माया तथा कर्म—त्रिविध पाशोंसे बँधा हुआ बताया गया है)॥* २-३ $\frac{१}{२}$ ॥ |
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* जिस जीवात्मामें आणव, मायेय और कर्मज—तीनों मल (पाश) रहते हैं, वह कला आदि भोग-बन्धनोंसे युक्त होनेके कारण ‘सकल’ कहा गया है। पाशुपत-दर्शनके अनुसार विज्ञानाकल पशु (जीव)-के भी दो भेद हैं—‘समाप्त कलुष’ और ‘असमाप्त कलुष’। (१) जीवात्मा जो कर्म करता है, उस प्रत्येक कर्मकी तह मलपर जमती रहती है। इसी कारण उस मलका परिपाक नहीं होने पाता; किंतु जब कर्मोंका त्याग हो जाता है, तब तह न जमनेके कारण मलका परिपाक हो जाता है और जीवात्माके सारे कलुष समाप्त हो जाते हैं, इसीलिये वह ‘समाप्त-कलुष’ कहलाता है। ऐसे जीवात्माओंको भगवान् आठ प्रकारके ‘विद्येश्वर’-पदपर पहुँचा देते हैं। उनके नाम ये हैं—
अनन्तश्चैव सूक्ष्मश्च तथैव च शिवोत्तमः। एकनेत्रस्तथैवैकरुद्रश्चापि त्रिमूर्तिकः ॥
श्रीकण्ठश्च शिखण्डी च प्रोक्ता विद्येश्वरा इमे।
‘(१) अनन्त, (२) सूक्ष्म, (३) शिवोत्तम, (४) एकनेत्र, (५) एकरुद्र, (६) त्रिमूर्ति, (७) श्रीकण्ठ और (८) शिखण्डी।’
(२) ‘असमाप्त-कलुष’ वे हैं, जिनकी कलुषराशि अभी समाप्त नहीं हुई है। ऐसे जीवात्माओंको परमेश्वर ‘मन्त्र’ स्वरूप दे देता है। कर्म तथा शरीरसे रहित किंतु मलरूपी पाशमें बँधे हुए जीवात्मा ही ‘मन्त्र’ हैं और इनकी संख्या सात करोड़ है। ये सब अन्य जीवात्माओंपर अपनी कृपा करते रहते हैं। ‘तत्त्व-प्रकाश’ नामक ग्रन्थमें उपर्युक्त विषयके संग्राहक श्लोक इस प्रकार हैं—
पशवस्त्रिविधाः प्रोक्ता विज्ञानप्रलयाकलौ सकलः। मलयुक्तस्तत्राद्यो मलकर्मयुतो द्वितीयः स्यात् ॥
मलमायाकर्मयुतः सकलस्तेषु द्विधा भवेदाद्यः। आद्यः समाप्तकलुषोऽसमाप्तकलुषो द्वितीयः स्यात् ॥
आद्या ननु गृह्य शिवो विद्येशत्वे नियोजयत्यष्टौ। मन्त्रांश्च करोत्यपरान् ते चोक्ताः कोटयः सप्त ॥
‘प्रलयाकल’ भी दो प्रकारके होते हैं—‘पक्वपाशाद्वय’ और ‘अपक्वपाशाद्वय’। (१) जिनके मल तथा कर्मरूपी दोनों पाशोंका परिपाक हो गया है, वे ‘पक्वपाशाद्वय’ होकर मोक्षको प्राप्त हो जाते हैं। (२) ‘अपक्वपाशाद्वय’ जीव पुर्यष्टकमय देह धारण करके नाना प्रकारके कर्मोंको करते हुए नाना योनियोंमें घूमा करते हैं।
‘सकल’ जीवोंके भी दो हैं—‘पक्वकलुष’ भेद और ‘अपक्वकलुष’। (१) जैसे-जैसे जीवात्माके मल, कर्म तथा माया—इन पाशोंका परिपाक बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे ये सब पाश शक्तिहीन होते जाते हैं। तब वे पक्वकलुष जीवात्मा ‘मन्त्रेश्वर’ कहलाते हैं। सात करोड़ मन्त्ररूपी जीव-विशेषोंके, जिनका ऊपर वर्णन हो चुका है, अधिकारी ये ही ११८ मन्त्रेश्वर जीव हैं। (२) अपक्वकलुष जीव भवकूपमें गिरते हैं।
नारदपुराणमें शैव-महातन्त्रकी मान्यताके अनुसार पाँच प्रकारके पाश बताये गये हैं—(१) मलज, (२) कर्मज, (३) मायेय (मायाजन्य), (४) तिरोधान—शक्तिज और (५) बिन्दुज। आधुनिक शैव दर्शनमें चार प्रकारके पाशोंका उल्लेख है—मल, रोध, कर्म तथा माया। रोध-शक्ति या तिरोधान-शक्ति एक ही वस्तु है। ‘बिन्दु’ मायास্বরূপ है। वह ‘शिवतत्त्व’ नामसे भी जानने योग्य है। यद्यपि शिवपद-प्राप्तिरूप परम मोक्षकी अपेक्षासे वह भी पाश ही है, तथापि विद्येश्वरादि-पदकी प्राप्तिमें परम हेतु होनेके कारण बिन्दु-शक्तिको ‘अपरा-मुक्ति’ कहा गया है। अतः उसे आधुनिक शैव दर्शनमें ‘पाश’ नाम नहीं दिया गया है। इसलिये यहाँ शेष चार पाशों (मल, कर्म, रोध और माया)-के ही स्वरूपका विचार किया जाता है—(१) जो आत्माके स्वाभाविक ज्ञान तथा क्रिया-शक्तिको ढक ले, वह ‘मल’ (अर्थात् अज्ञान) कहलाता है। यह मल आत्मास्वरूपका केवल आच्छादन ही नहीं करता, किंतु जीवात्माको बलपूर्वक दुष्कर्मोंमें प्रवृत्त करनेवाला पाश भी यही है। (२) प्रत्येक वस्तुमें जो सामर्थ्य है, उसे ‘शिवशक्ति’ कहते हैं। जैसे अग्निमें दाहिका शक्ति। यह शक्ति जैसे पदार्थमें रहती है, वैसा ही भला-बुरा स्वरूप धारण कर लेती है; अतः पाशमें रहती हुई यह शक्ति जब आत्माके स्वरूपको ढक लेती है, तब यह ‘रोध-शक्ति’ या ‘तिरोधान-पाश’ कहलाती है। इस अवस्थामें जीव शरीरको आत्मा मानकर शरीरके पोषणमें लगा रहता है; आत्माके उद्धारका प्रयत्न नहीं करता। (३) फलकी इच्छासे किये हुए ‘धर्माधर्म’ रूप कर्मोंको ही ‘कर्मपाश’ कहते हैं। (४) जिस शक्तिमें प्रलयके समय सब कुछ लीन हो जाता है तथा सृष्टिके समय जिसमेंसे सब कुछ उत्पन्न हो जाता है, वह ‘मायापाश’ है। अतः इन पाशोंमें बँधा हुआ पशु जब तत्त्वज्ञानद्वारा इनका उच्छेद कर डालता है, तभी वह ‘परम शिवतत्त्व’ अर्थात् ‘पशुपति-पद’ को प्राप्त होता है।
दीक्षा ही शिवत्व-प्राप्तिका साधन है। सर्वानुग्राहक परमेश्वर ही आचार्य-शरीरमें स्थित होकर दीक्षाकरणद्वारा जीवको परम शिवतत्त्वकी प्राप्ति कराते हैं; ऐसा ही कहा भी है—‘योजयति परे तत्त्वे स दीक्षयाऽऽचार्यमूर्तिस्थः।’
‘अपक्वपाशाद्वय प्रलयाकल’ जीव तथा ‘अपक्वकलुष सकल’ जीव जिस पुर्यष्टक देहको धारण करते हैं, वह पञ्चभूत तथा मन, बुद्धि, अहंकार—इन आठ तत्त्वोंसे युक्त होनेके कारण ‘पुर्यष्टक’ कहलाता है। पुर्यष्टक शरीर छत्तीस तत्त्वोंसे युक्त होता है। अन्तर्भोगके साधनभूत कला, काल, नियति, विद्या, राग, प्रकृति और गुण—ये सात तत्त्व, पञ्चभूत, पञ्चतन्मात्रा, दस इन्द्रियाँ, चार अन्तःकरण और पाँच शब्द आदि विषय—ये छत्तीस तत्त्व हैं। अपक्वपाशाद्वय जीवोंमें जो अधिक पुण्यात्मा हैं, उन्हें परम दयालु भगवान् महेश्वर भुवनेश्वर या लोकपाल बना देते हैं।