भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 878 में से

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पृष्ठ 197

१७० * अग्निपुराण *

इन पाशोंसे मुक्त होनेके लिये जीवको आचार्यसे मन्त्राराधनकी दीक्षा लेनी होती है। वह दीक्षा दो प्रकारकी मानी गयी है—एक 'निराधारा' और दूसरी 'साधारा'। उपर्युक्त तीन पशुओंमेंसे विज्ञानाकल और प्रलयाकल—इन दो पशुओंके लिये निराधारा दीक्षा बतायी गयी है और सकल पशुके लिये साधारा। आचार्यकी अपेक्षा न रखकर शम्भुद्वारा ही तीव्र शक्तिपात करके जो दीक्षा दी जाती है, वह 'निराधारा' कही गयी है। आचार्यके शरीरमें स्थित होकर भगवान् शंकर अपनी मन्दा, तीव्रा आदि भेदवाली शक्तिसे जिस दीक्षाका सम्पादन करते हैं, वह 'साधारा' कहलाती है। यह साधारा दीक्षा सबीजा, निर्बीजा, साधिकारा और अनधिकारा—इन भेदोंके द्वारा जिस तरह चार* प्रकारकी हो जाती है, वह बताया जाता है॥४-७$\frac{१}{२}$॥

समर्थ पुरुषोंको जो समयाचारसे युक्त दीक्षा दी जाती है, उसे 'सबीजा' कहते हैं और असमर्थ पुरुषोंको दी जानेवाली समयाचारशून्य दीक्षा 'निर्बीजा' कही गयी है॥८$\frac{१}{२}$॥

जिस दीक्षासे साधक और आचार्यको नित्य-नैमित्तिक एवं काम्य कर्मोंमें अधिकार प्राप्त होता है, वह 'साधिकारा दीक्षा' है। 'निर्बीजा दीक्षा' में दीक्षित होनेवाले लोगोंको तथा समयाचारकी दीक्षा लेनेवाले साधारण शिष्य एवं पुत्रकसंज्ञक शिष्यविशेषको नित्यकर्म-मात्रके अधिकारी होनेके कारण जो दीक्षा दी जाती है, वह 'निरधिकारा दीक्षा' कहलाती है। साधारा और निराधारा भेदसे जो दीक्षाके दो भेद बताये गये हैं, उनमेंसे प्रत्येकके निम्नाङ्कित दो रूप (या भेद) और होते हैं—एक तो 'क्रियावती' कही गयी है, जिसमें कर्मकाण्डकी विधिसे कुण्ड और मण्डलकी स्थापना एवं पूजा की जाती है। दूसरी 'ज्ञानवती दीक्षा' है, जो बाह्य-सामग्रीसे


* शारदापटलमें दीक्षाके चार भेदोंका विस्तारसे वर्णन है। वे चार भेद हैं—क्रियावती, वर्णमयी, कलावती और वेधमयी। क्रियावती दीक्षामें कर्मकाण्डका पूरा उपयोग होता है। स्नान, संध्या, प्राणायाम, भूतशुद्धि, न्यास, ध्यान, पूजा, शङ्ख-स्थापन आदिसे लेकर शास्त्रोक्त पद्धतिसे हवन-पर्यन्त कर्म किये जाते हैं। षडध्वाके शोधन-क्रमसे पृथक्-पृथक् आहुति देकर, शिवमें विलीन करके पुनः सृष्टि-क्रमसे शिष्यका चैतन्ययोग सम्पादित होता है। गुरु शिष्यसे अपनी एकताका अनुभव करता हुआ आत्मविद्याका दान करता है। गुरु-मन्त्र प्राप्त करके शिष्य धन्य-धन्य हो जाता है।

'वर्णमयी दीक्षा' न्यासरूपा है। अकारादि वर्ण प्रकृतिपुरुषात्मक हैं। शरीर भी प्रकृतिपुरुषात्मक होनेके कारण वर्णात्मक ही है। इसलिये पहले समस्त शरीरमें वर्णोंका सविधि न्यास किया जाता है। श्रीगुरुदेव अपनी आज्ञा और इच्छाशक्तिसे उन वर्णोंको प्रतिलोम-विधिसे अर्थात् संहार-क्रमसे विलीन कर देते हैं। यह क्रिया सम्पन्न होते ही शिष्यका शरीर दिव्य हो जाता है और गुरुके द्वारा वह परमात्मामें मिला दिया जाता है। ऐसी स्थिति होनेके पश्चात् श्रीगुरुदेव पुनः शिष्यको पृथक् करके दिव्य शरीरकी सृष्टि-क्रमसे रचना करते हैं। शिष्यमें परमानन्दस्वरूप दिव्यभावका विकास होता है और वह कृतकृत्य हो जाता है।

'कलावती दीक्षा'की विधि निम्नलिखित है—मनुष्यके शरीरमें पाँच प्रकारकी शक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं। पैरके तलवेसे जानु-पर्यन्त 'निवृत्ति-शक्ति' है, जानुसे नाभि-पर्यन्त 'प्रतिष्ठा-शक्ति' है, नाभिसे कण्ठ-पर्यन्त 'विद्या-शक्ति' है, कण्ठसे ललाट-पर्यन्त 'शान्ति-शक्ति' है, ललाटसे शिखा-पर्यन्त 'शान्त्यतीतकला-शक्ति' है। संहार-क्रमसे पहलीको दूसरीमें, दूसरीको तीसरीमें और अन्तिम कलाको शिवमें संयुक्त करके शिष्य शिवरूप कर दिया जाता है। पुनः सृष्टि-क्रमसे इसका विस्तार किया जाता है और शिष्य दिव्य भावको प्राप्त होता है।

'वेधमयी दीक्षा' षट्चक्र-वेधन ही है। जब गुरु कृपा करके अपनी शक्तिसे शिष्यका षट्चक्रभेद कर देते हैं, तब इसीको 'वेधमयी दीक्षा' कहते हैं। गुरु पहले शिष्यके छः चक्रोंका चिन्तन करते हैं और उन्हें क्रमशः कुण्डलिनी शक्तिमें विलीन करते हैं। छः चक्रोंका विलयन बिन्दुमें करके तथा बिन्दुको कलामें, कलाको नादमें, नादको नादान्तमें, नादान्तको उन्मनीमें, उन्मनीको विष्णुमुखमें और तत्पश्चात् गुरुमुखमें संयुक्त करके अपने साथ ही उस शक्तिको परमेश्वरमें मिला देते हैं। गुरुकी इस कृपासे शिष्यका पाश छिन्न-भिन्न हो जाता है। उसे दिव्य बोधकी प्राप्ति होती है और वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार यह 'बोधमयी दीक्षा' सम्पन्न होती है।