भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 198
  • अध्याय ८१ * १७१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

नहीं, मानसिक व्यापारमात्रसे साध्य है॥९-१२॥

इस प्रकार अधिकारप्राप्त आचार्यद्वारा दीक्षा-कर्मका सम्पादन होता है।$^*$ स्कन्द! गुरुको चाहिये कि वह नित्यकर्मका विधिवत् अनुष्ठान करके शिष्यका दीक्षाकर्म सम्पन्न करे। प्रणवके जपपूर्वक गुरु अपने कर-कमलमें अर्घ्य-जल ले द्वारपालोंका पूजन करे। फिर विघ्नोंका निवारण करनेके अनन्तर, द्वार-देहलीपर अस्त्रन्यास करके अपने आसनपर बैठे। शास्त्रोक्त विधिसे भूतशुद्धि एवं अन्तर्याग करे। तिल, चावल, सरसों, कुश, दूर्वाङ्कुर, जौ, दूध और जल—इन सबको एकत्र करके विशेषार्घ्य बनावे। उसके जलसे समस्त द्रव्यों (पूजन-सामग्रियों)-की शुद्धि करे। फिर तिलक-सम्बन्धी अपने सम्प्रदायके मन्त्रसे भालदेशमें तिलक लगावे। फिर पूर्ववत् पूजन, मन्त्र-शोधन तथा पञ्चगव्य-प्राशन आदि कार्य करने चाहिये। क्रमशः लावा, चन्दन, सरसों, भस्म, दूर्वा, अक्षत, कुश और अन्तमें पुनः शुद्ध लावा—ये सब 'विकिर' (बिखरनेयोग्य द्रव्य) कहे गये हैं। इन सब वस्तुओंको एकत्र करके सात बार अस्त्र-मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे। अस्त्र-मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित जलसे इनका प्रोक्षण करके फिर कवच-मन्त्र (हुम्)-से अवगुण्ठन करके यह भावना करे कि ये विघ्नसूहका निवारण करनेवाले नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र हैं॥ १३-१८$\frac{१}{२}$॥

तदनन्तर प्रादेशमात्र लंबे कुशके छत्तीस दलोंसे वेणीरूप बोधमय उत्तम खड्ग बनाकर उसे सात बार जपते हुए शिव-मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे। फिर उसे शिवस्वरूप मानकर भावनाद्वारा अपने हृदयमें स्थापित करे। साथ ही जगदाधार भगवान् शिवकी जो झाँकी अपनेको अभीष्ट हो, उसी रूपमें उनका ध्यान-चिन्तन करके निष्कल परमात्मा शिवका अपने भीतर न्यास करे। तत्पश्चात् यह भावना करे कि 'मैं साक्षात् शिव हूँ।' फिर सिरपर (मूल-मन्त्रसे अभिमन्त्रित) श्वेत पगड़ी रखकर अपने शरीरको (गन्ध, पुष्प एवं आभूषणोंसे) अलंकृत करे। तत्पश्चात् गुरु अपने दाहिने हाथपर सुगन्ध-द्रव्य अथवा कुङ्कुमद्वारा मण्डलका निर्माण करे। फिर उसपर विधिपूर्वक भगवान् शिवकी पूजा करे। इससे वह 'शिवहस्त' हो जाता है। उस तेजस्वी शिवहस्तको शिव-मन्त्रसे अपने मस्तकपर रखकर यह दृढ़ भावना करे कि 'मैं शिवसे अभिन्न और सबका कर्ता साक्षात् परमात्मा शिव ही हूँ।' जब गुरु ऐसी भावना कर ले, तब वह यज्ञमण्डपमें कर्मोंका साक्षी, कलशमें यज्ञका रक्षक, अग्निमें होमका अधिष्ठान, शिष्यमें उसके अज्ञानमय पाशका उच्छेद करनेवाला तथा अन्तरात्मामें अनुग्रहीता—इन पाँच आकारोंमें अभिव्यक्त ईश्वररूप हो जाता है। गुरु इस भावको अत्यन्त दृढ़तर कर ले कि 'वह परमेश्वर मैं ही हूँ'॥१९-२५॥

तदनन्तर ज्ञानरूपी खड्ग हाथमें लिये गुरु यज्ञमण्डपके नैर्ऋत्यकोणवाले भागमें उत्तराभिमुख स्थित हो, अर्घ्य, जल और पञ्चगव्यसे उस


$^*$ सोमशम्भुकी 'कर्मकाण्ड-क्रमावली' (श्लोक ६१९-६२०$\frac{१}{२}$)-में 'इत्थं लब्धाधिकारेण दीक्षाचार्येण साध्यते।' इस पंक्तिके बाद दो श्लोक और अधिक उपलब्ध होते हैं, जो इस प्रकार हैं—
स च सद्देशसम्भूतः सुमूर्तिः श्रुतशीलवान्॥ ज्ञानाचारो गुणोपेतः क्षमी शुद्धाशयो वरः।
देशकालगुणाचारो गुरुभक्तिसमन्वितः॥ शिवानुध्यानवान् शस्तो विरक्तश्च प्रशस्यते।
'दीक्षाप्राप्त शिष्य यदि उत्तम देशमें उत्पन्न, सुन्दर शरीरवाला, शास्त्राध्ययन एवं शीलसे सम्पन्न, ज्ञानी, सदाचारी, गुणवान्, क्षमाशील, शुद्ध अन्तःकरणसे युक्त, श्रेष्ठ, देश-कालोचित गुण और आचारसे सुशोभित, गुरुभक्त, शिवध्यानपरायण तथा विरक्त हो तो वह उत्तम माना गया है और उसकी प्रशंसा की जाती है।'