भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 878 में से

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पृष्ठ 199

१७२ * अग्निपुराण *

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मण्डपका प्रोक्षण करे। ईक्षण आदि चतुष्पथान्त-संस्कारोंद्वारा उसका संस्कार करे। फिर यज्ञमण्डपमें बिखरनेयोग्य पूर्वोक्त वस्तुओंको बिखेरकर कुशकी कूँचीसे उन सबको बटोर ले और उन्हें ईशानकोणमें स्थापित वर्धनी (जलपात्र)-में आसनके लिये रख दे। नैर्ऋत्यकोणमें वास्तुदेवताओंका और पश्चिम द्वारपर लक्ष्मीका पूजन करे। साथ ही यह भावना करे कि 'वे मण्डपरूपिणी लक्ष्मी देवी रत्नोंके भण्डारसे यज्ञमण्डपको परिपूर्ण कर रही हैं।' इस प्रकार ध्यान एवं आवाहन कर हृदय-मन्त्र 'नमः' के द्वारा अर्थात् 'लक्ष्मै नमः।'— इस मन्त्रसे उनकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद ईशानकोणमें सप्तधान्यपर स्थापित किये हुए वस्त्रवेष्टित पञ्चरत्नयुक्त एवं जलसे परिपूर्ण पश्चिमाभिमुख कलशपर भगवान् शंकरका पूजन करे। फिर उस कलशके दक्षिण भागमें सिंहपर विराजमान पश्चिमाभिमुखी शक्ति खड्गरूपिणी वर्धनीका पूजन करे॥ २६—३०॥

तदनन्तर पूर्व आदि दिशाओंमें इन्द्र आदि दिक्पालोंका और इसके अन्तमें विष्णुभगवान्‌का पूजन करे। ये सब-के-सब प्रणवमय आसनपर विराजमान हैं तथा अपने-अपने वाहनों और आयुधोंसे संयुक्त हैं—ऐसी भावना करके उनके नामोंके अन्तमें 'नमः' पद जोड़कर उन्हींसे उनकी पूजा करे। यथा—'इन्द्राय नमः।', 'विष्णवे नमः।' इत्यादि। पहले पूर्वोक्त वर्धनीको भलीभाँति हाथमें ले, उसे कलशके सामनेकी ओरसे ले जाकर प्रदक्षिणक्रमसे उसके चारों ओर घुमावे और उससे जलकी अविच्छिन्न धारा गिराता रहे। साथ ही मूलमन्त्रका उच्चारण करते हुए लोकपालोंको भगवान् शिवकी निम्नाङ्कित आज्ञा सुनावे—'लोकपालगण! आपलोग यथाशक्ति सावधानीके साथ इस यज्ञकी रक्षा करें।' यों आदेश दे, नीचे एक कलश रखकर उसके ऊपर उस वर्धनीको स्थापित कर दे। तत्पश्चात् सुस्थिर आसनवाले कलशपर भगवान् शंकरका साङ्ग पूजन करे। इसके बाद कला आदि षडध्वाका न्यास करके शोधन करे और वर्धनीमें अस्त्रकी पूजा करे॥ ३१—३४॥

पूजाके मन्त्र इस प्रकार हैं—'ॐ हः अस्त्रासनाय हूं फट् नमः।', 'ॐ ॐ अस्त्रमूर्तये हूं फट् नमः।', 'ॐ हूं फट् पाशुपतास्त्राय नमः।', 'ॐ ॐ हृदयाय हूं फट् नमः।', 'ॐ श्रीं शिरसे हूं फट् नमः।', 'ॐ यं शिखायै हूं फट् नमः।' 'ॐ शुं कवचाय हूं फट् नमः।', 'ॐ हूं फट् अस्त्राय हूं फट् नमः।' इसके बाद पाशुपतास्त्रके स्वरूपका इस प्रकार चिन्तन करे—'उनके चार मुख हैं। प्रत्येक मुखमें दाढ़ें हैं। उनके हाथोंमें शक्ति, मुद्गर, खड्ग और त्रिशूल हैं तथा उनकी प्रभा करोड़ों सूर्योंके समान है।' इस प्रकार ध्यान करके लिङ्गमुद्राके प्रदर्शनद्वारा भगलिङ्गका समायौग करे। हृदय-मन्त्र (नमः)-का उच्चारण करते हुए अङ्गुष्ठसे कलशका स्पर्श करे और मुट्ठीसे खड्गरूपिणी वर्धनीका। भोग और मोक्षकी सिद्धिके लिये पहले मुट्ठीसे वर्धनीका ही स्पर्श करना चाहिये। फिर कलशके मुखभागकी रक्षाके लिये उसपर पूर्वोक्त ज्ञान-खड्ग समर्पित करे। साथ ही मूल-मन्त्रका एक सौ आठ बार जप करके वह जप भी कलशको निवेदन कर दे। उसके दशांशका जप करके वर्धनीमें उसका अर्पण करे। तदनन्तर भगवान्‌से रक्षाके लिये प्रार्थना करे—'सम्पूर्ण यज्ञोंको धारण करनेवाले भगवान् जगन्नाथ! बड़े यत्नसे इस यज्ञ-मन्दिरका निर्माण किया गया है? कृपया आप इसकी रक्षा करें'॥ ३५—४०॥

इसके बाद वायव्यकोणमें प्रणवमय आसनपर