अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 200, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ८१ * १७३
विराजमान चार भुजाधारी गणेशजीका पूजन करे। तत्पश्चात् वेदीपर शिवका पूजन करके अर्घ्य हाथमें लिये साधक यज्ञकुण्डके पास जाय। वहाँ बैठकर मन्त्र-देवताकी तृप्तिके लिये बायें भागमें अर्घ्य, गन्ध और घृत आदिको तथा दाहिने भागमें समिधा, कुशा एवं तिल आदिको रखकर कुण्ड, अग्नि, स्रुक् तथा घृत आदिका पूर्ववत् संस्कार करके, हृदयमें ऊर्ध्वमुख अग्निकी प्रधानताका चिन्तन करे तथा अग्निमें भगवान् शिवका पूजन करे। फिर गुरु अपने शरीरमें, शिवकलशमें, मण्डलमें, अग्नि और शिष्यकी देहमें सृष्टिन्यासकी रीतिसे न्यासकर्मका सम्पादन करके अध्वाका विधिपूर्वक शोधन करनेके पश्चात् कुण्डकी लंबाई-चौड़ाईके अनुसार ही अग्निदेवके मुखकी लंबाई-चौड़ाईका चिन्तन करके अग्निजिह्वाओंके नाम-मन्त्रके अन्तमें 'नमः' (एवं 'स्वाहा') बोलकर अभीष्ट वस्तुकी आहुतियाँ देते हुए अग्निदेवको तृप्त करे। अग्निकी सात जिह्वाओंके सात बीज हैं। होमके लिये उनका परिचय दिया जाता है॥ ४१-४५॥
रेफरहित अन्तिम दो वर्णोंके सभी (अर्थात् सात) अक्षर यदि रकार और छठे स्वर (ऊ)- पर आरूढ़ हों और उनके भी ऊपर चन्द्रबिन्दुरूप शिखा हो तो वे ही अग्निकी सात जिह्वाओंके क्रमशः सात बीज-मन्त्र हैं। (यथा—यूँ लूँ वूँ श्रूँ षूँ स्रूँ हूँ)<sup>१</sup> अग्निकी सात जिह्वाओंके नाम इस प्रकार हैं—हिरण्या, कनका, रक्ता, कृष्णा, सुप्रभा, अतिरक्ता तथा बहुरूपा। ईशान, पूर्व, अग्नि, नैर्ऋत्य, पश्चिम, वायव्य तथा मध्य दिशामें क्रमशः इनके मुख हैं। (अर्थात् एक त्रिभुजके ऊपर दूसरा त्रिभुज बनानेसे जो छः कोण बनते हैं, वे क्रमशः ईशान, पूर्व, अग्नि, नैर्ऋत्य, पश्चिम तथा वायव्यकोणमें स्थित होते हैं। अग्निकी हिरण्या आदि छः जिह्वाओंको इन्हीं छः कोणोंमें स्थापित करे तथा अन्तिम जिह्वा 'बहुरूपा' को मध्यमें)<sup>२</sup> ॥ ४६-४७॥
शान्तिक एवं पौष्टिक कर्ममें खीर आदि मधुर पदार्थोंद्वारा होम करे। परंतु अभिचार कर्ममें सरसोंकी खली, सत्तू, जौकी काँजी, नमक, राई, मट्ठा, कड़वा तेल, काँटे तथा टेढ़ी-मेढ़ी समिधाओंद्वारा क्रोधपूर्वक भाष्याणु (भाष्यमन्त्र)- से हवन करे।<sup>३</sup> कदम्बकी कलिकाओंद्वारा होम करनेसे निश्चय ही यक्षिणी सिद्ध हो जाती है। वशीकरण और आकर्षणकी सिद्धिके लिये बन्धूक (दुपहरिया) और पलाशके फूलोंका हवन करना चाहिये। राज्यलाभके लिये बिल्वफलका और लक्ष्मीकी प्राप्तिके लिये पाटल (पाड़र) एवं चम्पाके फूलोंका होम करे। चक्रवर्ती सम्राट्का
१. ये सात बीज अग्निकी 'हिरण्या' आदि सात जिह्वाओंके नामके आदिमें लगाये जाते हैं और अन्तमें 'नमः' पद जोड़कर नाम-मन्त्रोंसे ही उनकी पूजा की जाती है। यथा—'ॐ यूँ हिरण्यायै नमः । ', 'लूँ कनकायै नमः ।', 'वूँ रक्तायै नमः ।', 'श्रूँ कृष्णायै नमः ।' 'षूँ 'सुप्रभायै नमः ।', 'स्रूँ अतिरक्तायै नमः ।', 'हूँ बहुरूपायै नमः ।'
२. सोमशम्भुने इन जिह्वाओंके स्वरूप तथा कामनाभेदसे विभिन्न कर्मोंमें इनके उपयोगके विषयमें इस प्रकार लिखा है—
हिरण्या तप्तहेमाभा कनका वज्रसुप्रभा। रक्तोदितारुणप्रख्या कृष्णा नीलमणिप्रभा॥
सुप्रभा मौक्तिकोद्योतातिरक्ता पद्मरागवत्। चन्द्रकान्तशरच्चन्द्रप्रभेव बहुरूपिणी ॥
फलं तु कामभेदेन क्रमादासामुदीर्यते। वश्याकर्षणयोराद्या कनका स्तम्भने रिपोः ॥
विद्वेषमोहने रक्ता कृष्णा मारणकर्मणि। सुप्रभा शान्तिके पुष्टौ सुरक्तोच्चाटने मता ॥
एकैव बहुरूपा तु सर्वकामफलप्रदा। (कर्मकाण्ड-क्रमावली ६६४-६६७)
३. सोमशम्भुके ग्रन्थमें इसके बाद यह एक श्लोक अधिक है—
विद्याधरत्वलाभाय चन्द्रागुरुयुतं पुरम्। अथवा पद्मकिञ्जल्कैर्जुहुयात् साधकोत्तमः॥
'साधक-शिरोमणिको चाहिये कि वह 'विद्याधर-पद' की प्राप्तिके लिये कपूर, अगुरु और गुग्गुलसे अथवा कमलके केसरोंसे हवन करे।'