भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 878 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 201

१७४ * अग्निपुराण *


पद पानेके लिये कमलोंका तथा सम्पत्तिके लिये भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंका होम करे। दूर्वाका हवन किया जाय तो उससे व्याधियोंका नाश होता है। समस्त जीवोंको वशमें करनेके लिये विद्वान् पुरुष प्रियङ्गु तथा कदलीके पुष्पोंका हवन करे। आमके पत्तेका होम ज्वरका नाशक होता है॥ ४८—५२॥

मृत्युञ्जय देवता या मन्त्रका उपासक मृत्युविजयी होता है। तिलका होम करनेसे अभ्युदयकी प्राप्ति होती है। रुद्रशान्ति समस्त दोषोंकी शान्ति करनेवाली होती है। वे अब प्रस्तुत प्रसंगको पुनः प्रारम्भ करते हैं*॥ ५३॥

एक सौ आठ आहुतियोंसे मूलका और उसके दशांश आहुतियोंसे अङ्गोंका तर्पण करे। यह हवन अथवा तर्पण मूलमन्त्रसे ही करना चाहिये। फिर पूर्ववत् पूर्णाहुति दे। शिष्योंका दीक्षामें प्रवेश करानेके लिये प्रत्येक शिष्यके निमित्त मूलमन्त्रका सौ बार जप करना चाहिये। साथ ही दुर्निमित्तोंका निवारण तथा शुभ निमित्तोंकी सिद्धिके लिये मूलमन्त्रसे पूर्ववत् दो सौ आहुतियाँ देनी चाहिये। पहले बताये हुए जो अस्त्र-सम्बन्धी आठ मन्त्र हैं, उनके आदिमें मूल और अन्तमें 'स्वाहा' जोड़कर पाठ करते हुए एक-एक बार तर्पण करे। मूल-मन्त्रमें जो बीज हों, उन्हें 'शिखा' (वषट्)-से सम्पुटित करके अन्तमें 'हूं फट्' जोड़कर जप करे तो उससे मन्त्रका दीपन होता है। 'ॐ हूं शिवाय स्वाहा।' इत्यादि मन्त्रोंसे तर्पण किया जाता है। इसी प्रकार 'ॐ ॐ शिवाय हूं फट्।' इत्यादि दीपन-मन्त्र हैं॥ ५४—५७$\frac{१}{२}$॥

तदनन्तर शिव-मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलसे धोयी हुई बटलोईको कवच-मन्त्रसे अवगुण्ठित करके उसमें रोली-चन्दन आदि लगा दे। फिर उसके गलेमें 'हूं फट्' मन्त्रसे अभिमन्त्रित उत्तम कुश और सूत्र बाँध दे। इससे चरुकी सिद्धि होती है। फिर धर्म आदि चार पायोंसे युक्त चौकी आदिका आसन देकर उसके ऊपर बने हुए अर्धचन्द्राकार मण्डलमें उस बटलोईको रखे तथा उसे आराध्यदेवताकी मूर्ति मानकर उसके ऊपर भावात्मक पुष्पोंसे भगवान् शिवका पूजन करे। अथवा उस बटलोईके मुखको वस्त्रसे बाँध दे और उसपर बाह्यपुष्पोंसे शिवका पूजन करे। इसके बाद पश्चिमाभिमुख रखे हुए चूल्हेको देख-भालकर शुद्ध करके उसमें अहंकार-बीजका


* इस प्रसंगमें सोमशम्भुने कुछ अधिक प्रयोग लिखे हैं। उनका कथन है कि—
विषमज्वरनाशाय चूतपत्राणि होमयेत्। घृतेन सह सार्द्राणि घृतप्लुतानि ज्वारिणः ॥
ॐ अमुकस्य ज्वरं नाशय जुं सः वौषट्। जले वरुणमभ्यर्च्य वृष्ट्यर्थं ग्रहसंयुतम्॥
तिलान् वारुणमन्त्रेण जुहुयाद् गुह्यकेन वा। मेघनाप्लाविताशेषदिगन्तधरणीतलान् ॥
धारयेत्तिलहोमेन शीघ्रं पाशुपताणुना। ॐ श्लीं पशु हूं फट् मेघान् स्फुटीक्रियताम् हूं फट्॥
सर्वोपद्रवनाशाय रुद्रशान्त्या तिलादिभिः। विधिना यजनं कुर्यादथ प्रस्तुतमुच्यते ॥
(कर्मकाण्ड-क्रमावली ६७६—६८०)

अर्थात् 'विषमज्वरका नाश करनेके लिये आमके पत्तोंका हवन करे। उन पत्तोंको घीसे आर्द्र करके अथवा घीमें डुबोकर उनकी आहुति दे। पत्तोंकी आहुति घीकी आहुतिके साथ देनी चाहिये। इससे ज्वरग्रस्त पुरुषको लाभ होता है। उस पुरुषका नाम लेकर कहे—'ॐ अमुकपुरुषस्य ज्वरं नाशय जुं सः वौषट्।'

'वृष्टिके लिये निम्नाङ्कित प्रयोग करे। जलमें ग्रहोंसहित वरुणदेवका पूजन करके वारुण अथवा गुह्यक-मन्त्रसे तिलोंकी आहुति दे। तिलके इस होमसे मनुष्य आकाशमें ऐसे मेघोंको स्थापित कर सकता है, जो सम्पूर्ण दिगन्तों तथा पृथ्वीको वर्षाके जलसे आप्लावित करनेमें समर्थ हों। फिर शीघ्र ही पाशुपतमन्त्रसे उन मेघोंको वर्षाके लिये विदीर्ण करे। मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ श्लीं पशु हूं फट् मेघान् स्फुटीक्रियताम् हूं फट्।'

'समस्त उपद्रवोंके नाशके लिये रुद्रमन्त्रसे शान्ति-अभिषेक करे तथा तिल आदिसे विधिपूर्वक होम-यज्ञ करे। अब प्रस्तुत विषयका प्रतिपादन करते हैं।'