अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ८१ * १७५
न्यास करे। तत्पश्चात् उसे कुण्डके दक्षिण भागमें रखे और यह भावना करे कि 'इस चूल्हेका शरीर धर्माधर्ममय है।' फिर उसकी शुद्धिके लिये उसके स्पर्शपूर्वक अस्त्र-मन्त्रका जप करे। इसके बाद अस्त्र-मन्त्र (फट्)-के जपसे अभिमन्त्रित गायके घीसे मार्जित हुई उस बटलोईको चूल्हेपर चढ़ावे॥ ५८—६२$\frac{१}{२}$॥
उसमें अस्त्र-मन्त्रसे शुद्ध किये हुए गोदुग्धको सौ बार प्रासाद-मन्त्र (हौं)-से अभिमन्त्रित करके डाले। फिर उस दूधमें साँवाँ आदिके चावल छोड़े। उसकी मात्रा इस प्रकार है—एक शिष्यकी दीक्षा-विधिके लिये पाँच पसर चावल डाले और दो-तीन आदि जितने शिष्य बढ़ें, उन सबके लिये क्रमशः एक-एक पसर चावल बढ़ाता जाय। फिर अस्त्र-मन्त्रसे आग जलावे एवं कवच-मन्त्र (हुम्)-से बटलोईको ढक दे। साधक पूर्वाभिमुख हो उक्त शिवाग्निमें मूल-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक चरुको पकावे। जब वह अच्छी तरह सीझ जाय, तब वहाँ स्रुवाको घीसे भरकर स्वाहान्त संहिता-मन्त्रोंद्वारा उस चूल्हेमें ही 'तप्ताभिघार' नामक आहुति दे। तदनन्तर मण्डलमें चरु-स्थालीको रखकर अस्त्र-मन्त्रसे उसपर कुश रख दे। इसके बाद प्रणवसे चूल्हेमें उल्लेखन और हृदय-मन्त्रसे लेपन करके पूर्ववत् 'तप्ताभिघार' के स्थानमें 'सीताभिघार' नामक आहुति दे। इस तरह चूल्हा शीतल होता है। सीताभिघार-आहुतिकी विधि यह है कि संहिता-मन्त्रोंके अन्तमें 'वौषट्' पद जोड़कर उसके द्वारा कुण्ड-मण्डपके पश्चिम भागमें दर्भ आदिके आसनपर प्रत्येक शिष्यके निमित्तसे एक-एक आहुति दे। फिर स्रुक्द्वारा सम्पात-होम करनेके पश्चात् संहिता-मन्त्रसे शुद्धि करे। फिर अन्तमें 'वषट्' लगे हुए उसी संहिता-मन्त्रद्वारा एक बार चरु लेकर धेनुमुद्राद्वारा उसका अमृतीकरण करे। इसके बाद वेदीपर उसके द्वारा शान्ति-होम करे॥ ६३—७०$\frac{१}{२}$॥
तत्पश्चात् गुरु अपने शिष्योंके लिये, अग्निदेवताके लिये तथा लोकपालोंके लिये घृतसहित भाग नियत करे। ये तीनों भाग समान घीसे युक्त होते हैं। इन सबके नाम-मन्त्रोंके अन्तमें 'नमः' पद लगाकर उनके द्वारा उनका भाग अर्पित करे और उसी मन्त्रसे उन्हें आचमनीय निवेदित करे। तदनन्तर मूल-मन्त्रसे एक सौ आठ आहुति देकर विधिवत् पूर्णाहुति होम करे। इसके बाद मण्डलके भीतर कुण्डके पूर्वभागमें अथवा शिव एवं कुण्डके मध्यभागमें हृदय-मन्त्रसे रुद्र-मातृकागण आदिके लिये अन्तर्बलि अर्पित करे। फिर शिवका आश्रय ले, उनकी आज्ञा पाकर एकत्वकी भावना करते हुए इस प्रकार चिन्तन करे—'मैं सर्वज्ञता आदि गुणोंसे युक्त और समस्त अध्वाओंके ऊपर विराजमान शिव हूँ। यह यज्ञस्थान मेरा अंश है। मैं यज्ञका अधिष्ठाता हूँ' यों अहंकार-शिवसे अपने ऐकात्म्य-बोधपूर्वक गुरु यज्ञमण्डपसे बाहर निकले॥ ७१—७५$\frac{१}{२}$॥
फिर अस्त्र-मन्त्र (फट्)-द्वारा निर्मित मण्डलमें पूर्वाग्र उत्तम कुश बिछाकर, उसमें प्रणवमय आसनकी भावना करके, उसके ऊपर स्नान किये हुए शिष्यको बिठावे। उस समय शिष्यको श्वेत वस्त्र और श्वेत उत्तरीय धारण किये रहना चाहिये। यदि वह मुक्तिका इच्छुक हो तो उसका मुख उत्तर दिशाकी ओर होना चाहिये और यदि वह भोगका अभिलाषी हो तो उसे पूर्वाभिमुख बिठाना चाहिये। शिष्यके शरीरका घुटनोंसे ऊपरका ही भाग उस प्रणवासनपर स्थित रहना चाहिये, नीचेका भाग नहीं। इस प्रकार बैठे हुए शिष्यकी ओर गुरु पूर्वाभिमुख होकर बैठे। मोक्षरूपी प्रयोजनकी सिद्धिके लिये शिष्यके पैरोंसे लेकर शिखातकके अङ्गोंका क्रमशः निरीक्षण करना चाहिये और यदि भोगरूपी प्रयोजनकी सिद्धि अभीष्ट हो तो इसके विपरीत क्रमसे शिष्यके