अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७६ * अग्निपुराण *
अङ्गोंपर दृष्टिपात करना उचित है, अर्थात् उस दशामें शिखासे लेकर पैरोंतकके अङ्गोंका क्रमशः निरीक्षण करना चाहिये।* उस समय गुरुकी दृष्टिमें शिष्यके प्रति कृपाप्रसाद भरा हो और वह दृष्टि शिष्यके समक्ष शिवके ज्योतिर्मय स्वरूपको अनावृतरूपसे अभिव्यक्त कर रही हो। इसके बाद अस्त्र-मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलसे शिष्यका प्रोक्षण करके मन्त्राम्बु-स्नानका कार्य सम्पन्न करे (प्रोक्षण-मन्त्रसे ही यह स्नान सम्पन्न हो जाता है)। तदनन्तर विघ्नोंकी शान्ति और पापोंके नाशके लिये भस्म-स्नान करावे। इसकी विधि यों है—अस्त्र-मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित भस्म लेकर उसके द्वारा शिष्यको सृष्टि-संहार-योगसे ताडित करे (अर्थात् ऊपरसे नीचे तथा नीचेसे ऊपरतक अनुलोम-विलोम-क्रमसे उसके ऊपर भस्म छिड़के)॥ ७६–८०॥
फिर सकलीकरणके लिये पूर्ववत् अस्त्र-जलसे शिष्यका प्रोक्षण करके उसकी नाभिसे ऊपरके भागमें अस्त्र-मन्त्रका उच्चारण करते हुए कुशाग्रसे मार्जन करे और हृदय-मन्त्रका उच्चारण करके पापोंके नाशके लिये पूर्वोक्त कुशोंके मूलभागसे नाभिके नीचेके अङ्गोंका स्पर्श करे। साथ ही समस्त पाशोंको दो टूक करनेके लिये पुनः अस्त्र-मन्त्रसे उन्हीं कुशोंद्वारा यथोक्तरूपसे मार्जन एवं स्पर्श करे। तत्पश्चात् शिष्यके शरीरमें आसनसहित साङ्ग-शिवका न्यास करे। न्यासके पश्चात् शिवकी भावनासे ही पुष्प आदि द्वारा उसका पूजन करे। इसके बाद नेत्र-मन्त्र (वौषट्) अथवा हृदय-मन्त्र (नमः)-से शिष्यके दोनों नेत्रोंमें श्वेत, कोरदार एवं अभिमन्त्रित वस्त्रसे पट्टी बाँध दे और प्रदक्षिणक्रमसे उसको शिवके दक्षिण पार्श्वमें ले जाय। वहाँ षडुत्थ (छहों अध्वाओंसे ऊपर उठा हुआ अथवा उन छहोंसे उत्पन्न) आसन देकर यथोचित रीतिसे शिष्यको उसपर बिठावे॥ ८१–८४ $\frac{१}{२}$॥
संहारमुद्राद्वारा शिवमूर्तिसे एकीभूत अपने-आपको उसके हृदय-कमलमें अवरुद्ध करके उसका काय-शोधन करे। तत्पश्चात् न्यास करके उसकी पूजा करे। पूर्वाभिमुख शिष्यके मस्तकपर मूल-मन्त्रसे शिवहस्त रखना चाहिये, जो रुद्र एवं ईशका पद प्रदान करनेवाला है। इसके बाद शिव-मन्त्रसे शिष्यके हाथमें शिवकी सेवाकी प्राप्तिके उपायस्वरूप पुष्प दे और उसे शिवपर ही चढ़वावे। तदनन्तर गुरु उसके नेत्रोंमें बँधे हुए वस्त्रको हटाकर उसके लिये शिवदेवगणाङ्कित स्थान, मन्त्र, नाम आदिकी उद्भावना करे, अथवा अपनी इच्छासे ही ब्राह्मण आदि वर्णोंके क्रमशः नामकरण करे॥ ८५–८८ $\frac{१}{२}$॥
शिव-कलश तथा वर्धनीको प्रणाम करवाकर अग्निके समीप अपने दाहिने आसनपर पूर्ववत् उत्तराभिमुख शिष्यको बिठावे और यह भावना करे कि 'शिष्यके शरीरसे सुषुम्णा निकलकर मेरे शरीरमें विलीन हो गयी है।' स्कन्द! इसके बाद मूलमन्त्रसे अभिमन्त्रित दर्भ लेकर उसके अग्रभागको तो शिष्यके दाहिने हाथमें रखे और मूलभागको अपनी जंघापर। अथवा अग्रभागको ही अपनी जंघापर रखे और मूलभागको शिष्यके दाहिने हाथमें॥ ८९–९१ $\frac{१}{२}$॥
शिव-मन्त्रद्वारा रेचक प्राणायामकी क्रिया करते हुए शिष्यके हृदयमें प्रवेशकी भावना करके पुनः उसी मन्त्रसे पूरक प्राणायामद्वारा अपने हृदयाकाशमें लौट आनेकी भावना करे। फिर शिवाग्निसे इसी तरह नाडी-संधान करके उसके संनिधानके लिये हृदय-मन्त्रसे तीन आहुतियाँ दे।
* सोमशम्भुकी 'कर्मकाण्ड-क्रमावली' श्लोक ७०४ में दृष्टिपातका क्रम इसके विपरीत है। वहाँ 'मुक्तौ भुक्तौ विलोमतः' के स्थानमें 'भुक्त्यै मुक्त्यै विलोमतः' पाठ है।