भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 878 में से

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पृष्ठ 204
  • अध्याय ८२ * १७७

शिवहस्तकी स्थिरताके लिये मूल-मन्त्रसे एक सौ आहुतियोंका हवन करे। इस प्रकार करनेसे शिष्य समय-दीक्षामें संस्कारके योग्य हो जाता है॥ ९२-९५॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'समय-दीक्षाकी योग्यताके आपादक-विधानका वर्णन' नामक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८१॥


बयासीवाँ अध्याय

समय-दीक्षाके अन्तर्गत संस्कार-दीक्षाकी विधिका वर्णन

भगवान् शिव कहते हैं—षडानन! अब मैं संस्कार-दीक्षाकी विधिका वर्णन करूँगा, सुनो—अग्निमें स्थित महेश्वरके शिवा-शिवममय (अर्ध-नारीश्वर) रूपका अपने हृदयमें आवाहन करे। शिव और शिवा दोनों एक शरीरमें ही परस्पर सटे हुए हैं—इस प्रकार ध्यानद्वारा देखकर उनका पूजन करके हृदय-मन्त्रसे संतर्पण करे। फिर उनके संनिधानके लिये हृदय-मन्त्रसे ही अग्निमें पाँच आहुतियाँ दे। तदनन्तर अस्त्र-मन्त्रसे अभिमन्त्रित पुष्पद्वारा शिष्यके हृदयमें ताड़ना दे, अर्थात् उसके वक्षपर उस फूलको फेंके। फिर उसके भीतर प्रकाशमान नक्षत्रकी आकृतिमें चैतन्य (जीव)-की भावना करे। तत्पश्चात् हुंकारयुक्त रेचक प्राणायामके योगसे शिष्यके हृदयमें भावनाद्वारा प्रवेश करके संहारिणीमुद्राद्वारा उस जीवचैतन्यको वहाँसे खींचकर पूरक प्राणायामके योगसे उसे अपने हृदयमें स्थापित करे॥ १-४॥

तदनन्तर 'उद्भव' नामक मुद्राका प्रदर्शन करके हृत्सम्पुटित आत्ममन्त्रका उच्चारण करते हुए रेचक प्राणायामके सहयोगसे उसका वागीश्वरी देवीकी योनिमें भावनाद्वारा आधान करे। उक्त मन्त्रका स्वरूप इस प्रकार है—ॐ हां हां हामात्मने नमः। इसके बाद अत्यन्त प्रज्वलित एवं धूमरहित अग्निमें अभीष्ट-सिद्धिके लिये आहुति दे। अप्रज्वलित तथा धूमयुक्त अग्निमें किया गया होम सफल नहीं होता है। यदि अग्निकी लपटें दक्षिणावर्त उठ रही हों, उससे उत्तम गन्ध प्रकट हो रही हो तथा वह अग्नि सुस्निग्ध प्रतीत होती हो तो उसे श्रेष्ठ बताया गया है। इसके विपरीत जिस अग्निसे चिनगारियाँ छूटती हों तथा जिसकी लपट धरतीको ही चूम रही हो, उसे उत्तम नहीं कहा गया है*॥ ५-८॥

इस प्रकारके चिह्नोंसे शिष्यके पापको जानकर उसका हवन कर दे, अथवा पाप-भक्षण-निमित्तक होमसे उस पापको जला डाले। फिर नूतन रूपसे उसमें द्विजत्वकी प्राप्ति, रुद्रांशकी भावना, आहार और बीजकी शुद्धि, गर्भाधान, गर्भ-स्थिति (पुंसवन), सीमन्तोन्नयन, जातकर्म तथा


* इस श्लोकके बाद सोमशम्भुकी 'कर्मकाण्ड-क्रमावली'में तीन श्लोक अधिक उपलब्ध होते हैं, जिनमें शिष्यके पापविशेषको जाननेके लिये अग्निके लक्षण दिये गये हैं। वे श्लोक इस प्रकार हैं—

अन्तेवासिकृतं पापं जानीयादग्निलक्षणैः। विष्ठागन्धे स भूहर्ता ब्रह्महा गुरुतल्पगः॥
सुरापो गुरुहन्ता च गोघ्नश्च कृतनाशनः। कृशेऽग्नौ शवगन्धे च गर्भभर्तृविनाशनः॥
भ्रमति स्त्रीवधे वह्निः कम्पते हेमहर्तरि। वधे स्फुटति बालस्य निस्तेजा गर्भघातके॥

'हवनीय अग्निके लक्षणोंसे शिष्यद्वारा किये गये पापविशेषको जानना चाहिये। यदि उस अग्निसे विष्ठाकी-सी दुर्गन्ध प्रकट होती हो तो यह जानना चाहिये कि वह शिष्य भूमिहर्ता, ब्रह्महत्यारा, गुरुपत्नीगामी, शराबी, गुरुघाती, गोवध करनेवाला तथा कृतघ्न रहा है। यदि अग्नि क्षीण हो और उससे मुर्देकी-सी बदबू आ रही हो तो उस शिष्यको गर्भ-हत्यारा और स्वामिघाती समझना चाहिये। यदि शिष्यमें स्त्रीवधजनित पाप हो तो उसके आहुति देते समय आगकी लपट सब ओर चक्कर देती है और यदि वह सुवर्णकी चोरी करनेवाला है तो उससे अग्निदेवमें कम्पन होने लगता है। यदि शिष्यने बालहत्याका पाप किया है तो अग्निमें किसी वस्तुके फूटनेकी-सी आवाज होती है। यदि शिष्य गर्भघाती है तो उसके संनिहित होनेसे आग निस्तेज हो जाती है।'

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