अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 219, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें१९२ * अग्निपुराण *
आचमन करे और योजनिका अथवा योजना-स्थानके लिये अस्त्र-मन्त्रसे अपने-आपका ताड़न करे। तत्पश्चात् वियोजन, आकर्षण और संग्रहण करके पूर्ववत् द्वादशान्त* (ललाटके ऊपरी भाग)-से जीवचैतन्यको ले आकर अपने हृदय-कमलकी कर्णिकामें स्थापित करे॥ ३३—३८॥
स्रुक्को घीसे भरकर और उसके ऊपर अधोमुख स्रुव रखकर शङ्खतुल्य मुद्राद्वारा नित्योक्त विधिसे हाथमें ले। तत्पश्चात् नादोच्चारणके अनुसार मस्तक और ग्रीवा फैलाकर दृष्टिको समभावसे रखते हुए स्थिर, शान्त एवं परमभावसे सम्पन्न हो कलश, मण्डल, अग्नि, शिष्य तथा अपने आत्मासे भी छः प्रकारके अध्वाको ग्रहण करके, स्रुक्के अग्रभागमें प्राणमयी नाड़ीके भीतर स्थापित करके, उसी भावसे उसका चिन्तन करे। इस प्रकार चिन्तन करके क्रमशः सात प्रकारके विषुवका ध्यान करे। उन सातोंका परिचय इस प्रकार है—पहला 'प्राणसंयोगस्वरूप' है और दूसरा हृदयादि-क्रमसे उच्चारित मन्त्रसंज्ञक है। तीसरा सुषुम्णामें अनुगत 'नाद या नाड़ी' रूप है। नाड़ी-सम्बद्ध नादका जो शक्तिमें लय होना है, उसको 'प्रशान्त-विषुव' कहते हैं। शक्तिमें लीन हुए नादका पुनः उज्जीवन होकर जो ऊपरको संचार और समतामें लय होता है, उसे 'शक्ति' नामक विषुव कहा गया है। सम्पूर्ण नादका शक्तिकी सीमाको लाँघकर उन्मनीमें लीन होना 'काल-विषुव' कहलाता है। यह छठा है। यह शक्तिसे अतीत होता है। सातवाँ विषुव है—'तत्त्वसंज्ञक'। यही योजना-स्थान है॥ ३९—४५$\frac{१}{२}$॥
पूरक और कुम्भक करके मुँहको थोड़ा खोलकर धीरे-धीरे मूल-मन्त्रका उच्चारण करते हुए भावनाद्वारा शिष्यात्माका लय करे। उसका क्रम यों है—विद्युत्सदृश छहों अध्वाओंके प्राणस्वरूपमें 'फट्कार' का चिन्तन करे। नाभिसे ऊपर एक बित्तेका स्थान 'फट्कार' है, जो प्राणका स्थान माना गया है। उससे ऊपर हृदयसे चार अङ्गुलकी दूरीपर 'अकार' का चिन्तन करना चाहिये (यह ब्रह्माका बोधक है)। उससे आठ अङ्गुल ऊपर कण्ठमें विष्णुका वाचक 'उकार' है, उससे भी चार अङ्गुल ऊँचे तालु-स्थानमें रुद्रवाचक 'मकार' की स्थिति है। इसी प्रकार ललाटके मध्यभागमें ईश्वरवाचक 'बिन्दु'का स्थान है। ललाटसे ऊपर ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त नादमय सदाशिव देव विराजमान हैं। उनके साथ ही वहाँ उनकी शक्ति भी विद्यमान है। उपर्युक्त तत्त्वोंका क्रमशः चिन्तन और त्याग करते हुए अन्ततोगत्वा शक्तिको भी त्याग दे। वहीं दिव्य पिपीलिका-स्पर्शका अनुभव करके ललाटके ऊपरके प्रदेशमें परम तत्त्व, परमानन्दस्वरूप, भावशून्य, मनोऽतीत, नित्य गुणोदयशाली शिवतत्त्वमें शिष्यात्माके विलीन होनेकी भावना करे॥ ४६—५२$\frac{१}{२}$॥
परम शिवमें योजनिकाकी स्थिरताके लिये 'ॐ नमः शिवाय वौषट्।'—इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए अग्निकी ज्वालामें घीकी धारा छोड़ता रहे। फिर विधिपूर्वक पूर्णाहुति देकर गुणापादन करे। उसकी विधि इस प्रकार है। निम्नाङ्कित मन्त्रोंको पढ़कर अग्निमें आहुतियाँ दे—
'ॐ हां आत्मन् सर्वज्ञो भव स्वाहा।' 'ॐ हीं आत्मन् नित्यतृप्तो भव स्वाहा।' 'ॐ हूं आत्मन् अनादिबोधो भव स्वाहा।' 'ॐ हैं आत्मन् स्वतन्त्रो भव स्वाहा।' 'ॐ ह्रौं आत्मन् अलुप्तशक्तिर्भव स्वाहा।' 'ॐ ह्रः आत्मन् अनन्तशक्तिर्भव स्वाहा।'
* अङ्गुलविस्तृतस्य ललाटस्योर्ध्वप्रदेशो द्वादशान्तपदेनोच्यते।' अर्थात् 'अङ्गुल विस्तारवाले ललाटका ऊर्ध्वदेश 'द्वादशान्त' पदसे कथित होता है।' ('नित्याषोडशिकार्णव' ८।५५ पर भास्कररायकी सेतुबन्ध-व्याख्या)