भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 220

* अध्याय ९० * १९३


इस प्रकार छहः गुणोंसे सम्पन्न आत्माको अविनाशी परमशिवसे लेकर विधिवत् भावनापूर्वक शिष्यके शरीरमें नियोजित करे। तीव्र और मन्द शक्तिपातजनित श्रमकी शान्तिके लिये शिष्यके मस्तकपर न्यासपूर्वक अमृत-बिन्दु अर्पित करे॥ ५३-५७॥

ईशान-कलश आदिके रूपमें पूजित शिवस्वरूप कलशोंको नमस्कार करके दक्षिणमण्डलमें शिष्यको अपने दाहिने उत्तराभिमुख बिठावे और देवेश्वर शिवसे प्रार्थना करे—'प्रभो! मेरी मूर्तिमें स्थित हुए इस जीवको आपने ही अनुगृहीत किया है; अतः नाथ! देवता, अग्नि तथा गुरुमें इसकी भक्ति बढ़ाइये'॥ ५८-५९॥

इस प्रकार प्रार्थना करके देवेश्वर शिवको प्रणाम करनेके अनन्तर गुरु स्वयं शिष्यको आदरपूर्वक यह आशीर्वाद दे कि 'तुम्हारा कल्याण हो'। इसके बाद भगवान् शिवको उत्तम भक्तिभावसे आठ फूल चढ़ाकर शिवकलशके जलसे शिष्यको स्नान करवावे और यज्ञका विसर्जन करे॥ ६०-६१॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'निर्वाण-दीक्षाका वर्णन' नामक अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८८॥


नवासीवाँ अध्याय

एकतत्त्व-दीक्षाकी विधि*

भगवान् शिव कहते हैं— स्कन्द! अब लघु होनेके कारण एकतात्त्विकी-दीक्षाका उपदेश दिया जाता है। यथावसर यथोचित रीतिसे स्वकीय मन्त्रद्वारा सूत्रबन्ध आदि कर्म करे। तत्पश्चात् काल, अग्नि आदिसे लेकर शिव-पर्यन्त समस्त तत्त्वोंका प्रविभावन (चिन्तन) करे। शिवतत्त्वमें अन्य सब तत्त्व धागेमें मनकोंकी भाँति पिरोये हुए हैं। शिव-तत्त्व आदिका आवाहन करके गर्भाधान आदि संस्कारोंका पूर्ववत् सम्पादन करे; किंतु मूल-मन्त्रसे सर्वशुल्क समर्पण करे। इसके बाद तत्त्वसमूहोंसे गर्भित पूर्णाहुति प्रदान करे। उस एक ही आहुतिसे शिष्य निर्वाण प्राप्त कर लेता है॥ १-४॥

शिवमें नियोजन तथा स्थिरताका आपादन करनेके लिये दूसरी पूर्णाहुति भी देनी चाहिये। उसे देकर शिवकलशके जलसे शिष्यका अभिषेक करे॥ ५॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'एकतत्त्व-दीक्षाविधिका वर्णन' नामक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८९॥


नब्बेवाँ अध्याय

अभिषेक आदिकी विधिका वर्णन

भगवान् शंकर कहते हैं— स्कन्द! शिवका पूजन करके गुरु शिष्य आदिका अभिषेक करे। इससे शिष्यको श्रीकी प्राप्ति होती है। ईशान आदि आठ दिशाओंमें आठ और मध्यमें एक—इस प्रकार नौ कलश स्थापित करे। उन आठ कलशोंमें क्रमशः क्षारोद, क्षीरोद, दध्युदक, घृतोद, इक्षुरसोद, सुरोद, स्वादूदक तथा गर्भोद—इन आठ समुद्रोंका आवाहन करे। इसी तरह क्रमानुसार उनमें आठ विद्येश्वरोंका भी स्थापन करे, जिनके नाम इस प्रकार हैं—१. शिखण्डी, २. श्रीकण्ठ,


* सोमशम्भुकी 'कर्मकाण्ड-क्रमावली' में इसके पूर्व 'त्रितत्त्वदीक्षा' का विस्तृत वर्णन है।