अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 223, कुल 878 में से
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श्रीं' इन बीजोंसे युक्त हैं। सूर्यके मन्त्र ‘आं क्षौं’ इन बीजोंसे, शिवके मन्त्र ‘आं हौं’ इन बीजोंसे, गणेशके मन्त्र ‘आं गं’ इन बीजोंसे तथा श्रीहरिके मन्त्र ‘आं अं’ इन बीजोंसे युक्त हैं। कादि व्यञ्जन अक्षरों तथा अकारादि सोलह स्वरोंको मिलाकर इक्यावन होते हैं। इस प्रकार सस्वर कादि अक्षरोंको आदिमें और सस्वर ‘क्ष’ से लेकर ‘क’ तकके अक्षरोंको अन्तमें रखनेसे सम्पूर्ण मन्त्र बनते हैं॥१४—१६॥
१४४० सम्पूर्ण मण्डल होनेसे सूर्य, शिव, देवी दुर्गा तथा विष्णुमेंसे प्रत्येकके तीन सौ साठ मण्डल होते हैं। अभिषिक्त गुरु इन सब मन्त्रों तथा देवताओंका जप-ध्यान करे तथा शिष्य एवं पुत्रको दीक्षा भी दे॥१७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘नाना-मन्त्र आदिका कथन’ नामक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥९१॥
बानबेवाँ अध्याय
प्रतिष्ठाके अङ्गभूत शिलान्यासकी विधिका वर्णन
**भगवान् शिव कहते हैं—**स्कन्द! अब मैं संक्षेपसे और क्रमशः प्रतिष्ठाका वर्णन करूँगा। पीठ शक्ति है और लिङ्ग शिव। इन दोनों (पीठ और लिङ्ग अथवा शक्ति और शिव)-के योगमें शिव-सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा प्रतिष्ठाकी विधि सम्पादित होती है। प्रतिष्ठाके ‘प्रतिष्ठा’ आदि पाँच भेद¹ हैं। उनका स्वरूप तुम्हें बता रहा हूँ। जहाँ ब्रह्मशिलाका योग हो, वहाँ विशेषरूपसे की हुई स्थापना ‘प्रतिष्ठा’ कही गयी है। पीठपर ही यथायोग्य जो अर्चा-विग्रहको पधराया जाता है, उसे ‘स्थापन’ कहते हैं। प्रतिष्ठा (ब्रह्मशिला)-से भिन्नकी स्थापनाको ‘स्थिर स्थापन’ कहते हैं। लिङ्गके आधारपूर्वक जो स्थापना होती है, उसे ‘उत्थापन’ कहा गया है। जिस प्रतिष्ठामें लिङ्गको आरोपित करके विद्वानोंद्वारा उसका संस्कार किया जाता है, उसकी ‘आस्थापन’ संज्ञा है। ये शिव-प्रतिष्ठाके पाँच भेद हैं। ‘आस्थान’ और ‘उत्थान’ भेदसे विष्णु आदिकी प्रतिष्ठा दो प्रकारकी मानी गयी है। इन सभी प्रतिष्ठाओंमें चैतन्यस्वरूप परमशिवका नियोजन करे। ‘पदाध्वा’ आदि भेदसे प्रासादोंमें भी पाँच प्रकारकी प्रतिष्ठा बतायी गयी है²। प्रासादकी इच्छासे पृथ्वीकी परीक्षा करे। जहाँकी मिट्टीका रंग श्वेत हो और घीकी सुगन्ध आती हो, वह भूमि ब्राह्मणके लिये उत्तम बतायी गयी है। इसी तरह क्रमशः क्षत्रियके लिये लाल तथा रक्तकी-सी गन्धवाली मिट्टी, वैश्यके लिये पीली और सुगन्धयुक्त मिट्टीवाली तथा शूद्रके लिये काली एवं सुराकी-सी गन्धवाली मिट्टीसे युक्त भूमि श्रेष्ठ कही गयी है॥१—७॥
पूर्व, ईशान, उत्तर अथवा सब ओर नीची और मध्यमें ऊँची भूमि प्रशस्त मानी गयी है³। एक हाथ गहराईतक खोदकर निकाली हुई मिट्टी
¹ १. प्रतिष्ठा, स्थापन, स्थिर स्थापन, उत्थापन और आस्थापन।
² २. ‘अध्वा’ छः कहे गये हैं—तत्त्वाध्वा, पदाध्वा, वर्णाध्वा, मन्त्राध्वा, कलाध्वा और भुवनाध्वा। इनमेंसे प्रथमको छोड़कर शेष पाँचोंके भेदसे यहाँ पाँच प्रकारकी प्रतिष्ठाका निर्देश किया गया है।
³ ३. ‘समराङ्गणसूत्रधार’ में भी इससे मिलती-जुलती बात कही गयी है—
अनूपरा बहुत्तृणा शस्ता स्निग्धोत्तरपल्लवा। प्रागीशानप्लवा सर्वप्लवा वा दर्पणोदरा॥ (आठवाँ अ०, भूमि-परीक्षा ६-७)