भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 224
  • अध्याय ९२ * १९७

यदि फिर उस गड्ढेमें डाली जानेपर अधिक हो जाय तो वहाँकी भूमिको उत्तम समझे। अथवा जल आदिसे उसकी परीक्षा करे।* हड्डी और कोयले आदिसे दूषित भूमिका खोदने, वहाँ गौओंको ठहराने अथवा बारंबार जोतने आदिके द्वारा अच्छी तरह शोधन करे। नगर, ग्राम, दुर्ग, गृह और प्रासादका निर्माण करानेके लिये उक्त प्रकारसे भूमि-शोधन आवश्यक है। मण्डपमें द्वारपूजासे लेकर मन्त्रतर्पण-पर्यन्त सम्पूर्ण कर्मका सम्पादन करके विधिपूर्वक घोरास्त्र सहस्रयाग करे। बराबर करके लिपी-पुती भूमिपर दिशाओंका साधन करे। सुवर्ण, अक्षत और दहीके द्वारा प्रदक्षिणक्रमसे रेखाएँ खींचे। मध्यभागसे ईशानकोष्ठमें स्थित भरे हुए कलशमें शिवका पूजन करे। फिर वास्तुकी पूजा करके उस कलशके जलसे कुदाल आदिको सींचे। मण्डपसे बाहर राक्षसों और ग्रहोंका पूजन करके दिशाओंमें विधिपूर्वक बलि दे॥८—१३$\frac{१}{२}$॥

कलशमें पूजा करके लग्न आनेपर अग्निकोणवर्ती कोष्ठमें पहले जिसका अभिषेक किया गया था, उस मधुलिप्त कुदालसे धरती खुदावे और मिट्टीको नैर्ऋत्यकोणमें फेंके। खोदे गये गड्ढेमें कलशका जल गिरा दे। फिर भूमिका अभिषेक करके कुदाल आदिको नहलाकर उसका पूजन करे। तत्पश्चात् दूसरे कलशको दो वस्त्रोंसे आच्छादित करके ब्राह्मणके कंधेपर रखकर गाजे-बाजे और वेदध्वनिके साथ नगरकी पूर्व सीमाके अन्ततक, जितनी दूर जाना अभीष्ट हो, उतनी दूर ले जाय और वहाँ क्षणभर ठहरकर वहाँसे नगरके चारों ओर प्रदक्षिणक्रमसे चलते हुए ईशानकोणतक उस कलशको घुमावे। साथ ही सीमान्तचिह्नोंका अभिषेक करता रहे॥१४—१८॥

इस प्रकार रुद्र-कलशको नगरके चारों ओर घुमाकर भूमिका परिग्रह करे। इस क्रियाको 'अर्घ्यदान' कहा गया है। तदनन्तर शल्यदोषका निवारण करनेके लिये भूमिको इतनी गहराईतक खुदवावे, जिससे कंकड़-पत्थर अथवा पानी दिखायी देने लगे। अथवा यदि शल्य (हड्डी आदि)-का ज्ञान हो जाय तो उसे विधिपूर्वक खुदवाकर निकाल दे। यदि कोई लग्न-कालमें प्रश्न पूछे और उसके मुखसे अ, क, च, ट, त, प, स और ह—इन वर्गोंके अक्षर निकलें तो इनकी दिशाओंमें शल्यकी स्थिति सूचित होती है। अथवा द्विज आदि वहाँ गिरें तो ये सब उस स्थानमें शल्य होनेकी सूचना देते हैं। कर्ताके अपने अङ्ग-विकारसे उसके ही बराबर शल्य होनेका निश्चय करे। पशु आदिके प्रवेशसे, कीर्तनसे तथा पक्षियोंके कलरवोंसे शल्यकी दिशाका ज्ञान प्राप्त करे॥१९—२२॥

किसी पट्टीपर या भूमिपर अकारादि आठ वर्गोंसे युक्त मातृका-वर्णोंको लिखे। वर्गके अनुसार क्रमशः पूर्वसे लेकर ईशानतककी दिशाओंमें शल्यकी जानकारी प्राप्त करे। 'अ' वर्गमें पूर्व दिशाकी ओर लोहा होनेका अनुमान करे। 'क' वर्गमें अग्निकोणकी ओर कोयला जाने। 'च' वर्गमें दक्षिण दिशाकी ओर भस्म तथा 'ट' वर्गमें


* 'समराङ्गणसूत्रधार'के अनुसार जलसे परीक्षा करनेकी विधि इस प्रकार है—गड्ढा खोदकर उसकी मिट्टी निकालकर मिट्टीसे ही पूरित करनेके बजाय पानी भरना चाहिये। पानी भरकर सौ कदम (पदशतं व्रजेत्) चलना चाहिये। पुनः लौट आनेपर यदि पानी जितना था उतना ही रहे तो श्रेष्ठ, कुछ कम ($\frac{१}{९}$) हो जाय तो मध्यम और बहुत कम ($\frac{१}{२}$) अथवा और अधिक कम हो जाय तो वर्ज्य—निकृष्ट समझना चाहिये। समराङ्गणकी इस प्रक्रियामें मत्स्यपुराण-प्रक्रियाकी छाप है। परंतु मयमुनिने इस प्रक्रियाके सम्बन्धमें और भी कठोरता दिखायी है। उनके अनुसार गड्ढेमें सायंकाल पानी भरा जाय और दूसरे दिन प्रातः उसकी परीक्षा करनी चाहिये। यदि उसमें प्रातः भी कुछ पानीके दर्शन हो जायें तो उसे अत्युत्कृष्ट भूमि समझना चाहिये। इसके विपरीत गुणवाली भूमि अनिष्टदायिनी तथा वर्ज्य है।