अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 229, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें२०२ * अग्निपुराण *
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नौ गुना न्यास करना चाहिये। पच्चीस पदोंका वास्तुमण्डल चितास्थापनके समय विहित है। उसकी 'वताल' संज्ञा है। दूसरा नौ पदोंका भी होता है। इसके सिवा एक सोलह पदोंका भी वास्तुमण्डल होता है॥ ३४-३९॥
षट्कोण, त्रिकोण तथा वृत्त आदिके मध्यमें चौकोर वास्तुमण्डलका भी विधान है। ऐसा वास्तु खात (नींव आदिके लिये खोदे गये गड्ढे)-के लिये उपयुक्त है। इसीके समान वास्तु ब्रह्म-शिलात्मक पृष्ठन्यासमें, शावाकके निवेशमें और मूर्तिस्थापनमें भी उपयोगी होता है। वास्तुमण्डलवर्ती समस्त देवताओंको खीरसे नैवेद्य अर्पित करे। उक्त-अनुक्त सभी कार्योंके लिये सामान्यतः पाँच हाथकी लंबाई-चौड़ाईमें वास्तुमण्डल बनाना चाहिये। गृह और प्रासादके मानके अनुसार ही निर्मित वास्तुमण्डल सर्वदा श्रेष्ठ कहा गया है॥ ४०-४२॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वास्तूपूजाकी विधिका वर्णन' नामक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९३॥
चौरानबेवाँ अध्याय
शिलान्यासकी विधि
भगवान् शिव कहते हैं—स्कन्द! ईशान आदि कोणोंमें वास्तुमण्डलके बाहर पूर्ववत् चरकी आदिका पूजन करे। प्रत्येक देवताके लिये क्रमशः तीन-तीन आहुतियाँ दे। भूतबलि देकर नियत लग्नमें शिलान्यासका उपक्रम करे। खातके मध्यभागमें आधार-शक्तिका न्यास करे। वहाँ अनन्त (शेषनाग)-के मन्त्रसे अभिमन्त्रित उत्तम कलश स्थापित करे। 'लं पृथिव्यै नमः।'—इस मूल-मन्त्रसे इस कलशपर पृथ्वीस्वरूपा शिलाका न्यास करे। उसके पूर्वादि दिग्भागोंमें क्रमशः सुभद्र आदि आठ कलशोंकी स्थापना करे। पहले उनके लिये गड्ढे खोदकर उनमें आधार-शक्तिका न्यास करनेके पश्चात् उक्त कलशोंको इन्द्रादि लोकपालोंके मन्त्रोंद्वारा स्थापित करना चाहिये। तदनन्तर उन कलशोंपर क्रमशः नन्दा आदि शिलाओंको रखे॥ १-४॥
तत्त्वमूर्तियोंके अधिदेवता-सम्बन्धी शस्त्रोंसे युक्त वे शिलाएँ होनी चाहिये। जैसे दीवारमें मूर्ति तथा अस्त्र आदि अङ्कित होते हैं, उसी प्रकार उन शिलाओंमें शर्व आदि मूर्ति, देवताओंके अस्त्र-शस्त्र अङ्कित रहें। उक्त शिलाओंपर कोण और दिशाओंके विभागपूर्वक धर्म आदि आठ देवताओंकी स्थापना करे। सुभद्र आदि चार कलशोंपर नन्दा आदि चार शिलाएँ अग्नि आदि चार कोणोंमें स्थापित करनी चाहिये। फिर जय आदि चार कलशोंपर अजिता आदि चार शिलाओंकी पूर्व आदि चार दिशाओंमें स्थापना करे। उन सबके ऊपर ब्रह्माजी तथा व्यापक महेश्वरका न्यास करके मन्दिरके मध्यवर्ती 'आकाश' नामक अध्वाका चिन्तन करे। इन सबको बलि अर्पित करके विघ्नदोषके निवारणार्थ अस्त्र-मन्त्रका जप करे। जहाँ पाँच ही शिलाएँ स्थापित करनेकी विधि है, उसके पक्षमें भी कुछ निवेदन किया जाता है॥ ५-८॥
मध्यभागमें सुभद्र-कलशके ऊपर पूर्णा नामक शिलाकी स्थापना करे और अग्नि आदि कोणोंमें क्रमशः पद्म आदि कलशोंपर नन्दा आदि शिलाएँ स्थापित करे। मध्यशिलाके अभावमें चार शिलाएँ भी मातृभावसे सम्मानित करके स्थापित की जा सकती हैं। उक्त पाँचों शिलाओंकी प्रार्थना इस